
'Big Chair' For Disable Children: सेरेब्रल पाल्सी से पीड़ित अपने बेटे का स्कूल में प्रवेश कराने गईं जोधपुर की नेहा सोलंकी से पूछा गया, 'बच्चा बैठेगा कहां?' उस दिन नेहा ने महसूस किया कि कमी उनके बेटे में नहीं बल्कि उस व्यवस्था में है जहां दिव्यांग बच्चों के लिए आवश्यक सहायक उपकरण उपलब्ध ही नहीं हैं। इसी अनुभव ने उन्हें रीहैबिलिटेशन साइकोलॉजी में मास्टर्स करने के लिए प्रेरित किया। इसके बाद उन्होंने फिजियोथेरेपिस्ट, ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट, विशेष शिक्षकों और अभिभावकों के साथ मिलकर 'उन्नति एडेप्टिव डिवाइसेज' की स्थापना की।
नेहा ने अपने अनुभवों के आधार पर ये समझा कि सही उपकरणों की कमी दिव्यांग बच्चों की शिक्षा और आत्मनिर्भरता में बड़ी बाधा बन सकती है। इसी सोच के साथ उन्होंने ऐसी तकनीक विकसित करने पर काम किया जो बच्चों की जरूरतों के अनुसार हो और उनके जीवन को आसान बना सके।
यहां उन्होंने भारत में विकसित 'बडी चेयर' तैयार की, जो सेरेब्रल पाल्सी और अन्य न्यूरो-मोटर चुनौतियों वाले बच्चों को सुरक्षित और सही मुद्रा में बैठने में मदद करती है। इस डिजाइन को पेटेंट मिल चुका है। साथ ही इसे नीति आयोग की ओर से हेल्थटेक असिस्टिव टेक्नोलॉजी श्रेणी के प्रतिष्ठित ग्रासरूट इनोवेशन अवॉर्ड के लिए चुना गया है। नेहा इस श्रेणी में सम्मान पाने वाली राजस्थान की पहली महिला हैं।
हर मां की तरह नेहा भी चाहती थीं कि उनका बेटा स्कूल जाए, दोस्तों के साथ खेले और सामान्य बचपन जी सके। लेकिन जब उन्होंने स्कूलों में प्रवेश के लिए आवेदन किया तो कई स्कूलों ने बच्चे की दिव्यांगता के कारण मना कर दिया। आखिरकार एक स्कूल ने प्रवेश देने की बात कही, लेकिन मां से ऐसा सवाल पूछा, जिसने उनकी सोच और जीवन की दिशा बदल दी। स्कूल प्रबंधन ने कहा, 'पहले बच्चे को बैठना सिखाइए, फिर स्कूल भेजिए।'
नेहा का कहना है कि उन्नति केवल उत्पाद बनाने वाली संस्था नहीं है। उनका उद्देश्य ऐसे सहायक उपकरण विकसित करना है, जो दिव्यांग बच्चों को शिक्षा, खेल, यात्रा, भोजन और रोजमर्रा की जिंदगी में अधिक स्वतंत्र और आत्मनिर्भर बना सकें। उनका मानना है कि बच्चे को दुनिया के अनुसार बदलने की कोशिश नहीं करनी चाहिए, बल्कि दुनिया को ऐसा बनाना चाहिए, जहां हर बच्चे को सम्मान, समान अवसर और अपनी पहचान बनाने का अवसर मिले।