
- थार में दिख रही आपसी भाईचारे की मिसाल
बाड़मेर. पश्चिमी राजस्थान के बाड़मेर जिले में मानसून की बारिश के बाद जहां खेतों में फसलें लहलहाने लगी हैं, वहीं पश्चिमी राजस्थान की वर्षो पुरानी सामूहिकता और लोक संस्कृति की प्रतीक ‘लाह’ परंपरा भी जीवंत हो उठी है। थार के ग्रामीण क्षेत्रों में आपसी सहयोग, सद्भाव और सामुदायिक सहभागिता का यह अनूठा दृश्य हर किसी का मन मोह रहा है।
उपखंड क्षेत्र की ग्राम पंचायत मोतियोणियों का तला के राजस्व गांव गेनोणी (बेरड़ो की ढाणी) से एक मनमोहक दृश्य सामने आया है। यहां किसान तेजाराम बेरड़ के खेत में उगी अनचाही खरपतवार (निराई-गुड़ाई) को निकालने के लिए गांव-ढाणी के लोग एक साथ एकजुट हुए। इस सामूहिक श्रम से किसान का दिनों का काम कुछ ही घंटों में पूरा हो जाता है। आधुनिकता और मशीनीकरण के इस दौर में भी गांवों में ‘लाह’ का जीवित रहना यह साबित करता है कि थार की मिट्टी में आज भी अपणायत और सहयोग की जड़ें बहुत गहरी हैं।
Bक्या है ‘लाह' परंपरा’B
थार के पारंपरिक कृषि जीवन में ‘लाह' एक ऐसी व्यवस्था है, जिसमें बिना किसी आर्थिक लेन-देन (मजदूरी) के केवल सामूहिक सहयोग के भाव से कृषि कार्य निपटाए जाते हैं। यह थार की सामूहिकता और नि:स्वार्थ मदद की वह धरोहर है जो सदियों से पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही है।
Bसामूहिक सहभागिता:B जब किसी किसान के खेत में बीजाई, निराई-गुड़ाई (खरपतवार निकालना) या फसल की कटाई जैसा बड़ा काम होता है, तो गांव व आसपास की ढाणियों के कई लोग अपने हाथ में कसिया, कुदाली या दराती लेकर खुद-ब-खुद मदद के लिए पहुंच जाते हैं।
Bस्नेह और सम्मान की रसोई:B इस श्रमदान के बदले खेत मालिक (किसान) उनसे कोई मजदूरी का सौदा नहीं करता, बल्कि खुशी-खुशी उन सभी मददगारों को दोनों समय का स्वादिष्ट, पारंपरिक व भरपेट भोजन हलवा और देशी बाजरे का चूरमा करवाता है।
B महत्व: लोक-संस्कृति का उत्सवB
यह परंपरा पश्चिमी राजस्थान की उस भावना को दर्शाती है जहां विपरीत परिस्थितियों और रेगिस्तानी ढलानों के बीच भी जीवन आपसी भाईचारे के सहारे सुलभ बनता है। एक साथ काम करते हुए किसान लोकगीत गाते हैं, हंसी-ठिठोली करते हैं और सुख-दुख साझा करते हैं, जिससे ग्रामीण सामाजिक ताना-बाना मजबूत होता है।