बीएसपी चीफ मायावती धीरे-धीरे गैर एनडीए दलों के बीच मुख्य किरदार में आ रही हैं...
कानपुर. मायावती ने कांशीराम से सियासत का ककहरा सिखा तो मुलायम सिंह ने सत्ता पर पहुंचाया। किसान नेता से विवाद हुआ तो दूरी बना ली और दलित, सवर्णव मुस्लिम वोट को अपने पाले में लाकर रामं मदिर आंदोलन के बाद प्रदेश में पूर्ण बहुमत से सरकार बनाई। लेकिन यूपी का सुल्तान अपने बेटे अखिलेश के साथ साइकिल दौड़ाई तो हाथी की दहाड़ खामोस हो गई। सत्ता अखिलेश के हाथों में आई और यहीं से मायावती के सियासत जमीन खिसकनी शुरू हो गई। बीजेपी ने लोकसभा चुनाव 2014 में नरेंद्र मोदी को बतौर प्रधानमंत्री उम्मीदवार घोषित किया तो यूपी के क्षत्रपों के सारे किले ढह गए। बसपा ने एक भी सीट नहीं जीती, पर पार्टी के वोटबैंक में ज्यादा गिरावट नहीं आई। विधानसभा और निकाय में मिली हार के बाद भी हाथी सुस्त नहीं पडा़, बल्कि ताकत के साथ खड़ा हुआ और 2018 आते-आते वो नंबर दो के पायदान में पहुंच गया। राहुल, अखिलेश सहित कई पार्टियों ने मायावती के सामने सरेंडर कर दिया और उनके नेतृत्व में चुनाव लड़ने का मन बना चुकी हैं।
14 माह से पार्टी को कर रही थीं खड़ा
विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद बसपा प्रमुख ने पार्टी को दोबरा पटरी पर लाने के लिए काम करना शुरू कर दिया। कई कद्दावर नेताओं को दल से बाहर किया तो नए और करीबी नेताओं के बड़े ओहदे पर बैठाया। सत्ताधारी से लेकर अन्य विरोधी दल आपस में उलझते रहे, वहीं मायावती खिसके वोटबैंक को वापस पाने के लिए अंदरखाने कैडर को मजबूत करती रहीं। 2012 में जिन विधायक को टिकट काट कर पार्टी से बाहर किया, उनकी घर वापसी कराई। नसीमुद्दीन को बाहर कर राज्यसभा सांसद सतीश मिश्रा और डॉक्टर अशोक सिद्धार्थ जैसे नेताओं को अपनी रणनीतिकारों की टीम में जगह दी, जिसका परिणाम रहा कि यूपी लोकसभा उपचुनाव के अलावा कर्नाटक में बीजेपी को पटखनी देकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बाद दूसरे ताकतवर नेता के रूप में उभरीं। मायावती ने अपने इशारे पर अखिलेश को नचाया तो राहुल गांधी को महज गिनती की सीटें देने पर राजी हुई।
5 की जगह 23 सदस्य
बीएसपी चीफ धीरे-धीरे गैर एनडीए दलों के बीच मुख्य किरदार में आ रही हैं। वह विपक्ष की ओर से प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवार भी हो सकती हैं। ऐसे में बीजेपी उनकी मजबूत घेराबंदी करना चाहती है। वहीं मायावती भी खुद को मजबूत करने में जुट गई है जिससे बीजेपी को टक्कर दे सकें। इसी के चलते बसपा प्रमुख मायातवी ने अपने संगठन का दायरा कई गुना बढ़ा दिया। संगठन के ढांचे में बदलाव कर सभी वर्गों को जोड़ा। मायावती के निर्देश पर जिले में 23 सदस्यों की बूथ कमिटियां की नियुक्ति हो चुकी है। जबकि पहले जितने चुनाव हुए उस वक्त पांच सदस्यों की बूथ कमिटियां होती थीं। इसी तरह जिला को-ऑर्डिनेटर के स्थान पर अब सेक्टर स्तर के प्रभारी बनाए हैं। ज्यादातर जिलों में 40 से ज्यादा सेक्टर प्रभारी बनाए जा रहे हैं।
इसलिए साधे हैं खोमाशी
सपा, बसपा और कांग्रेस के बीच लगभग-लगभग गठबंधन हो चुका है, लेकिन मायावती अभी भी खामोस हैं और इसके पीछे तीन राज्यों के चुनाव बताए जा रहे हैं। जानकारों का कहना है कि मायातवी मध्य प्रदेश राजस्थान और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में पार्टी को उसके कद के हिसाब से सीटों का बटंवरा का दबाव मनाए हुए हैं। यदि वो ऐसा नहीं करती तो वो यूपी में सपा के साथ चुनाव में उतर सकती हैं। इसी के चलते मायावती की मांग को कांग्रेस मान सकती है। वहीं, अखिलेश यादव पहले ही कह चुके हैं कि बीजेपी को हराने के लिए हम कम सीटों के लिए भी तैयार हैं। ऐसे में बीएसपी को यूपी में सबसे ज्यादा सीटें मिलने की उम्मीद है। उसी के अनुसार पार्टी ने तैयारी भी तेज कर दी है।
सभी वर्गों के साथ युवाओं की भागीदारी
मायावती लगातार दिल्ली में ही रहकर रोजाना प्रदेश के मंडलों की समीक्षा कर रही हैं। लखनऊ, आगरा, अलीगढ़, झांसी, चित्रकूट, मिर्जापुर, मेरठ, सहारनपुर और कानुपर मंडलों की भी वह अलग-अलग दिन बैठकें ले रही हैं। पार्टी सूत्रों के अनुसार बसपा की 23 सदस्यों की बूथ कमिटियां लगभगल गठित हो चुकी हैं। इसमें एक अध्यक्ष, महामंत्री और कोषाध्यक्ष का पद है। कमिटी में सभी वर्गों को भागीदारी दी गई है। उसमें भी 50 फीसदी युवाओं को जगी दी गई है। कुछ जिलों में पहले से ही को-ऑर्डिनेटर का पद नहीं है। जहां है, वहां भी इसे खत्म करते हुए उन्हें सेक्टर स्तर की जिम्मेदारी दी गई है। कोआर्डिनेटर नौशाद अली ने बताया पार्टी पूरी ताकत के साथ चुनाव के मैदान में उतरेगी। बसपा का कैडर पूरी ताकत के साथ पीएम मोदी सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए जमीन में जुटा है। 2019 में देश की प्रधानमंत्री बसपा प्रमुख मायावती ही बनेंगी।