अक्सर आपने लोगों से यह सुना होगा कि अब तो पचास या साठ साल की उम्र हो गई है। अब काम करने के दिन नहीं रहे। अब तो बस जिन्दगी गुजार रहे हैं। गिने-चुने ही एेसे लोग हैं, जिनका मानना है कि काम करने की कोई उम्र नहीं होती, बस आपके मन में कुछ करने के लिए संकल्प व दृढ़ इच्छा शक्ति होनी चाहिए।
अक्सर आपने लोगों से यह सुना होगा कि अब तो पचास या साठ साल की उम्र हो गई है। अब काम करने के दिन नहीं रहे। अब तो बस जिन्दगी गुजार रहे हैं। गिने-चुने ही एेसे लोग हैं, जिनका मानना है कि काम करने की कोई उम्र नहीं होती, बस आपके मन में कुछ करने के लिए संकल्प व दृढ़ इच्छा शक्ति होनी चाहिए। फिर उम्र कोई मायने नहीं रखती। एेसी ही हैं मातेश्वरी आर्य। एक्सपोज रिपोर्टर ने उनसे बातचीत की।
नौकरी के चलते दब गई थी इच्छा
नागरिक सुरक्षा विभाग में लगभग 40 साल सेवा देने के बाद मातेश्वरी आर्य पांच साल पहले बतौर डिप्टी कंट्रोलर सेवानिवृत्त हुईं। वह महिला चाहतीं तो अन्य लोगों की तरह आरामदायक जिन्दगी जी सकती थीं, लेकिन एक घटना ने उनके जीवन की दिशा बदल दी। मातेश्वरी बताती हैं कि, नौकरी के दौरान कई बार आपातकाल स्थितियों में उन्हें तुरन्त फील्ड में जाना पड़ता था। उन्होंने देखा कि कई घरों में एेसे एकल पुरुष व बुजुर्ग दम्पती रखते थे, जिन्हें दो वक्त की रोटी खिलाने वाला कोई नहीं था।
उनकी इच्छा होती कि उनके लिए व्यवस्था करें, लेकिन सरकारी सेवा में रहते यह सब संभव नहीं हो पा रहा था। लेकिन उन्होंने अपने मन में ठान लिया कि जिन्दगी के अनुभवी हाथों की मददगार एक दिन जरूर बनेंगी। सरकारी सेवा पूरी करके घर आते ही उन्होंने अपने सपने को साकार करना शुरू कर दिया।
इससे बड़ी क्या सेवा
मातेश्वरी उन बुजुर्गों तक खाना पहुंचाती हैं, जिनके घर पर खिलाने वाला या बनाने वाला कोई नहीं है। एेसे लोगों तक खाना पहुंचाने से ज्यादा कठिन तो उन्हें ढूंढऩा था। तब सम्पर्क बढ़ाया और एकल बुजुर्ग या एेसे दम्पतियों की खोज करने लगीं। दिनभर एक से दूसरी, दूसरी से तीसरी गली। कारवां आगे बढ़ता गया।
वे बताती हैं कि सुबह चार बजे उठकर बुजुर्गों के खाने की तैयारियां शुरू कर देती हैं। दस बजे टिफिन तैयार हो जाते हैं और फिर बेसहारा बुजुर्गों तक गर्मा-गर्म खाना पहुंचा दिया जाता है। इसके लिए वे कोई शुल्क नहंी लेती हैं।
पदम वडेरा से मिली प्रेरणा
मातेश्वरी बताती हैं कि हर घर तक टिफिन पहुंचाना उसके बस की बात नहीं है और इतना पैसा भी नहीं है कि वे इस काम के लिए किसी को रख सकें। इसलिए जहां टिफिन पहुंचाना होता है, उस रास्ते से सुबह-शाम गुजरने वाले सरकारी व निजी कार्यालयों में काम करने वाले कर्मचारियों सहित अन्य लोगों से सम्पर्क किया।
कई लोग आगे आए और उनकी मदद से बुजुर्गों तक टिफिन पहुंचाया जाता है। वे खुद भी आसपास के घरों में रहने वाले बुजुर्गों के लिए टिफिन ले जाती हैं। उनके घरों के छोटे-मोटे काम भी कर देती हैं। इसके लिए उन्हें पदम वडेरा से भी प्रेरणा मिली। अखबार में उनका साक्षात्कार पढ़कर, उनसे बात की और जानकारी ली। साथ ही मन संस्थान के योगेश लोहिया भी उनकी मदद कर रहे हैं। उनके परिवार को भी पूरा सहयोग मिल रहा है।
नहीं चाहिए एक भी पैसा
राइका बाग में रहने वाली मातेश्वरी पावटा, राइका बाग, रातानाडा, अजीत कॉलोनी, सरदारपुरा सहित आसपास के क्षेत्रों में बुजुर्गोँ को निशुल्क खाना खिलाती हैं। इसके लिए फंड कहां से मिलता है, यह पूछे जाने पर उन्होंने बताया कि इस सेवा कार्य के लिए किसी से एक रुपए तक नहीं लेती हैं और ना ही कभी लेंगी।
अगर कोई मदद करना चाहता है, तो एेसे लोगों से कहती हैं कि वे चावल, गेहूं, घी, दाल सहित अन्य राशन की सामग्री उपलब्ध करवा दें। बुजुर्ग उनसे खाने के लिए सम्पर्क कर सकते हैं। जो लोग टिफिन बनाकर दे सकते हैं, वे भी उनसे मिल सकते हैं। उनसे मोबाइल नंबरों 9166864731, 9251011116 पर सम्पर्क कर सकते हैं।