
राजस्थान हाईकोर्ट के जस्टिस संगीत लोढा व जस्टिस अरूण भंसाली की विशेष खंडपीठ ने शुक्रवार को एक जनहित याचिका की सुनवाई में सरकार पर फिर से तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि पहले तो सरकार लोगों को मुआवजा देने का कानून बनाती है, और बाद में जब भुगतान करना होता है तो उससे बचने के रास्ते ढूंढती है।
खंडपीठ ने यह टिप्पणी बीकानेर शहर के बीचोबीच से गुजरने वाली रेलवे लाइन पर एलिवेटेड रोड बनाने अथवा शहर के बाहर से बाईपास निकालने के सवाल पर दायर जनहित याचिका की सुनवाई में की। राष्ट्रीय विधि विवि के एक विद्यार्थी मुकुल कृ ष्ण की ओर से दायर इस याचिका की सुनवाई के दौरान हालांकि राज्य सरकार और रेलवे दोनों की ओर से कोर्ट को बताया गया कि विगत 27 वर्ष से जारी इस समस्या का रेलवे ऑथोरिटीज व सरकार के उच्चाधिकारियों ने एलिवेटेड रोड के रूप में समाधान निकाला है। मामले की सुनवाई अधूरी रही तथा अगली सुनवाई 9 नवंबर को दोपहर 2 बजे होगी।
इन्टरवेनर्स ने किया विरोध
सुनवाई के दौरान याचिका में इंटरवेन कर रहे बीकानेर के ही अधिवक्ता आरके दास गुप्ता, एसडी व्यास व एनएस राठौड सरकार के इस प्रस्ताव का विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि यदि एलिवेटेड सडक बनती है तो केईएम रोड स्थित सडक के दोनों ओर की कई दुकानें डार्क जोन में चली जाएंगी और उनका व्यापार खतम हो जाएगा। इसी बहस के चलते खंडपीठ को लगता है कि सरकार बाइपास के खर्च से बचने के लिए एलिवेटेड रोड बनाने पर अडी हुई है।
बाइपास में चार आरओबी बनेंगे
सुनवाई के दौरान रेलवे और यूआईटी बीकानेर की ओर से पैरवी करते हुए कमल दवे और मनोज भंडारी ने कहा कि पिछले 27 बरसों के दौरान बीकानेर में कई आरओबी निर्मित हो चुके, अब सिर्फ कोटगेट का मामला बचा है, जहां एलिवेटेड सड़क ही मात्र तुरंत सॉल्युशन है। उन्होंने कहा कि यदि बाइपास बनाया जाता है तो फिर से लंबा समय तो लगेगा ही। साथ में चार और सड़कों पर आरओबी और छह स्थानों पर रेलवे क्रॉसिंग बनानी पड़ेंगी। साथ ही दो या तीन नये स्टेशन भी बनाने होंगे। इस पर खंडपीठ ने मौखिक टिप्पणी की कि जनहित में यह सब कराना है तो कराना पड़ेगा।