
जोधपुर/बालोतरा। जिस बेटी के स्कूल से घर लौटने का इंतजार परिवार की रोजमर्रा की खुशियों का हिस्सा था, वही बेटी एक दिन दूसरों के जीवन की उम्मीद बनकर लौटेगी, यह किसी ने नहीं सोचा था। 9 साल की अंजलि अब इस दुनिया में नहीं है, लेकिन उसके अंग तीन लोगों के लिए जीवन बन गए। बेटी को खोने के असहनीय दर्द के बीच माता-पिता अशोक दास और कंचन देवी ने अंगदान की सहमति देकर ऐसा फैसला लिया, जिसने अंजलि को हमेशा के लिए अमर कर दिया।
पचपदरा की अंजलि 19 अगस्त को स्कूल से घर लौट रही थी। सड़क पार करते समय तेज रफ्तार बोलेरो कैंपर ने उसे टक्कर मार दी। हादसे में गंभीर रूप से घायल अंजलि को उपचार के लिए एम्स जोधपुर लाया गया। चिकित्सकों ने उसे बचाने की पूरी कोशिश की, लेकिन उसकी हालत में सुधार नहीं हुआ। 27 अगस्त को चिकित्सकों ने उसे ब्रेन डेड घोषित कर दिया।
अंजलि के पिता अशोक दास रिफाइनरी में बस चालक हैं, जबकि मां कंचन देवी गृहिणी हैं। शादी के 15 साल बाद परिवार में बेटे सवाई का जन्म हुआ था। इसके बाद अंजलि के आने से घर की खुशियां और बढ़ गईं। छोटी बेटी के असमय चले जाने से परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा, लेकिन इसी मुश्किल घड़ी में माता-पिता ने बड़ा फैसला लिया।
अंगदान के महत्व की जानकारी मिलने और चिकित्सकों की समझाइश के बाद दोनों ने बेटी के अंगदान की सहमति दी। शनिवार को एम्स जोधपुर में अंगदान की प्रक्रिया पूरी की गई। सोटो जयपुर की अंग आवंटन नीति के तहत एक किडनी एम्स जोधपुर में प्रत्यारोपण के लिए रखी गई, जबकि दूसरी किडनी और लिवर को ग्रीन कॉरिडोर के जरिए एसएमएस अस्पताल जयपुर भेजा गया।
अंगदान की प्रक्रिया पूरी होने के बाद जब अंजलि की पार्थिव देह परिजनों को सौंपी गई तो पिता अशोक दास अपने आंसू नहीं रोक सके। बेटी का देह थामते ही वे फफक पड़े। परिवार के दूसरे सदस्यों की आंखें भी नम थीं। अस्पताल के स्टाफ ने भी अंजलि को श्रद्धांजलि दी।
इसके बाद जब अंजलि की पार्थिव देह पचपदरा पहुंची तो पूरा माहौल गमगीन हो गया। जिस बच्ची को ग्रामीणों ने स्कूल जाते और खेलते देखा था, उसकी अंतिम यात्रा में लोगों ने फूल बरसाकर विदाई दी। हर आंख नम थी, लेकिन अंजलि के अंगदान ने इस दुख के बीच उम्मीद की एक किरण भी छोड़ दी थी।
अंजलि का अंगदान एम्स जोधपुर में 12वां कैडेवरिक और तीसरा बाल कैडेवरिक अंगदान है। इससे पहले जोधपुर की 16 वर्षीय कनिष्का गौड़ और बालोतरा के गिड़ा निवासी 5 वर्षीय भोमाराम के मृत्यु के बाद अंगदान किए जा चुके हैं।
अंजलि की कहानी सिर्फ एक परिवार के दुख की कहानी नहीं है। यह उस साहस की कहानी है, जिसमें माता-पिता ने अपनी सबसे बड़ी पीड़ा के बीच किसी दूसरे परिवार के लिए जिंदगी की उम्मीद चुन ली। अंजलि चली गई, लेकिन उसके अंग किसी और की सांसों में जिंदगी बनकर धड़केंगे।