- न विज्ञप्ति निकाली, न परीक्षा ली, सीधी नियुक्ति - १९९३ में ३० कर्मचारी नियुक्त किए, २०१२ में १० और कर दिए
जोधपुर . जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय में वर्ष १९८८ से सेवाएं दे रहे ४० कर्मचारियों की नौकरी अब खतरे में है। विवि ने इन कर्मचारियों को भर्ती का विज्ञापन और परीक्षा लिए बगैर नियमित कर दिया। विवि की इस कारस्तानी से राज्य सरकार को कम से कम १० करोड़ रुपए का चूना लग गया है। राज्य सरकार ने विवि की ओर से वर्ष १९९३ और वर्ष २०१२ में चालीस अशैक्षणिक कर्मचारियों को नियुक्ति तिथि से नियमितिकरण का परिलाभ दिए जाने को अमान्य करार दिया है। इन ४० कर्मचारियों को नियमित करने से पहले विवि ने राज्य सरकार से आवश्यक स्वीकृति भी प्राप्त नहीं की और तो और नियमित भर्ती प्रक्रिया में आरक्षण, पदोन्नति, रोस्टर, बैकलॉग और दो से अधिक संतान संबंधी नियमों की भी पालना नहीं की गई।
यह है मामला
विवि ने २९ अप्रेल १९८८ को एक आदेश निकालकर २८ दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियों की सेवाओं को १७ मई १९८८ से समाप्त किए जाने के आदेश दिए थे। इस आदेश को जोधपुर विश्वविद्यालय दैनिक वेतन भोगी संघ द्वारा हाईकोर्ट में चुनौती गई। हाईकोर्ट ने ५ जुलाई १९८८ को आदेश देकर कर्मचारियों को वेतन शृंखला का न्यूनतम वेतन देने और विवि की ओर से भविष्य में की जाने वाली भर्ती में इनके द्वारा आवेदन क रने पर तरजीह देने के निर्देश दिए। विवि ने इसके उलट १४ अप्रेल १९९३ को ३० कर्मचारियों को कनिष्ठ लिपिक के रिक्त पद के विरुद्ध नियमित नियुक्ति आदेश जारी कर दिए गए। विवि ने इसके लिए न तो विज्ञापन निकाला और न ही लिखित परीक्षा का आयोजन किया था। इसके बाद विवि ने ४ सितम्बर २०१२ को ४० कर्मचारियों की सेवाओं को १ जुलाई १९८८ एवं इसके बाद की अन्य तिथियों से नियमित करने के आदेश दिए। इसमें वे कर्मचारी भी शामिल थे जो १९९३ में नियमित हुए थे यानी इन कर्मचारियों की नियुक्ति तिथि १९९३ से बदलकर १९८८ या उसके बाद की कर दी गई।
सरकार ने गठित की जांच रिपोर्ट
वर्ष २०१४ में खींवसर विधायक हनुमान बेनीवाल ने विधानसभा में नियम १३१ के अंतर्गत ध्यानाकर्षण प्रस्ताव पेश कर जेएनवीयू में ४० अशैक्षणिक कर्मचारियों के नियमितिकरण में अनियमितता का मुद्दा उठाया। इसके बाद सरकार ने अप्रेल २०१४ में चार सदस्यीय जांच समिति का गठन किया। समिति ने अपनी जांच रिपोर्ट सितम्बर २०१६ को उच्च शिक्षा विभाग को सौंप दी। उच्च शिक्षा विभाग के संयुक्त सचिव नाथूलाल सुमन ने मई २०१७ में अपनी अनुशंषाओं सहित यह जांच रिपोर्ट विवि को भेजी। विवि ने २३ जून २०१७ को आयोजित सिण्डीकेट बैठक में इस जांच रिपोर्ट को एजेण्डा आइटम संख्या-११ के तौर पर रखा। सिण्डीकेट ने विवि के रजिस्ट्रार को इस जांच रिपोर्ट के संबंध में कार्यवाही के लिए अधिकृत कर दिया। चार महीने बाद भी विवि ने अब तक कोई कार्यवाही नहंी की है। विवि के कार्यवाहक रजिस्ट्रार प्रो. पीके शर्मा का यह कहना है कि उन्होंने इस मामले में सरकार के एएजी से विधिक राय मांगी है।
जांच कमेटी के निष्कर्ष
- जांच कमेटी ने वर्ष २०१२ के साथ वर्ष १९९३ में विवि की ओर कर्मचारियों को नियमितिकरण का परिलाभ देने को विधि सम्मत नहीं माना।
- कमेटी ने अपनी जांच रिपोर्ट में कहा कि विवि ने १९८८ में दिए गए हाईकोर्ट के निर्णय की आड़ में कर्मचारियों को नियमित कर दिया।
- जांच कमेटी ने विवि के इस निर्णय को राज्य सरकार व विवि के बीच हुए एमओयू का भी उल्लंघन माना है जिसके अनुसार विवि को नियमित करने से पहले सरकार की स्वीकृति प्राप्त करनी थी।
- विवि ने नियमित भर्ती प्रक्रिया की पालना नहीं की।
- आरक्षण, पदोन्नति और दो से अधिक संतान संबंधी नियमों की पालना नहीं की।
- उच्च शिक्षा विभाग ने विवि प्रशासन को विवि की प्रक्रियात्मक एवं पर्यवेक्षणीय त्रुटियों के लिए जिम्मेदारी तय करके दोषी अधिकारियों/कार्मिकों के विरुद्ध नियमानुसार उचित कार्यवाही करने के निर्देश दिए हैं।
- सरकार ने विवि को कार्मिकों को नियम विरुद्ध परिलाभ देने की समीक्षा कर कार्यवाही करने के लिए भी कहा है।
वर्ष २०१२ में इन कार्मिकों किया नियमित
१ सुभाष जोशी
२ विनोद अबोटी
३ अशोक महान्
४ जेम्स मैथ्यू
५ सूर्य प्रकाश शर्मा
६ सुरेंद्र सिंह
७ मुश्ताक हुसैन
८ सुमेर सिंह
९ राजेंद्र व्यास
१० सैय्यद अली
११ ललित भगतानी
१२ सूरज प्रकाश
१३ अशोक दैय्या
१४ रमेश दैय्या
१५ रामदत्त हर्ष
१६ कामिनी हिगोरानी
१७ राजेश व्यास
१८ अनिल पंवार
१९ शैलेंद्र पाण्डे
२० अशोक कुमार
२१ दीपक अवस्थी
२२ केशवन एम्प्रान ई
२३ रईस खान
२४ राधा किशन
२५ नरेंद्र गहलोत
२६ चैनाराम चौधरी
२७ सुरेंद्र सिंह शेखावत
२८ जयेंद्र सिंह देवड़ा
२९ अशोक शर्मा
३० अजीत सिंह
३१ नीलम गांधी
३२ लक्ष्मणसिंह भाटी