जन्म स्थान के रूप में भी ऊंडू-काहमीर के बजाय रूणिचा की संभावना ज्यादा
सवाईसिंह राठौड़/बासनी/जोधपुर. जनमानस में लोकदेवता बाबा रामदेव के अवतरण की तिथि भाद्रपद शुक्ल द्वितीया (बीज) मानी जाती है। इससे इत्तर एक शोध ग्रंथ में अवतरण दिवस चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी सोमवार माना गया है। यह दावा 'बाबा रामदेव सम्बन्धी राजस्थानी लोक साहित्य' पर शोध करने वाले डॉ. सोनाराम बिश्नोई का है। जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय के राजस्थानी विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त डॉ. बिश्नोई ने अपने शोध ग्रंथ 'बाबा रामदेव : इतिहास एवं साहित्य' में इस तथ्य को प्रतिपादित किया है। कुन्ती पुत्र अर्जुन के वंशज शोध ग्रंथ में तुंवरों के भाटों की बही और 'तंवर वंश का संक्षिप्त इतिहास' सहित अन्य संदर्भों से तोमर क्षत्रियों की वंशावली के बारे लिखा गया है।
शोध में बाबा को चंद्रवंशीय कुरु कुल में कुन्ती पुत्र अर्जुन पाण्डव का वंशज बताया गया है। अर्जुन की ४०वीं पीढ़ी में तोम नामक राजा हुआ था। उसके नाम पर तोमर (तुंवर, तंवर) वंश का प्रवर्तन हुआ। तोम की २४वीं पीढ़ी में अनंगपाल (द्वितीय) हुए। पुत्र नहीं होने पर वे दोहिते पृथ्वीराज चौहान को दिल्ली का राज्य सौंपकर तीर्थ यात्राएं करते हुए पाटण आ गए। यहां वद्धावस्था में उनके तीन पुत्र हुए। इनके पुत्र अमजी पाटण छोड़ राजस्थान आ गए। अनंगपाल (द्वितीय) की ७वीं पीढ़ी में अजमालजी के घर बाबा का अवतरण माना जाता है।
जन्मस्थान में भी रूणिचा (रामदेवरा) की संभावना ज्यादा
बाबा के जन्म स्थान के बारे में भी तुंवरावटी, दिल्ली, ऊंडू- काहमीर, पोकरण, रूणीचा आदि स्थानों के बारे में उल्लेख है। डॉ. बिश्नोई ने 'बात रामदेव तंवर री' और 'बात तुंवरां री' के हवाले से लिखा है कि रामदेवजी के पिता पश्चिमी राजस्थान की तरफ वांरूछाह (छाहण-बारू) आए। यहां पंपजी धोरधांर बुध गौत्र के भाटी राजपूत की जागीरी थी। पंपजी ने अपनी पुत्री मैणादे का विवाह अजमालजी से किया। अजमालजी पोकरण से कुछ मील दूर रहे, जहां वीरमदेवजी का जन्म हुआ। यहां से थोड़ी दूर 'रूणीचा' नामक कुएं के पास डेरा दिया। यहां रामदेवजी का अवतरण माना जाता है। इसे 'रामडेरौ' और रामदेवरा कहा जाने लगा। भैरव राक्षस के वध के लिए भी रामदेवजी ने 'रूणीचा' से ही चढ़ाई की थी। रामदेवजी के विवाह के लिए भी नारियल 'रूणीचे' में भेजा गया था।
इनका कहना है
लोकमान्यता का कारण कथावाचक और गायक रहे हैं। शुक्ल पक्ष की दूज को लेकर नए चांद के कारण भी यह मान्यता रही। ऐतिहासिक और प्रामाणिक तथ्यों में इसका वर्णन कम है। भ्रांतियों के निराकरण के लिए तत्कालीन परिस्थितियों का अध्ययन वांछित था। मैंने ४० से अधिक बार रामदेवरा की पैदल यात्रा कर कई स्थानों, व्यक्तियों, पुस्तकों, बहियों आदि का अध्ययन कर शोध किया है। आसलपुर (जयपुर) के तुंवरों के भाटों की बही के अनुसार अवतरण विक्रम संवत १४०९ की चैत्र शुक्ला पंचमी है।
- प्रो. डॉ. सोनाराम बिश्नोई, शोधकर्ता
बाबा के जीवनवृत्त व लोक साहित्य पर डॉ. बिश्नोई ने महत्वपूर्ण शोध किया है। उन्होंने निष्कर्षों की प्रमाणों सहित पुष्टि की है। ऐसे ही शोध की आवश्यकता तेजाजी, गोगाजी, हड़बूजी, मल्लीनाथजी, देवनारायणजी जैसे लोकदेवताओं पर भी है।
- डॉ. गजेसिंह राजपुरोहित, निदेशक बाबारामदेव शोधपीठ, जेएनवीयू
कहते हैं कि रामदेवजी के पिता अजमालजी को द्वारकाधीश श्रीकृष्ण ने **** सुदी बीज को दर्शन दिए थे। शुक्ल पक्ष की द्वितीया को शुभ माना जाता रहा है। जनमानस में अवतण भी इसी तिथि को प्रचलित हो गया। शोध में जो प्रमाण दिए गए हैं, उनके अनुसार यह तिथि सही प्रतीत होती है।
- अचलानंद गिरी, सैनाचार्य, बाबा रामदेव मंदिर राइकाबाग
हमारे तंवरों के भाटों की बही में भी चैत्र शुक्ल पंचमी का उल्लेख है। **** सुदी बीज के बारे में कहा जाता है कि इस दिन रामदेवजी ने मसूरिया में पर्चा दिया था। पहले जनसंचार माध्यम के रूप में श्रुत परंपरा थी। बीज लोक प्रचलन में आ गई।
- भोमसिंह तंवर, गादीपति, बाबा रामदेव मंदिर रूणेचा धाम, रामदेवरा