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राजस्थान में जंगल के नाम पर 17 करोड़ का घोटाला, मजदूरों की जगह JCB से कराए काम; ऑडिट में खुली परतें

जंगलों के संरक्षण और आदिवासी-ग्रामीणों को रोजगार उपलब्ध कराने के उद्देश्य से संचालित साझा वन प्रबंधन योजना राजगढ़ क्षेत्र में कथित तौर पर करोड़ों रुपए के घोटाले का माध्यम बन गई।
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जयपुर

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Anil Prajapat

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विकास सिंह

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Updated: 20 Jul 2026, 9:04 AM IST

Rajasthan Forest Scam

यहां मशीनों से करवाया गया काम। फोटो: पत्रिका

अलवर/जयपुर। जंगलों के संरक्षण और आदिवासी-ग्रामीणों को रोजगार उपलब्ध कराने के उद्देश्य से संचालित साझा वन प्रबंधन योजना राजगढ़ क्षेत्र में कथित तौर पर करोड़ों रुपए के घोटाले का माध्यम बन गई। वित्तीय वर्ष 2022-23 की प्रारंभिक जांच में पकड़ी गई 2 करोड़ रुपए की धांधली के बाद जब वन समितियों के पिछले 7 साल के बैंक खातों का ऑडिट हुआ, तो 15 करोड़ से ज्यादा के गबन का अतिरिक्त खुलासा हुआ। इस तरह कुल घोटाला 17 करोड़ रुपए तक पहुंच गया। आरोप है कि जिन कार्यों को श्रमिकों से कराया जाना था, उन्हें जेसीबी मशीनों से करवाकर कागजों में मजदूरों से कार्य होना दर्शाया गया और भुगतान भी उसी आधार पर किया गया।

तत्कालीन मुख्य वन संरक्षक, जयपुर की ओर से प्रधान मुख्य वन संरक्षक को भेजी गई जांच रिपोर्टों में कई गंभीर अनियमितताओं का उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार पौधरोपण के लिए गड्ढे खोदने, सीसीटी, एसजीटी और खाई फेंसिंग जैसे कार्य नियमों के विपरीत मशीनों से कराए गए। इसके बाद माप पुस्तिकाओं और बिलों में कथित कूट रचना कर श्रमिकों द्वारा कार्य किए जाने का रिकॉर्ड तैयार किया गया।

बैंक से निकाले करोड़ों, मजदूरों को फूटी कौड़ी नहीं

जांच में यह भी सामने आया कि सरकार के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद भुगतान सीधे पात्र सदस्यों के खातों में करने के बजाय कई समितियों के खातों से ‘सेल्फ चेक’ के माध्यम से बड़ी मात्रा में नकदी निकाली गई। 18 मार्च 2026 को सामने आए बैंक अभिलेखों के अनुसार राजगढ़ रेंज की श्रीनगर, बीघोता, माचाड़ी, कानेटी, अनतपुरा, सुरेर और आमकीवाल समितियों के खातों से करोड़ों रुपए निकाले गए।

मैं केवल पांचवीं पास, मेरे कर दिए फर्जी हस्ताक्षर

मामले में विभाग के भीतर से भी गंभीर आरोप सामने आए। तकनीशियन भागचंद सैनी ने जांच दल को बताया कि वह केवल पांचवीं पास है, जबकि अंग्रेजी में तैयार माप पुस्तिकाओं और बिलों पर उसके तथा समिति अध्यक्ष के कथित फर्जी हस्ताक्षर किए गए। सैनी ने यह भी आरोप लगाया कि साइट इंचार्ज वनपाल जगदीश मीणा ने अपनी जेसीबी मशीन लगाकर कार्य कराया और फर्जी बिल तैयार किए गए। वहीं उप वन संरक्षक द्वारा आवश्यक भौतिक सत्यापन किए बिना बिल पारित करने का आरोप भी लगाया गया।

20 किमी दूर बैठे लोगों को बना दिया मजदूर

जांच में एक और चौंकाने वाला तथ्य सामने आया। जिन 13 खातों में 58.26 लाख रुपए आरटीजीएस से भेजे जाने का दावा किया गया था, वे खाताधारक कार्यस्थल से 60 से 120 किलोमीटर दूर स्थित बैंकों के ग्राहक पाए गए। तत्कालीन सीसीएफ राजीव चतुर्वेदी की जांच में सामने आया कि इनके वास्तविक श्रमिक होने पर भारी संदेह है।

सालों तक फर्जी तरीके से चलती रहीं समितियां

रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि कई ग्राम वन सुरक्षा एवं प्रबंध समितियों का गठन और पुनर्गठन नियमों के अनुरूप नहीं हुआ। कुछ समितियां 20 से 23 वर्षों तक कथित रूप से कूट रचित अभिलेखों के आधार पर संचालित होती रहीं। बैंक लेन-देन की जांच में करीब 90 व्यक्तियों को एक से अधिक समितियों से भुगतान मिलने और स्थानीय व्यापारियों के खातों में राशि हस्तांतरित होने के संकेत भी मिले हैं।

पत्रिका की खबर के बाद हाईकोर्ट की फटकार, आखिर खुली नींद

इस संगठित अपराध की जांच के लिए फरवरी 2025 में ही जांच कमेटी ने एसीबी से जांच कराने की सख्त अनुशंसा कर दी थी। लेकिन फाइल को 15 महीने तक लटकाए रखा गया। जुलाई 2026 में राजस्थान हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दाखिल की गई। हाईकोर्ट ने 'पत्रिका' के खुलासों का संज्ञान लेते हुए राज्य सरकार को चार हफ्ते के अंदर जवाब दाखिल करने का सख्त निर्देश दिया। कोर्ट की फटकार के बाद इस महाघोटाले की विस्तृत जांच के लिए एसीबी को औपचारिक स्वीकृति प्रदान कर दी गई है।

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