
ओमाराम पटेल और रमेश भाटी। फोटो: पत्रिका
जोधपुर। लोकतंत्र में जनता का मूड कब बदल जाए, इसका अंदाजा लगाना आसान नहीं है। जोधपुर के पास सालावास गांव में इसका दिलचस्प उदाहरण सामने आया है। चुनाव से पहले जिस निवर्तमान सरपंच को ग्रामीणों ने धन्यवाद सभा में निर्विरोध चुनने का भरोसा दिया था, उन्हें चुनाव में 722 मतों से हार का सामना करना पड़ा। दो बार सरपंच रह चुके ओमाराम पटेल की राह में गांव के युवाओं ने ऐसा मुद्दा खड़ा किया कि न केवल चुनाव करवाना पड़ा, वरना चुनाव का पूरा गणित बदल गया। यह मुद्दा था बेटियों के लिए कॉलेज की स्थापना का।
सितंबर में ओमाराम पटेल ने अपने कार्यकाल के लिए ग्रामीणों का आभार जताने धन्यवाद सभा आयोजित की थी। सभा में सैकड़ों लोगों की मौजूदगी में ग्रामीणों ने उनके कामकाज को देखते हुए उन्हें तीसरी बार निर्विरोध सरपंच बनाना तय कर लिया। गांव के बुजुर्गों और प्रभावशाली लोगों के इस फैसले से लगा कि चुनाव महज औपचारिकता रह जाएगा। लेकिन युवाओं को यह मंजूर नहीं था। उनका तर्क था कि सरपंच का चयन केवल पुराने कामकाज के आधार पर नहीं, बल्कि गांव के भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखकर होना चाहिए।
युवाओं ने इस मुद्दे पर अलग बैठक की और भामाशाह रमेश भाटी को चुनाव मैदान में उतारने का फैसला किया। गांव के भामाशाह भाटी ने बेटियों के लिए कॉलेज की जमीन और भवन उपलब्ध कराने की घोषणा की। इसके बाद युवाओं ने घर-घर जाकर ग्रामीणों से शिक्षा के मुद्दे पर समर्थन मांगा। शुरुआत में बुजुर्गों का एक वर्ग इससे सहमत नहीं था, लेकिन युवा अपने फैसले पर अड़े रहे।
30 अक्टूबर को हुए चुनाव से पहले दोनों उम्मीदवारों ने नामांकन दाखिल किया। आमतौर पर गांव में सरपंच पद के लिए छह-सात उम्मीदवार मैदान में उतरते हैं, लेकिन इस बार मुकाबला सीधा दो प्रत्याशियों के बीच रहा। सालावास गांव में करीब 6300 वोट है। मतगणना के बाद रमेश भाटी 722 मतों के अंतर से विजयी रहे। चुनाव में रमेश भाटी को 3241 वोट मिले।
ग्रामीणों ने निर्विरोध तय तो कर लिया था लेकिन राजनीति में उलटा-पुलटा हो ही जाता है।
-ओमाराम पटेल, पूर्व सरपंच, सालावास
चुनाव में शिक्षा ही एकमात्र एजेंडा होना चाहिए। शिक्षा से ही विकास संभव है।
-रमेश भाटी, नवनियुक्त सरपंच, सालावास
Updated on:
2 Nov 2026, 8:50 AM IST
Published on:
2 Nov 2026, 8:48 AM IST
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