मायावती ने गठबंधन का ऐलान कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सीधे चुनौती पेश की...
कानपुर. बसपा सुप्रीमो मायावती के हाथी की दहाड़ 2012 से लेकर 2017 विधानसभा चुनाव तक नहीं सुनाई दी। 80 में से एक भी लोकसभा सीट में खाता नहीं खुला तो यूपी से महज 19 विधायक जीतकर विधानसभा पहुंचे। इसी के बाद बसपा चीफ ने रणनीति में बदलाव किया। पार्टी के अंदर कुछ परिवर्तन किए तो नए नेताओं को अहम पदों पर बैठाया। पहले सारे निर्णय खुद करती थीं, लेकिन तीन चुनाव में मिली करारी हार के बाद रणनीतिकारों के साथ मंथन कर फूलपुर, गोरखपुर, कैराना और नूरपुर समाजवादी पार्टी का समर्थन कर सटीक चाल चली, जो कारगर साबित हुई। नतीजा यह हुआ कि बीजेपी को एक भी सीट नहीं मिली और इसी के बाद मायावती ने गठबंधन का ऐलान कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सीधे चुनौती पेश की तो वहीं अखिलेश यादव और राहुल गांधी को बैकफुट पर ला दिया। जानकारों की मानें तो बसपा अपने 22 फीसदी वोट के बल पर यूपी के अलावा अन्य राज्यों में सहयोगी दलों से सीटें लेगी तो बदले में यूपी में उन्हें कुछ सीटें देगी।
इसलिए दिया था उपचुनाव में समर्थन
लोकसभा और विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद बसपा प्रमुख ने पार्टी को दोबरा पटरी पर लाने के लिए काम करना शुरू कर दिया। कई कद्दावर नेताओं को दल से बाहर किया तो नए और करीबी नेताओं के बड़े ओहदे पर बैठाया। सत्ताधारी से लेकर अन्य विरोधी दल आपस में उलझते रहे, वहीं मायावती खिसके वोटबैंक को वापस पाने के लिए अंदरखाने कैडर को मजबूत करती रहीं। 2012 में जिन विधायक को टिकट काट कर पार्टी से बाहर किया, उनकी घर वापसी कराई। नसीमुद्दीन को बाहर कर राज्यसभा सांसद सतीश मिश्रा और डॉक्टर अशोक सिद्धार्थ जैसे नेताओं को अपनी रणनीतिकारों की टीम में जगह दी। इसी के बाद मायावती अपने खास रणनीतिकारों के साथ कैडर को दोबारा खड़ा करनी की रणनीति बनाई तो वहीं यूपी के लोकसभा उपचुनाव में सपा को समर्थन देकर अपनी ताकत परखी। बीजपी की हार के बाद मायावती महगठबंधन के प्लॉन की तरफ कदम बढ़ा दिए और उनके बिना बुलावे पर अखिलेश यादव और राहुल गांधी खुद गठबंधन का हिस्सा बनने की रजामंदी दे दी।
22 फीसदी वोट बसपा के पास
2014 के आम चुनाव में बीएसपी को भले ही एक भी सीट नहीं मिली, लेकिन 4.3 प्रतिशत वोट के साथ वह बीजेपी और कांग्रेस के बाद देश की तीसरी सबसे बड़ी पार्टी थी। 2009 के आम चुनाव में बीएसपी को अब तक सबसे ज्यादा 6.17 प्रतिशत वोट हासिल हुए थे। 2014 के आम चुनाव में उत्तर प्रदेश में बीएसपी को 20 फीसदी वोट मिले थे और 2017 के विधानसभा चुनाव में यह आंकड़ा बढ़ कर 22 प्रतिशत हो गया है। मतलब मायावती की अगुवाई में बीएसपी अकेले दम पर बहुत ताकतवर हैं। जानकारों की कहना है कि सपा, बसपा और कांग्रेस के साथ आने से बीजपी के अंदर जबरदस्त बेचैनी है। क्योंकि अगर ये तीनों दल साथ आ गए तो यूपी की 80 में से 75 सीटें जीतने का सपना भाजपा का अधूरा रह सकता है। क्योंकि मायातवी दो चुनावों में सीट चाहे कम ही पाई हो पर उनका वोट प्रतिशत बढ़ा है और सपा, कांग्रेस के साथ आने से यूपी में बड़ा उलटफेर कर सकती हैं।
इन चेहरों को भी लाएंगी साथ
मायावती के इस मिशन में बड़ी चुनौती दलितों में उभर रहे क्षेत्रीय क्षत्रप भी हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में और उसके बाद से मायावती की सबसे बड़ी मुश्किल भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर बने हुए हैं। गुजरात के दलित नेता जिग्नेश मेवाणी चंद्रशेखर के काफी करीब रहे हैं और उस समय वह भी मायावती के विरोध में थे। अचानक जिग्नेश के रुख में हुआ बदलाव मायावती के लिए राहत की बात है। सूत्रों की मानें तो मायावती के एक करीबी नेता हार्दिक पटेल, अल्पेश ठाकोर, और जिग्नेश मेवाणी के संपर्क में है और लोकसभा चुनाव में तीनों युवा नेता मायातवी के साथ चुनावी रैलियों में दिखेंगे। बसपा नेता दयाराम कुरील कहते हैं कि हमें देश से मनुवादी शक्तियों को हटाना है और इसी के चलते सभी राजनीतिक दल एक साथ धीरे-धीरे कर आ रहे हैं और बसपा प्रमुख के नेतृत्व में 2019 का चुनाव लड़ेंगे।
कानपुर नगर से चुनाव लड़ेगी कांग्रेस
सपा, बसपा और कांग्रेस के गठबंधन के बाद सीटों को लेकर जो बात सामने निकल कर आ रही है। उसके मुताबिक कानपुर नगर से कांग्रेस तो रनिया-अकबपुर से बसपा का उम्मीदवार चुनाव के मैदान में होगा। वहीं इटावा, मैनपुरी, कन्नौज और मिश्रित सीट पर अखिलेश यादव साइकिल दौड़ाएंगे। वहीं फतेहपुर, फर्रूखाबाद, जालौन, झांसी, बांदा, हमीरपुर-महोबा से बसपा के उम्मीदवार चुनाव के मैदान में होंगे। इस लिहाज से जहां अखिलेश को उनके वोट बैंक के तहत सीटें दी गई हैं, वहीं कांग्रेस से एक सीट छीन ली गई है। सूत्रों की मानें तो रनियां-अकबरपुर से बसपा दूसरे नंबर पर रही थी, जबकि कांग्रेस बुरी तरह से चुनाव हार गई थी। इसी के चलते ये सीट भी बसपा अपने पास रखना चाहती है। इस सीट से पूर्व सांसद राजाराम पाल अपनी दावेदारी पेश कर चुके हैं।