
जोधपुर। किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक मुकदमों की संख्या मात्र के आधार पर उसे हिस्ट्रीशीटर मानकर पुलिस निगरानी में रखना उचित नहीं है। इसके लिए मुकदमों की प्रकृति, उनकी वर्तमान स्थिति, परिणाम और संबंधित व्यक्ति की आपराधिक गतिविधियों का समग्र आकलन जरूरी है। राजस्थान हाईकोर्ट ने एक मामले में यह महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए उदयपुर पुलिस अधीक्षक को हिस्ट्रीशीट और निगरानी जारी रखने के औचित्य पर नए सिरे से विचार करने के निर्देश दिए हैं।
न्यायाधीश सुनील बेनीवाल की एकल पीठ ने उदयपुर निवासी नरेश प्रजापत की ओर से दायर याचिका का निस्तारण करते हुए यह आदेश दिया। याचिकाकर्ता ने एक अप्रैल, 2025 को पुलिस अधीक्षक की ओर से खोली गई हिस्ट्रीशीट को निरस्त करने की मांग की थी। पीठ ने पाया कि पुलिस रिकॉर्ड में याचिकाकर्ता के खिलाफ वर्ष 1996 से 2025 के बीच कुल 12 मामले दर्ज बताए गए हैं। इनमें केवल एक मामले में सजा हुई, जो करीब 30 वर्ष पुराना है।
शेष मामलों में चार में अंतिम प्रतिवेदन पेश हुआ, तीन में बरी किया गया और दो मामलों में राजीनामा हुआ, जबकि दो मामले विचाराधीन हैं। इसके बाद कोई अन्य सजा नहीं हुई। पीठ ने स्पष्ट किया कि राजस्थान पुलिस नियम, 1965 के तहत हिस्ट्रीशीट खोलने के लिए दोषसिद्धि हमेशा अनिवार्य नहीं है, लेकिन संबंधित व्यक्ति को आदतन अपराधी मानने के लिए सक्षम अधिकारी के पास उचित आधार होने चाहिए। केवल मुकदमों की संख्या को निगरानी जारी रखने का निर्णायक आधार नहीं बनाया जा सकता।
हाईकोर्ट के आदेश के बाद अब उदयपुर पुलिस अधीक्षक को याचिकाकर्ता की हिस्ट्रीशीट पर उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर दोबारा निर्णय करना होगा। इसके लिए याचिकाकर्ता को दो सप्ताह के भीतर संबंधित दस्तावेजों के साथ अपना पक्ष रखने का अवसर दिया गया है। प्रत्यावेदन मिलने के बाद एसपी को आठ सप्ताह में फैसला करना होगा। इस दौरान पुलिस को पुराने मामलों के रिकॉर्ड के साथ उनकी मौजूदा स्थिति भी देखनी होगी।
राजस्थान पुलिस नियम, 1965 के तहत किसी व्यक्ति की हिस्ट्रीशीट खोलने के लिए दोषसिद्धि अनिवार्य शर्त नहीं है। पुलिस आदतन अपराधियों की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए हिस्ट्रीशीट खोल सकती है, लेकिन इसके लिए ठोस आधार होना जरूरी है। संबंधित व्यक्ति के खिलाफ दर्ज मामलों की प्रकृति, अपराधों में उसकी संलिप्तता, मुकदमों के परिणाम और मौजूदा गतिविधियों का आकलन करना आवश्यक है। केवल मुकदमों की संख्या के आधार पर किसी को आदतन अपराधी नहीं माना जा सकता।