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Rajasthan High Court : राजस्थान हाईकोर्ट बड़ा फैसला, दादा की जमीन में पोते का जन्मसिद्ध ह​क नहीं

Rajasthan High Court : राजस्थान हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि दादा की जमीन में पोते का जन्मसिद्ध ह​क नहीं है।
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फाइल फोटो- पत्रिका

Rajasthan High Court : राजस्थान हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि केवल इस आधार पर कि कृषि भूमि मूल रूप से दादा के नाम थी और दावेदार उनका पोता है, उसे जमीन में जन्म से सहदायिक या खातेदारी अधिकार प्राप्त नहीं हो जाता। यदि जमीन को हिन्दू अविभाजित परिवार (एचयूएफ) या सहदायिक संपत्ति बताया जाना है तो वाद पत्र में उसके लिए आवश्यक बुनियादी तथ्य स्पष्ट रूप से बताए जाने चाहिए। न्यायाधीश फरजंद अली की एकल पीठ ने देवकरण की सिविल प्रथम अपील खारिज करते हुए पोखरण के अतिरिक्त जिला न्यायाधीश के 10 फरवरी, 2026 के फैसले को बरकरार रखा।

मामला जैसलमेर जिले की भणियाणा तहसील के जैमला गांव स्थित 75 बीघा असिंचित द्वितीय श्रेणी कृषि भूमि से जुड़ा था। भूमि मूल रूप से देवकरण के दादा को राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम, 1956 की धारा 101 के तहत भूमिहीन होने के आधार पर आवंटित हुई थी। देवकरण का दावा था कि यह पैतृक-सहदायिक संपत्ति थी और उसे अपने पिता के माध्यम से इसमें 1/9 हिस्सा जन्म से मिला था।

'देवकरण अपने दादा का प्रत्यक्ष उत्तराधिकारी नहीं था'

पीठ कोर्ट ने कहा कि अपीलार्थी के दादा की 24 अप्रैल, 2004 को बिना वसीयत मृत्यु हुई। इसके बाद हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत उनके तीन बेटे खेताराम, रामाराम और लच्छूराम प्रथम श्रेणी के वारिस के रूप में बराबर हिस्सों में उत्तराधिकारी बने और प्रत्येक के नाम एक-तिहाई हिस्सा दर्ज हुआ। देवकरण अपने दादा का प्रत्यक्ष उत्तराधिकारी नहीं था, इसलिए उसके पिता को मिले हिस्से में वह केवल पुत्र होने के कारण जन्मसिद्ध सहदायिक अधिकार का दावा नहीं कर सकता।

बाद में पेश किया गया साक्ष्य अधूरा - कोर्ट

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि देवकरण के वाद पत्र में एचयूएफ के अस्तित्व, जमीन के संयुक्त पारिवारिक संपत्ति होने या दादा के परिवार के कर्ता के रूप में जमीन रखने संबंधी कोई विशिष्ट तथ्य नहीं थे। कोर्ट ने कहा कि बाद में पेश किया गया साक्ष्य ऐसी कमी को पूरा नहीं कर सकता। बिक्री विलेखों को चुनौती देने से पहले देवकरण को सक्षम राजस्व अदालत से अपना खातेदारी अधिकार घोषित करवाना जरूरी था।

राजस्थान काश्तकारी अधिनियम की धारा 88 के तहत यह अधिकार राजस्व अदालत के क्षेत्र में आता है और धारा 207 के तहत संबंधित मामलों में सिविल कोर्ट का अधिकार क्षेत्र बाहर है। इसलिए हाईकोर्ट ने अपील खारिज कर दी।