
- कारगिल विजय दिवस आज
- बारूद, बर्फ और गोलियों के बीच तपा साहस, आज भी उतना ही अडिग
- मेघराजसिंह अब कलम से गांवों में भरोसे और न्याय की गढ़ रहे नींव
- कारगिल की चोटों ने शरीर घायल किया, लेकिन नहीं झुका जज्बा
- दीपक व्यास
जैसलमेर. कारगिल की उन ऊंची और बर्फ से ढकी चोटियों पर जब चारों ओर गोलियों की गूंज थी, तब एक सैनिक की आंखों में सिर्फ तिरंगे की तस्वीर थी। हाथों में बंदूक थी और दिल में एक ही संकल्प—देश की आन, बान और शान की रक्षा। समय बदला, परिस्थितियां बदलीं, लेकिन वह जज्बा आज भी वैसा ही कायम है। अंतर बस इतना है कि कभी वही हाथ सीमा पर बंदूक थामे खड़े थे और आज उन्हीं हाथों में कलम है, जो आमजन के विश्वास और अधिकारों की इबारत लिख रही है। कारगिल युद्ध के योद्धा मेघराज सिंह निंबली की कहानी केवल एक सैनिक के साहस की गाथा नहीं, बल्कि उस भावना की कहानी है जिसमें सेवा पद या वर्दी से नहीं, बल्कि सोच और कर्म से परिभाषित होती है। करीब 17 वर्षों तक सेना में सेवाएं देने के बाद वर्ष 2013 में वे सेवानिवृत्त हुए, लेकिन उनके लिए सेना की वर्दी उतरना सेवा का अंत नहीं था। उन्होंने जीवन के दूसरे अध्याय में प्रवेश किया और राजस्थान राजस्व विभाग में पटवारी की जिम्मेदारी संभाली। वर्तमान में वे जैसलमेर तहसील के रूपसी क्षेत्र में पदस्थापित हैं। फतेहगढ़ क्षेत्र के निंबली गांव में जन्मे मेघराजसिंह के मन में बचपन से ही देश के प्रति समर्पण का भाव था। गांव की मिट्टी में पले-बढ़े इस युवा ने वर्ष 1996 में भारतीय सेना का हिस्सा बनकर देशसेवा का मार्ग चुना। कठोर प्रशिक्षण के बाद उन्हें जम्मू-कश्मीर में तैनाती मिली, जहां हर दिन चुनौती और हर पल जिम्मेदारी से भरा था।
वर्ष 1999 में कारगिल युद्ध शुरू हुआ तो मेघराज सिंह उन वीर जवानों में शामिल थे, जिन्होंने दुर्गम पहाड़ियों पर दुश्मन का सामना किया। बर्फीली हवाओं, कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और लगातार खतरे के बीच उन्होंने अदम्य साहस का परिचय दिया। युद्ध के दौरान उनके पैर में बम के छर्रे लगे। शरीर घायल हुआ, दर्द ने घेरा, लेकिन मन में बसे देशप्रेम ने उन्हें टूटने नहीं दिया। उनके लिए व्यक्तिगत पीड़ा से बड़ा राष्ट्र का सम्मान था। कभी बंदूक से देश की सीमाओं की रक्षा करने वाले मेघराजसिंह आज कलम से लोगों के सपनों और अधिकारों की हिफाजत कर रहे हैं।
परिवार में देशसेवा की परंपरा पुरानी
मेघराजसिंह की कलम सरकारी दस्तावेजों में केवल जमीन के आंकड़े दर्ज नहीं करती, बल्कि ग्रामीणों की परेशानियों, उम्मीदों और भरोसे को भी समझती है। गांव के लोग उनमें एक ऐसे कर्मचारी की छवि देखते हैं, जिसके भीतर सैनिक का अनुशासन और जनसेवक की संवेदनशीलता साथ-साथ मौजूद है। मेघराजसिंह का परिवार भी सेवा भावना की मिसाल है। उनके पुत्र खेतसिंह आरएएस परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं, जबकि पुत्री सोनू कंवर शिक्षिका बनने के लक्ष्य के साथ मेहनत कर रही हैं। छह भाइयों के परिवार में पृथ्वीसिंह वर्ष 2018 में सेना से सेवानिवृत्त हुए, वहीं लालसिंह वर्तमान में जम्मू-कश्मीर में सेना में तैनात हैं। भाई कंवराजसिंह राजस्थान पुलिस में सेवाएं दे रहे हैं और जब्बरसिंह गांव में रहकर ट्यूबवेल की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। परिवार में देशसेवा की परंपरा पुरानी रही है। उनके चाचा कैप्टन तार सिंह भारतीय सेना से सेवानिवृत्त हुए हैं। कैप्टन तार सिंह के दोनों पुत्र डॉक्टर हैं और चिकित्सा क्षेत्र में सेवाएं दे रहे हैं।
फोटो कैप्शन - जैसलमेर. कारगिल युद्ध के दौरान दुर्गम मोर्चे पर अदम्य साहस के साथ डटे रहे मेघराजसिंह निंबली।- फाइल
जैसलमेर. पटवारी के रूप में आमजन की समस्याओं का समाधान करते कारगिल योद्धा रह चुके मेघराज सिंह निंबली।