
कानपुर. शहर उदास है, अनहोनी की आशंका से दिल कांप रहा है। एक रिश्ता टूटने वाला है। एम्स- दिल्ली से अच्छी खबर नहीं है। भारतीय राजनीति के सर्वाधिक लोकप्रिय अटल बिहारी वाजपेयी का मस्तमौला कानपुर शहर से खास जुड़ाव था। इसी शहर में राजनीति शास्त्र की पढ़ाई के दौरान राजनीति का ऐसा चस्का लगाकि भारतीय राजनीति के पितामह बन गए। किसी वक्त कानपुर के सरसैया घाट पर गंगा किनारे हंसी-ठिठोली करने वाले अटल जी ताजिंदगी कानपुर की बेफिक्र जिंदगी के कायल थे। डीएवी कालेज से स्नातक और राजनीति शास्त्र में परा-स्नातक करने वाले अटल जी अक्सर कहते थे कि राजनीति करना तो कानपुर से सीखा है।
गंगा किनारे महफिल, एकांत में पढ़ाई
कानपुर में पढ़ाई-लिखाई के दौर में शाम के वक्त दोस्तों के साथ उनकी गंगा किनारे महफि़ल लगती लगती थी, जिसमें आजादी से जुड़े टापिक, कविताएं और गाने गाते थे, इसकी बाद गंगा के तट पर ही व्यायाम करते थे। गंगा स्नान के बाद सभी दोस्त अपने-अपने घर लौट आते थे., लेकिन वह दिए की रौशनी में पढ़ाई करते थे। बाद में गहरी सोच में डूबकर अपनी कविताओं को संजोते थे। विरोधियों को भी अपना कायल बनाने की कला पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी में बखूबी थी। जनसंघ के दौर में जब अटल जी मंच से बोलते थे तो विपक्षी भी चोरी-चुपके उनके भाषण को सुनने आते थे। कानपुर के डीएवी कॉलेज के उनके साथी भी इस दुनिया में नहीं हैं।
जिंदगी के 93 बसंत गुजरे, 9 साल पहले राजनीति से दूर हुए
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी अभी 93 साल के हैं। सेहत के कारण 9 साल पहले राजनीति से संन्यास लेने के बाद अटलजी दुनियादारी से दूर होते गए। कानपुर के छात्र जीवन में उनके साथी उन्हें अटल कहकर पुकारते थे। जैसा नाम वैसा काम। जो कह दिया, उसे करना तय है। इसी आदत के कारण अटल एक मजबूत और दृढ़ निश्चय वाले इंसान बने, लेकिन शांत-सौम्य स्वभाव के कारण उनके साथी और विरोधी दोनों फैन थे।
हमेशा अपनी असफलता से ली सीख
ऐसा नहीं है कि राजनीति में हमेशा उन्हें सफलता मिली हो, जब पहली बार लोकसभा का चुनाव लड़े तो हार नसीब हुई। हार से वह आहत नहीं हुए बल्कि हार से बहुत सीखने का मौका मिला। इसके बाद वर्ष 1957 में जनसंघ ने अटल बिहारी वाजपेयी को दोबारा लोकसभा के चुनाव में तीन सीटों से चुनाव लड़ाया। दो स्थानों से अटल जी हार गए, लेकिन लखनऊ ने अटल को अपना लिया था।