
B- आधुनिक कृषि तकनीक और प्राकृतिक खेती के सहारे विकास की ओर अग्रसर किसानB
रिपोर्ट- जयकुमार भाटी
बालोतरा। थार मरुस्थल के मुहाने पर बसे बालोतरा में जलवायु परिवर्तन की चुनौतियां और औद्योगिक विकास की संभावनाएं एक साथ दिखाई देती हैं। बालोतरा जिले में एक ओर भीषण गर्मी से बढ़ते तापमान, अनिश्चित मानसून, जल संकट और औद्योगिक रासायनिक प्रदूषण से पर्यावरणीय संकट ने यहां की जीवनशैली और कृषि व्यवस्था को प्रभावित किया है, तो दूसरी ओर औद्योगिक विकास, आधुनिक कृषि तकनीक और प्राकृतिक खेती की नई सोच भी आकार ले रही है।
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Bरिफाइनरी युग और पर्यावरण की बड़ी परीक्षाB
बालोतरा इस समय देश के सबसे बड़े औद्योगिक परिवर्तनों में से एक का साक्षी बना हुआ है। पचपदरा क्षेत्र में एचपीसीएल राजस्थान रिफाइनरी (एचआरआरएल) के कारण जिले की आर्थिक तस्वीर बदल रही है। वहीं, इस औद्योगिक विकास के साथ पर्यावरण संरक्षण की चुनौती भी बढ़ी है। ऐसे में जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण की दोहरी मार के बीच क्षेत्र में हरित संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता पहले से अधिक महसूस की जा रही है।
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Bड्रिप इरिगेशन तकनीक से नई संभावनाएंB
भीषण गर्मी और पानी की कमी से जूझते बालोतरा के किसानों ने आधुनिक ड्रिप इरिगेशन तकनीक को अपनाकर खेती की नई संभावनाएं तलाश ली हैं। सिवाना और आसपास के क्षेत्रों में किसान पारंपरिक फसलों के साथ अनार, खजूर, बेर और जीरे की खेती कर रहे हैं। किसान राजूराम ने बताया कि अनार को यहां का ‘लाल सोना’ कहा जाने लगा है। ओमसिंह राजपुरोहित ने बताया कि बूंद-बूंद सिंचाई तकनीक से कम पानी में बेहतर उत्पादन संभव होने से पारंपरिक खरीफ फसलों बाजरा, मूंग, ग्वार और मोठ के साथ बागवानी फसलों ने किसानों की आय के नए रास्ते खोले हैं।
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Bप्राकृतिक खेती की ओर लौट रहे अन्नदाताB
टेक्सटाइल उद्योग के लिए प्रसिद्ध बालोतरा लंबे समय से पर्यावरणीय चुनौतियों से भी जूझ रहा है। उद्योगों से निकलने वाले रासायनिक पानी के कारण लूणी और जोजरी नदियों सहित कई क्षेत्रों की भूमि और जल स्रोत प्रभावित हुए हैं। जिले के अराबा, डोली, कल्याणपुर सहित आसपास के गांवों की हजारों हेक्टेयर कृषि भूमि पर इसका असर पड़ा है। ऐसे में टेक्सटाइल उद्योग के रासायनिक अपशिष्ट और बढ़ते तापमान से प्रभावित कृषि भूमि को बचाने के लिए जिले में प्राकृतिक और जैविक खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है। हीरा की ढाणी व गिडा सहित विभिन्न क्षेत्रों में किसानों को जैविक खेती, देशी खाद और भूमि संरक्षण के प्रति जागरूक कर रहे है। ऐसे में किसानों में प्राकृतिक खेती के प्रति जागरूकता बढ़ने से वे खेतों में इसे अपनाने लगे है।
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Bएक्सपर्ट व्यूB
जलवायु परिवर्तन के दौर में कम पानी वाली फसलें, ड्रिप सिंचाई और प्राकृतिक खेती ही शुष्क एवं अर्ध-उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों के लिए सबसे प्रभावी विकल्प हैं। इससे मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है, जल संरक्षण होता है और किसानों की लागत भी कम होती है।
B- कृष्णा सहारण,B कृषि विशेषज्ञ
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