
लवेरा बावड़ी (जोधपुर). गुठली छोटी, रस ज्यादा, रसीले, स्वाद मीठा वाह क्या बेर हैं। बेर का नाम जुबां पर आते ही नाम आता हैं धन्वन्तरि उद्यान बिराई।
जी हां, पथरीली जमीन पर उद्यान विकसित वाले वैद्य गोपीकिशन परिहार ने ये करिश्मा कर दिखाया। उनके निधन के बाद उनके पुत्र वैद्य खींवराज परिहार ने इस काम को गति दी ।
बेरों की विभिन्न किस्मों को तैयार कर उद्यान को सजाया हुआ है। मीठे रसीले बेर के साथ ही औषधीय पौधों के लिए जाने पहचाने वाले इस उद्यान की अपनी पहचान है। यहां बेर इतने हो रहे हैं कि हर वर्ष लाखों की कमाई होती है। बेर की खासियत यह है कि इस बेर में कीड़े-लटें नहीं पड़ती हैं।
ये किस्मे हैं बाग में
धन्वन्तरि उद्यान में सनोरी, केतकी, सेव बोर, अलीगंज, इलायची, मूंडीया, उमरान, टीकड़ी, गोला किस्म के बेर हैं।
50 से 100 किग्रा तक होते हैं बेर
एक पेड़ से 50 से 100 किलोग्राम तक बेर प्राप्त होते हैं। इनके भाव 40 से 100 रुपए तक मिलते हैं। धन्वन्तरि उद्यान में बेरों की सार संभाल में महिला पुष्पा, लक्ष्मी, यागेश्वरी के साथ ही लक्ष्मीनारायण व हेमन्त हाथ बंटाते हैं।
वैद्य खींवराज परिहार ने बताया कि बेर पक कर जनवरी से महाशिवरात्रि तक आते हैं। पौधों को पानी देने के लिए पानी का बड़ा हौद भी बनाया हुआ हैं।
करीब 400 हैं बेर के पौधे
उद्यान में बेर के करीब चार सौ पौधे हैं। सौलर पैनल भी हैं।
कई बार मिले सम्मान
धनवन्तरि उद्यान के बेर जिला, राज्य स्तरीय बेर शो एवं प्रदर्शनी तथा राष्ट्रीय स्तर पर भी प्रथम, द्वितीय व तृतीय स्थान पर रह चुके हैं।
हरित क्रांति के जनक स्वामीनाथन व मुख्यमंत्री भी कर चुके हैं भ्रमण
वैद्य खींवराज परिहार ने बताया कि हरित क्रांति के जनक एम एस स्वामीनाथन व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के साथ ही सौम्या स्वामीनाथन एवं काजरी के वैज्ञानिक भी भ्रमण कर चुके हैं।
औषधीय पौधे भी है, बाग में
विल्व पत्रक, अमलतास, गुलर, तीन धारी थोर, पलास, रूद्राक्ष, कटोरी, अकोल, कल्पवृक्ष के साथ ही चीकू , लसोड़ा, जामुन कनेर के पौधे भी हैं।