
Rajasthan Dhanteras : सनातन परंपरा में धनतेरस का त्योहार सिर्फ भौतिक समृद्धि, सोने-चांदी की चमक या बर्तनों की खरीदारी तक सीमित नहीं है। मूलतः यह पावन दिन भगवान धन्वंतरि की आराधना का है, जो समुद्र मंथन से अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे और जिन्हें आयुर्वेद, आरोग्य तथा वनस्पतियों का आदिदेव माना जाता है। सुखद संयोग देखिए कि इस धनतेरस पर जब पूरा देश समृद्धि और अच्छी सेहत की कामना कर रहा है, तब राजस्थान की अनूठी भौगोलिक और कृषि संस्कृति एक नए रूप में देश के सामने आ रही है। प्रकृति ने राजस्थान की बंजर, रेतीली और पथरीली दिखने वाली धरा के आंचल में औषधीय पौधों (Medicinal Plants) के रूप में आरोग्य और समृद्धि का एक ऐसा अनमोल खजाना बख्शा है, जो न केवल पारंपरिक चिकित्सा का आधार है बल्कि देश की बड़ी आबादी को आजीविका और स्वास्थ्य सुरक्षा प्रदान कर रहा है। अनुमान के मुताबिक, देश के व्यापार में औषधीय पौधों की लगभग 1,178 प्रजातियां सक्रिय हैं, जिनमें से 242 प्रजातियों का वार्षिक खपत स्तर 100 मीट्रिक टन से अधिक है। यदि भारत की कुल घरेलू मांग (1,95,000 मीट्रिक टन) और निर्यात मांग (1,34,500 मीट्रिक टन) के विशाल राष्ट्रीय आंकड़ों को देखें, तो मरुधरा का योगदान विस्मित करता है। राजस्थान अकेले देश के कुल औषधीय पादप उत्पादन का 15 से 19 प्रतिशत पैदा करता है। राज्य में करीब 4.0 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में औषधीय फसलों की खेती हो रही है, जिससे सालाना 2.0 लाख मीट्रिक टन (MT) से अधिक का रिकॉर्ड उत्पादन प्राप्त हो रहा है।
यदि जिलावार परिदृश्य देखें, तो उत्पादन के मामले में बारां जिला पूरे राजस्थान में प्रथम स्थान पर है। इसके बाद उदयपुर है, जबकि राजसमंद और हनुमानगढ़ जैसे जिलों में प्रति वर्ष क्रमशः 66.6 प्रतिशत और 50.8 प्रतिशत की भारी दर से इस क्षेत्र का विस्तार (Expansion) हो रहा है।
हाल ही में मारवाड़ के 'नागौरी अश्वगंधा' को केंद्र सरकार द्वारा भौगोलिक संकेतक (GI Tag) प्रदान किया जाना इस बात का प्रमाण है कि राजस्थान की यह विपुल संपदा कैंसर, डिप्रेशन, डायबिटीज और कमजोर इम्यूनिटी जैसी दर्जनों गंभीर बीमारियों में रामबाण का काम कर रही है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी मांग उत्पादन से पांच गुना अधिक है। वैश्विक मंचों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा इसे पारंपरिक भारतीय उपहार के रूप में भेंट करना यह सिद्ध करता है कि थार की यह वनस्पति अब एक अंतरराष्ट्रीय ब्रांड बन चुकी है। जलवायु परिवर्तन के इस दौर में जहां पानी का संकट गहरा रहा है, पारंपरिक फसलों (जैसे बाजरा, गेहूं, सरसों) की तुलना में औषधीय पौधे आने वाले समय में किसानों को कई गुना बेहतर मुनाफा देने के लिए तैयार हैं।
1- जलवायु लचीलापन (Climate Resilient) :
ये फसलें भयंकर गर्मी, पाला और सूखे को आसानी से सहन कर सकती हैं।
2- कम लागत और कम पानी :
इनमें सिंचाई के लिए नाममात्र के पानी की जरूरत होती है और रासायनिक खादों का खर्च शून्य होता है।
3- कम उत्पादकता वाली भूमि (Low Productive Land) :
थार के रेतीले धोरे और अरावली की पथरीली बंजर जमीन, जहां सामान्य फसलें दम तोड़ देती हैं, वहां भी ये औषधियां बंपर उत्पादन देती हैं।
4- बढ़ती बाजार मांग और निर्यात क्षमता :
वैश्विक स्तर पर आयुर्वेद के प्रति बढ़ते भरोसे के कारण इन पौधों की राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में मांग और कीमतें लगातार आसमान छू रही हैं।
इस बढ़ते रुझान के बीच सबसे बड़ी चुनौती इस पूरे सेक्टर का असंगठित होना है। स्थानीय स्तर पर लघु या बड़े प्रोसेसिंग प्लांट्स न होने के कारण किसान बिचौलियों के जाल में फंस जाते हैं और बहुमूल्य फसल को औने-पौने दामों पर बेचने को मजबूर होते हैं। वर्तमान में यह रॉ-मटीरियल दूसरे राज्यों में जाकर प्रोसेस होता है।
इस परिदृश्य को बदलने में राजस्थान सरकार की आयुष नीति और कृषि विश्वविद्यालय, जोधपुर की वैज्ञानिक पहल एक उम्मीद बनकर उभरी हैं। विश्वविद्यालय ने नेशनल मेडिसिनल प्लांट्स बोर्ड (NMPB) के सहयोग से मारवाड़ की पांच अमूल्य वनस्पतियों-शंखपुष्पी, अग्निमनथ, अश्वगंधा, अपराजिता और जीवंती की उन्नत किस्मों, प्रसंस्करण और सीधे मार्केट लिंकेज पर काम शुरू किया है। लेकिन इस उद्योग को वैश्विक बल देने के लिए ब्लॉक स्तर पर उच्च गुणवत्ता वाले प्रामाणिक बीजों की उपलब्धता और किसानों में कटाई के बाद के प्रबंधन की अवेयरनेस बढ़ाना अनिवार्य है।
निष्कर्षत, इस धनतेरस पर राजस्थान के खेतों से आती औषधीय महक संदेश देती है कि असली धन हमारी माटी के कण-कण में छुपा है। हमें इस धनतेरस पर यह सामूहिक प्रण (संकल्प) लेना होगा कि आने वाले समय में हम इस पारंपरिक ज्ञान, समृद्ध वन-संपदा और कृषि-उद्योग की कड़ियों को वैज्ञानिक तकनीक के साथ वापस स्थापित करेंगे। यदि राज्य में ही प्रोसेसिंग प्लांट्स की श्रृंखला खड़ी कर दी जाए, तो यह हरित उद्योग बहुत आगे बढ़ सकता है। सरकार की नीतियां और औद्योगिक निवेश अगर इस क्षेत्र को 'संगठित' करने में जुट जाएं, तो वह दिन दूर नहीं जब राजस्थान पूरे भारतवर्ष की 'आरोग्य की राजधानी' बनेगा। यही मरुधरा के लिए वास्तविक धनतेरस होगी।
डॉ. प्रदीप पगारिया, कृषि विश्वविद्यालय, जोधपुर