
झुंझुनूं.
देश की आन बान शान के लिए अपने आप को बलिदान करने वालों का जब-जब जिक्र चलता है तो शाहदत में पहला नाम झुंझुनूं का ही आता है। देश की सीमाओं पर हंसते हंसते अपनी जान गंवा देना यहां के युवाओं का जुनून रहा है। झुन्झुनूं जिला राजस्थान में ही नहीं अपितु पूरे देश में शूरवीरों, बहादुरों के लिए अपना विशिष्ठ स्थान रखता है। पूरे देश में सर्वाधिक सैनिक देने वाले इस जिले की मिट्टी के कण-कण में वीरता बसती है। देश के खातिर स्वयं को उत्सर्ग कर देने की परम्परा यहां सदियों पुरानी है। मातृभूमि के लिए मिट जाने की परम्परा में नये आयाम स्थापित किये हवलदार मेजर पीरूसिंह ने जिन्होंने देश हित में स्वयं को कुर्बान कर दिया। हालाकि यह बात अलग है कि सौ साल पहले झुंझुनूं की धरा पर जन्में इस वीर सपूत की शहादत को जो सम्मान मिलना चाहिए था वो पूरा नहीं मिल पाया।सरकार ने झुंझुनूं में केवल उनका स्टैच्यु एवं एक स्कूल को उनका नाम किया इसके अलावा कुछ भी नहीं हुआ।
शाहदत को सलाम
झुंझुनूं का जब भी नाम आता है तो परमवीर चक्र विजेता शहीद पीरू सिंह की शहादत को याद किए बिना पूरा नहीं होता है। पीरू सिंह वो नाम है जो देश की रक्षा के लिए मरमिटा और देश का पहला परमवीर चक्र मरणोपरांत उनकी मां जड़ाव कंवर को दिया गया।कहा जाता है कि उनकी वीरता की किस्से सेना में उनके साथ रहे सैनिक बड़ी शान से सुनाते है।
यह है पीरू सिंह का जीवन
शहीद पीरू सिंह राजस्थान के प्रथम एवं भारत के द्वितीय परमवीर चक्र से सम्मानित व्यक्ति है। मेजर पीरू सिंह का जन्म 20 मई 1918 को गाँव रामपुरा बेरी (झुंझुनंू) में हुआ। बचपन में ही उन्होंने विद्यालय जाना बंद कर दिया और वह अपने माता-पिता के साथ खेती बाड़ी में हाथ बटाने लगे। इसी दौरान वह 20 मई 1936 को 6 राजपूताना रायफल्स में भर्ती हुए। 1948 की गर्मियों में जम्मू-कश्मीर ऑपरेशन के दौरान पाकिस्तानी सेना व कबाईलियों ने संयुक्त रूप से टीथवाल सेक्टर में आक्रमण किया। इस हमले में दुश्मन ने भारतीय सेना को किशनगंगा नदी पर बने अग्रिम मोर्चे छोडऩे पर मजबूर कर दिया। भारतीय हमले 11 जुलाई 1948 को शुरू हुए। यह ऑपरेशन 15 जुलाई तक अच्छी तरह जारी रहे। इस हमले के दौरान पीरू सिंह इस कंपनी के अगुवाई करने वालों में से थे, जिस के आधे से ज्यादा सैनिक दुश्मन की गोलाबारी में शहीद हों चुके थे। अपनी विलक्षण वीरता के बदले शहीद हवलदार मेजर पीरुसिंह ने अपने जीवन का मोल चुकाया, पर अपने अन्य साथियों के समक्ष अपनी एकाकी वीरता, दृढ़ता व मजबूती का अप्रतिम उदाहरण प्रस्तुत किया। इस कारनामे को विश्व के अब तक के सबसे साहसिक कारनामो में एक माना जाता है। वीरता, कत्र्तव्य के प्रति निष्ठा और प्रेरणादायी कार्य के लिए कंपनी हवलदार मेजर पीरू सिंह भारत के युद्धकाल के सर्वोच्च वीरता पुरस्कार परमवीर चक्र से मरणोपरांत सम्मानित किया गया था।
हमने पीरू सिंह की शाहादत को याद रखने के लिए वर्ष 1997 में उनकी कास्यं प्रतिमा बनवाकर स्थापित करवाई ताकि आने वाली पीढिय़ां उसे याद रख सके। जो उनकी शहादत को सरकार से सम्मान मिलना चाहिए था वह पूरा नहीं मिला इस बात का मलाल है। -डॉ. उम्मेद सिंह शेखावत, लायन्स क्लब झुंझुनूं
मुझे लगा कि पूरे समाज को इस वीर सबूत की गाथा की जानकारी होनी चाहिए। शहीद केवल किसी क्षेत्र के नहीं होते है। इसलिए परमवीर चक्र विजेता शहीद पीरू सिंह पर मैने उनकी गाथा लिखने का प्रयास किया है। आने वाले समय में और भी शहीदों की गाथा लिखूंगा। -गोपाल सिंह राठौड़, सेवानिवृत प्राचार्य चित्तौडगढ़़