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जोधपुर. खाण्डा फलसा से नवचौकिया मार्ग पर स्थित आसोप की हवेली किसी जमाने में जोधपुर की बड़ी हवेली हुआ करती थी। यह हवेली लगभग पांच छह बीघा जमीन पर बनी थी। आसोप की हवेली महाराजा गजसिंह प्रथम से लेकर महाराजा हनवन्तसिंह के राज्यकाल तक की अनेक घटनाओं की साक्षी रही है। इसका निर्माण आसोप के ठाकुर राजसिंह कुंपावत ने सन 1620 ई . और 1630 के दरम्यान करवाया था। जोधपुर में यह एकमात्र हवेली है जिसके ऊपर स्वर्ण- कलश चढ़ाए गए थे। एक तो मेहरानगढ़ दुर्ग के महलों के ऊपर स्वर्ण-कलश लगे हैं और दूसरा आसोप की हवेली में लगे थे। ठाकुर राजसिंह जोधपुर रियासत के प्रधान और सिरायत थे । ठाकुर राजसिंह को महाराजा सूरसिंह ने आसोप की जागीर दी थी। विभिन्न युद्ध अभियानों में राजसिंह ने बड़ी सूझ-बूझ का परिचय दिया। जब महाराजा जसवंतसिंह प्रथम जोधपुर के शासक बने तब उनकी अवस्था 12 वर्ष की थी इस कारण बादशाह ने राजसिंह को मनसब प्रदान कर जोधपुर राज्य चलाने के लिए जोधपुर राज्य का प्रधान नियुक्त किया । आसोप की हवेली में जहां राजसिंह ने देह त्याग किया था वहां देवली स्थापित है ।