कानपुर

वाईवैक्स पैरासाइड के प्रभाव को कम करने के लिए दी जाने वाली क्लोरोक्वीन दवा हुई बेअसर

बारिश के साथ मच्छरों का प्रकोप बढऩे लगा है. वेक्टर बार्न डिसीज में बेहद खतरनाक माने जाने वाले वाईवैक्स पैरासाइड इस बार म्यूटेट हो गया है. इसकी वजह से इसके इलाज में दी जाने वाली कई जरूरी दवाइयां मरीजों पर बेअसर हो रही हैं, जिन मच्छरों के जरिए यह पैरासाइड फैलता है उन पर मॉस्कीटो क्वाइल भी असर नहीं कर रही.

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Sep 15, 2018
वाईवैक्स पैरासाइड के प्रभाव को कम करने के लिए दी जाने वाली क्लोरोक्वीन दवा हुई बेअसर

कानपुर। बारिश के साथ मच्छरों का प्रकोप बढऩे लगा है. वेक्टर बार्न डिसीज में बेहद खतरनाक माने जाने वाले वाईवैक्स पैरासाइड इस बार म्यूटेट हो गया है. इसकी वजह से इसके इलाज में दी जाने वाली कई जरूरी दवाइयां मरीजों पर बेअसर हो रही हैं, जिन मच्छरों के जरिए यह पैरासाइड फैलता है उन पर मॉस्कीटो क्वाइल भी असर नहीं कर रही. कारण है कि क्योंकि मच्छरों ने इनके प्रति रजिस्टेंस डेवलप कर ली है. एलएलआर हॉस्पिटल की ही ओपीडी में रोज इससे पीडि़त 20 से 25 पेशेंट्स पहुंच रहे हैं. जिनके इलाज के लिए डॉक्टर्स को बिल्कुल नई लाइन ऑफ ट्रीटमेंट प्रयोग करनी पड़ रही है.

कई सालों बाद हुआ ऐसा
दरअसल मलेरिया फैलाने में पैल्सीफेरम और वाईवैक्स पैरासाइड सबसे अहम होते हैं. पैल्सीफेरम जिसे खूनी मलेरिया भी कहते हैं. इसका असर तीन चार साल पहले तक था. इससे पीड़ित पेशेंट्स ज्यादा आते थे, लेकिन अब वाईवैक्स पैरासाइड का असर काफी ज्यादा है. जिला महामारी वैज्ञानिक डॉ. देव सिंह की माने तो कई सालों बाद वाईवैक्स पैरासाइड का इतना असर दिख रहा है. इस पैरासाइड के ज्यादा असरदार होने की एक वजह एंटीबायोटिक दवाओं का अंधाधुंध प्रयोग भी है. जिसकी वजह से मरीजों को इलाज के दौरान दी जाने वाली कई दवाएं बेअसर साबित हो रही हैं.

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मच्छर बन रहे हैं वाहक
वाईवैक्स पैरासाइड मच्छरों से ही फैलता है. बारिश रुकने के साथ ही जलभराव की वजह से मच्छरों का प्रकोप लगातार बढ़ा है. ऐसे में मादा एनोफिलिज मच्छर भी तेजी से बढ़ रहे हैं. इसके लार्वा पानी में 30 से 35 दिन तक जिंदा रहते हैं. ऐसे में इनमें ज्यादा प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो रही है. क्वायल इत्यादि का असर नहीं होने से मच्छरदानी का प्रयोग करना ज्यादा असरदार होगा. मालूम हो कि इस साल अभी तक 86 मरीजों को मलेरिया की पुष्टि हुई है. इनमें से ज्यादातर वाईवैक्स पैरासाइड से पीडि़त ही हैं.

ऐसा कहते हैं जानकार
मेडिकल कॉलेज में पैथोलॉजी डिपार्टमेंट के एचओडी प्रो. महेंद्र सिंह कहते हैं कि पैरासाइड और वायरस समय समय पर म्यूटेट होते रहते हैं. साथ ही इनमें प्रतिरोधक क्षमता विकसित होती है. जांचों में यह साफ होता है. इसी के मुताबिक जनरल प्रैक्सिनर्स को लाइन ऑफ ट्रीटमेंट तय करनी होती है.

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Published on:
15 Sept 2018 02:03 pm
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