शेखावाटी का बिसाऊ कस्बा एक ऐसी परम्परा को जिंदा रखे हुए हैं, जो देश-दुनिया में अनूठी मानी जाती है। यहां सोमवार से विश्वप्रसिद्ध मूक रामलीला की शुरुआत हो गई।
बिसाऊ (झुंझुनूं)। शेखावाटी का बिसाऊ कस्बा एक ऐसी परम्परा को जिंदा रखे हुए हैं, जो देश-दुनिया में अनूठी मानी जाती है। यहां सोमवार से विश्वप्रसिद्ध मूक रामलीला की शुरुआत हो गई। पहले दिन राम जन्म और ताड़का वध की लीला का मंचन किया गया। इस रामलीला की खासियत यह है कि कोई भी पात्र संवाद नहीं बोलता। 200 फीट लंबे और 15 फीट चौड़े खुले मैदान में ढोल-नगाड़ों की थाप और मुखौटे लगाए कलाकारों की नृत्य-मुद्राओं के जरिये पूरी कथा जीवंत की जाती है।
रामलीला के लिए मुख्य बाजार की सड़क पर बालू-मिट्टी बिछाकर दंगलनुमा मंच तैयार किया जाता है। इसमें करीब 300 कलाकार भाग लेते हैं। रामा दल व राक्षस दल में होने वाले युद्ध के दौरान 10 हजार तीर चलाए जाते हैं। खास बात यह है भी यहां शाम 6 बजे से ही लीला शुरू कर दी जाती है जो रात 9 बजे तक चलती है। पात्रों की पोशाकें भी स्वरूप के अनुरूप होती हैं और राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न व सीता को चमकदार सलमा-सितारों से सजाया जाता है।
बिसाऊ की यह रामलीला नवरात्र के पहले दिन से आरंभ होकर पूर्णिमा तक चलती है। समापन भरत मिलाप और राम राज्याभिषेक की लीला के साथ होता है। इस तरह लीला 15 चलती है। इस बार एक नवरात्र अधिक होने के कारण मंचन 16 दिन तक चलेगा।
देशभर में दशहरे के दिन रावण दहन होता है, लेकिन बिसाऊ में ऐसा नहीं होता। यहां चतुर्दशी को रावण वध और उसका दहन किया जाता है। दशहरे के दिन यहां कुंभकर्ण वध होता है और उसका पुतला जलाया जाता है। यहां चार पुतलों कुंभकर्ण, मेघनाद, नरान्तक और रावण का अलग-अलग दिन दहन किया जाता है।
साहित्यकार रामजीलाल कल्याणी के अनुसार, भगवान राम को 14 साल का वनवास हुआ था। इसलिए यहां 14वें दिन रावण वध की लीला दिखाई जाती है। दूसरा कारण यह भी है कि स्टेज पर होने वाली रात्रि रामलीला में सभी प्रसंग दस दिन में दिखाया जाना संभव नहीं हो पाता जबकि 15 दिन की मूक रामलीला में सभी प्रसंगों को विस्तार से दिखाया जा सकता है।
यह मूक रामलीला केवल स्थानीय निवासियों ही नहीं बल्कि विदेशियों और अप्रवासी भारतीयों के लिए भी आकर्षक का केन्द्र बन चुकी है। हर साल विदेशी सैलानी और प्रवासी बन्धु इस रामलीला का हिस्सा बनने के लिए यहां आते हैं।