
-घर की चौखट तक नल पहुंचा, पानी जुटाने का रोजाना संघर्ष हुआ खत्म
-सिंचाई बढ़ी तो रेगिस्तान में खेती ने आजीविका का नया मॉडल रचा
-पशुपालन के साथ खेती जुड़ी, परिवारों की आय के विकल्प हुए मजबूत
-स्कूलों से डिजिटल कक्षाओं तक, सरहदी बच्चों ने अवसरों की दूरी मिटाई
- दीपक व्यास
जैसलमेर. भारत-पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सीमा के मुहाने पर बसे करड़ा, पोछना, म्याजलार, भिनजरा, तला, गुंजनगढ़ और लूणार जैसे गांवों में आजादी के 80वें वर्ष पर बदलाव केवल सुविधाओं का नहीं, बल्कि जीवन की दिशा बदलने का दिखाई दे रहा है। कभी पानी रोजमर्रा की सबसे बड़ी चिंता था, अब कई घरों की चौखट तक नल पहुंच चुका है। पानी की उपलब्धता ने सिंचाई की संभावनाएं बढ़ाईं और खेती ने पशुपालन आधारित अर्थव्यवस्था को नया सहारा दिया। इसी बदलाव की अगली कड़ी शिक्षा और डिजिटल संसाधन हैं। इन गांवों में लंबे समय तक बारिश के बाद तालाब, जोहड़ और कुएं ही पानी के प्रमुख सहारे रहे। कमजोर मानसून आते ही जलस्रोतों की क्षमता घट जाती और परिवारों को कई किलोमीटर दूर तक पानी जुटाना पड़ता था। अब पाइपलाइन नेटवर्क और भू-जल आधारित जलस्रोतों के विस्तार से कई परिवारों तक नल कनेक्शन पहुंचे हैं। इसका सबसे बड़ा असर समय पर पड़ा है। पानी लाने में लगने वाले घंटे अब घरेलू काम, पशुपालन, खेती और बच्चों की पढ़ाई में इस्तेमाल हो रहे हैं।
तब और अब : बदलाव की बयार
-पहले पानी का इंतजाम परिवार की दैनिक प्राथमिकता था।
-कई स्थानों पर जलस्रोत घरों से कई किलोमीटर दूर थे।
-अब नल कनेक्शन ने पानी तक पहुंच का समय घटाया है।
-पशुधन के लिए पानी जुटाने का दबाव भी कम हुआ है।
रेगिस्तान में फसल का नया गणित
पानी की उपलब्धता बढ़ते ही खेतों का समीकरण बदला है। ट्यूबवेल, ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी तकनीकों ने सीमित पानी में खेती की संभावना बढ़ाई है। बारिश पर निर्भर रहने वाले खेत अब कई जगह नियंत्रित सिंचाई के सहारे फसल चक्र में शामिल हो रहे हैं। सरसों, जीरा, इसबगोल, एरंड और गेहूं जैसी फसलें ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नई भूमिका बना रही हैं। हालांकि खेती का यह विस्तार भूजल संरक्षण और सिंचाई लागत की चुनौती भी साथ ला रहा है।
पशुधन के साथ खेती, आय का दूसरा आधार
सीमावर्ती परिवारों की पारंपरिक अर्थव्यवस्था में गाय, ऊंट, भेड़ और बकरी पालन का बड़ा योगदान रहा है। कमजोर बारिश में चारा और पानी महंगा पड़ता था। खेती के विस्तार ने अब आय का दूसरा आधार तैयार किया है। पशुपालन अब अकेला सहारा नहीं है। खेती, पशुपालन और फसल विविधता साथ चलने से परिवारों की आर्थिक निर्भरता एक ही स्रोत पर नहीं रही। यही बदलाव कमजोर मानसून के समय जोखिम घटाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
स्कूल से स्क्रीन तक बढ़ा बच्चों का दायरा
पानी और खेती के बाद शिक्षा सीमावर्ती गांवों में बदलाव का सबसे महत्वपूर्ण संकेत है। स्कूलों की उपलब्धता बढऩे के साथ शिक्षकों और डिजिटल संसाधनों ने सीखने के तरीके बदले हैं। मोबाइल इंटरनेट और डिजिटल अध्ययन सामग्री ने गांव में बैठे विद्यार्थियों को व्यापक शैक्षणिक दुनिया से जोड़ दिया है। अब अवसरों की दूरी केवल सडक़ और किलोमीटर से तय नहीं होती। सीमावर्ती गांवों से निकल रहे युवा चिकित्सा, कानून, न्यायपालिका, पुलिस, सेना और अर्धसैनिक सेवाओं जैसे क्षेत्रों तक पहुंच बना रहे हैं।
एक्सपर्ट व्यू: गांव की सीमाओं के रास्ता खुल रहा भविष्य
सीमावर्ती गांवों का स्थायी विकास अलग-अलग योजनाओं से नहीं, बल्कि उनके आपसी जुड़ाव से तय होगा। पेयजल से घरेलू जीवन सुधरे, सिंचाई से खेती मजबूत हो, खेती के साथ पशुपालन चले और बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले, तभी बदलाव अगली पीढ़ी तक पहुंचेगा। सीमा पर खड़े इन गांवों की सबसे बड़ी कहानी यही है कि विकास अब केवल सुविधा नहीं रहा। पानी ने समय बचाया, सिंचाई ने जमीन को नया उपयोग दिया, खेती ने आय के विकल्प बढ़ाए और डिजिटल शिक्षा ने बच्चों के सामने गांव की सीमाओं से कहीं बड़ा भविष्य खोल दिया।
-लालूसिंह सोढ़ा, अधिवक्ता व ग्रामीण, पोछीना
फोटो कैप्शन-
सरहदी जैसलमेर जिले का करड़ा गांव का विहंगम दृश्य तो पाकिस्तान से महज केवल 5 किलोमीटर ही दूर है।