स्कूलों की किताबे में चर्चा नहीं करते।
जोधपुर/ओसियां. पत्रिका समूह के प्रधान संपादक डॉ गुलाब कोठारी गुरुवार सुबह ओसियां में स्थित लालचंद मिलापचंद ढढ्ढा जैन कॉलेज प्रांगण में आयोजित दिशा बोध कार्यक्रम में डॉ कोठारी ने कहा कि वर्तमान में जीवन में मन की भूमिका को दृढ़ करना होगा। यह तभी संभव है जब मन सारे आवरणों और किसी के प्रति पूर्वाग्रह से मुक्त हो। हमे संकल्प करना होगा कि जीवन में नकरात्मकता के लिए कोई जगह ना हो। ओसियां क्षेत्र की विभिन्न शिक्षण संस्थाओं और स्कूलों के विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए डॉ कोठारी ने कहा कि माता पिता की ओर से दिए जाने वाले संस्कारों की जगह आज मोबाइल, इंटरनेट और टीवी ने ले ली है। स्कूलों की किताबे में चर्चा नहीं करते। धर्मगुरु भी रास्ता नहीं दिखाते। हम भी बदल गए, समय भी बदल गया।
मोबाइल इंटरनेट ले रहा घरवालों की जगह
अपने उद्बोधन में डॉ कोठारी ने युवाओं को कहा कि आज हम मां-बाप की जगह मोबाइल, इंटरनेट, टीवी के साथ जुड़ गए है। हम में से कितने प्रतिशत परम्परागत जीवन जी रहे हैं? मुझे ऐसा नहीं लगता है कि वर्तमान समय में बालक-बालिका में अंतर रह गया है। देश की पारंपरिक जीवन शैली में बालिकाओं का स्थान अहम रहा है। आज भी शक्ति की पूजा होती है। नवरात्र में बालिकाओं का पूजन किया जाता है। हमें कुदरत पैदा करती है यह बात शायद हम भूल चुके हैं। कुदरत की कार्यप्रणाली दिखाई नहीं देती। हम सब को धरती पर लाने का कार्य प्रकृति करती है। हम अक्सर खुद से प्रश्न करते हैं कि मैं कौन हूं? मैं असल में शरीर के भीतर रहने वाला जीव होता है। यह हमारे शास्त्र कहते हैं। हमारे जीवन की परम्परा इसी आधार पर बनी है। हमें इन बातों को समझना होगा लड़का-लड़की के अंतर को समझना होगा। इतने अभियान चल रहे हैं उसका कारण हमारी परम्परा नहीं है। हमारी परम्परा आज भी गहरी है।
धरती पर सबसे बड़ी है मां
विकास की दौड़ में हम नकल करने लगे है। विकास की लड़ाई में पैर उखड़ गए हैं। मां बाप को ऐसा लगने लगा है लड़का- लड़की में कोई अंतर नहीं है। जितने अवसर आगे बढऩे के लिए लड़के को मिलते हैं उतने ही लड़की को मिल रहे हैं तो फिर कमी कहां है। तो बराबरी की लड़ाई में देखें तो बालिका स्कूलों में भी वही पढ़ाया जाता है। जो लड़कों की स्कूल में पढ़ाया जाता है। एक मां को जो बालिका को शिक्षा देनी चाहिए वह नहीं दी गई तो उसका भविष्य अंधकार में होगा। मां इस धरती पर सबसे बड़ी है। जिंदगी की सबसे बड़ी किताब मां-बाप होते हैं। हमें उनसे शिक्षा प्राप्त करनी चाहिए। उनकी शिक्षाओं को जिंदगी में उतारने की कोशिश करनी चाहिए। हमें पढ़ाया जाता है पितृ देवो भव, मातृ देवो भव। इसका अनुसरण करने की आवश्यकता है।