
कानपुर। तीन दशक पहले कानपुर का नाम कपड़ों के शहर के नाम पर पूरा वर्ल्ड में जाना जाता था। लाल इमली और इल्गिन के बने वस्त अमेरिका और जापान के लोग इस्तेमाल करते थे। तभी इसे एशिया का मैनचेस्टर कहा जाता था। लेकिन राजनीतिक उपेक्षा के चलते मिलों की आवज थम गई, लेकिन जिन्दादिल वालों का शहर फिर से खड़ा हुआ और जूते से लेकर हथियार बनाकर विश्वजगत में अपना नया मुकाम हासिल किया। पीएम के मेक-इन-इंडिया के सपने को सकार करने के लिए यहां की आर्डिनेंस फक्ट्रियां निरंतन नए-नए औजारों का निर्माण कर रही हैं और इसी के तहत ऑर्डनेंस फैक्ट्री बोर्ड (ओएफबी) की ऑर्डनेंस फैक्ट्री कानपुर (ओएफसी) ने पहली स्वदेशी ट्रक माउंट गन ईजाद की है जो कि अब तक तक विदेशों से आयात करनी पड़ती थी। चेन्नई के डिफेंस एक्सपो में लांचिंग के बाद इसे अंतरराष्ट्रीय ख्याति मिली है। जल्द ही यह गन सेना के बेड़े में शामिल हो जाएगी। रक्षा विशेषज्ञों की मानें तो यह हथियार जम्मू-कश्मीर सहित पूरे पाकिस्तान बार्डर पर दुश्मनों की गतिविधि को नेस्ताबूद कर देगा।
6 माह में बनकर तैयार
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मेक-इन-इंडिया के मिशन को पूरा करने के लिए ऑर्डनेंस फैक्ट्री बोर्ड (ओएफबी) की ऑर्डनेंस फैक्ट्री कानपुर (ओएफसी) स्वदेशी हथियारों के निर्माण के कार्य में लगा हुआ है। पिछले दिनों तोपों के साथ कर्बाइन का निर्माण कर उन्हें सेना व अर्धसैनिक बलों को दिया है। इसी के तहत दोनों फैक्ट्रियों ने मिलकर स्वदेशी तकनीकि की ट्रक माउंट गन ईजाद की है, जिसे भारत पहले विदेशों से महंगी कीमत पर खरीदता था। ऑर्डनेंस डेवलपमेंट सेंटर (ओडीसी) के निदेशक ऋतुराज द्विवेदी ने बताया कि 155 एमएम 52 कैलिबर ट्रक माउंट गन है, जिसकी लांचिंग हाल ही में चेन्नई में आयोजित अंतरराष्ट्रीय डिफेंस मेले में ओएफबी ने भारत अर्थ मूवर्स लिमिटेड (बीईएमएल) के सहयोग से लांच की है। ऋतुराज द्विवेदी के मुताबिक ओएफसी में पिछले छह माह से इस प्रोजेक्ट पर काम ? कर रहा था इसमें लगने वाले कलपुर्जे पूरी तरह से स्वदेशी हैं और यहीं पर इन्हें तैयार किया गया है। साथ ही गन का बैरल यहीं डिजाइन किया गया। ओएफसी में ही निर्माण हुआ। ऋतुराज द्विवेदी ने बताया कि हमने बीईएमएल से सिर्फ ट्रक टाट्रा लिया है।
इन देशों के मौजूद है यह गन
ऋतुराज द्विवेदी ने बताया कि ट्रक माउंट गन अब तक फ्रांस, स्वीडन और इजरायल जैसे विकसित देश ही बना रहे थे। भारत सरकार वहीं से आयात करती थी। अब भारत ने भी यह गन तैयार कर ली है, जिससे सरकार का बड़ा बजट भी बचेगा। ऋतुराज द्विवेदी कहते हैं कि इसके निर्माण के लिए यहां के अफसरों और कर्मचारियों ने कड़ी मेहनत की और तब जाकर सफलता मिली। ऑर्डनेंस डेवलपमेंट सेंटर (ओडीसी) के निदेशक ऋतुराज द्विवेदी कहते हैं कि यह गन को हमारे साइंटिस्टों ने देेेेेेेेेेखा और इसे स्वदेशी तकनीकि से ढालने का प्रण लिया। यह अन्य गनों के मुकाबले हुत सस्ती और कारगर है। इसे पहाड़ी क्षेत्रों में सेना इस्तेमाल कर सकती है। गन के गोलों का निर्माण भी यहीं पर किया जा रहा है। निदेशक ऋतुराज द्विवेदी ने बताया कि हर मौसम में दुश्मनों को मुंहतोड़ जवाब देगी। सरहद पर आंतकियों की गतिविध को फांपकर सेना के जवान इससे फायर कर उन्हें खत्म कर सकते हैं।
42 किमी तक मार कर सकती है गन
ऑर्डनेंस डेवलपमेंट सेंटर (ओडीसी) के निदेशक ऋतुराज द्विवेदी ने बताया कि इस गन की विषेशता यह कि इसकी मूवेबिलिटी बहुत अच्छी है और मारक क्षमता 42 किलोमीटर से अधिक है। इसके अलावा विदेशी गन की तुलना में इसका वजन काफी कम है। निदेशक ऋतुराज द्विवेदी के मुताबिक डिफेंस एक्सपो चेन्नई में रक्षा उत्पादों को देखने के लिए थलसेना अध्यक्ष जनरल बिपिन रावत भी आए थे। जनरल रावत ने स्वदेशी ट्रक माउंट गन के साथ ही वहां प्रदर्शित कानपुर में बनी गन शारंग को भी काफी सराहना की थी। निदेशक ऋतुराज द्विवेदी ने बताया कि ट्रक माउंट गन की बैरल की टेस्टिंग पहले ही हो चुकी है। अब ट्रक पर गन लगने के बाद इसका अंतिम ट्रायल होना है। ओडीसी निदेशक ने बताया कि अधिकांश गन का ट्रायल ओडिशा स्थित बालासोर में होता है। अगले दो माह में इस गन का परीक्षण भी वहीं होने जा रहा है।