करौली में 140 वर्ष पहले शुरू हुआ था महिला चिकित्सालय करौली जिला मुख्यालय पर शहर के भूडारा बाजार स्थित डाक्टरनी की गली में 140 साल पहले दो मंजिला हवेली में महिला चिकित्सालय शुरू हुआ हवेली के नीचे का हिस्सा वार्ड के रूप में तथा ऊपर का मेडिकल स्टाफ के आवास एवं डिस्पेंसरी के रूप में प्रयुक्त होता था। हालांकि उस समय इस भवन में हवा एवं रोशनदानों का अभाव था। इसके बावजूद इस अस्पताल की लोगों में पहचान थी, जिस कारण महिलाओं का काफी आना जाना रहता था। चिकित्सालय का संचालन नगरपालिका द्वारा किया जाता था।
अतीत के आइने से
करौली में 140 वर्ष पहले शुरू हुआ था महिला चिकित्सालय
करौली जिला मुख्यालय पर शहर के भूडारा बाजार स्थित डाक्टरनी की गली में 140 साल पहले दो मंजिला हवेली में महिला चिकित्सालय शुरू हुआ था।
हवेली के नीचे का हिस्सा वार्ड के रूप में तथा ऊपर का मेडिकल स्टाफ के आवास एवं डिस्पेंसरी के रूप में प्रयुक्त होता था। हालांकि उस समय इस भवन में हवा एवं रोशनदानों का अभाव था। इसके बावजूद इस अस्पताल की लोगों में पहचान थी, जिस कारण महिलाओं का काफी संख्या में आना जाना बना रहता था। इस चिकित्सालय का संचालन नगर पालिका द्वारा किया जाता था।
खास बात यह है कि उस समय भारत में महिलाओं की चिकित्सा योजना के तहत डफरिन फंड से आर्थिक सहायता मिलती थी। करौली नगरपालिका भारत की प्रथम ऐसी संस्था थी, जिसने महिलाओं को चिकित्सा सुविधा मुहैया कराने के लिए डफरिन फंड का उपयोग किया था।
स्थानीय स्तर पर चिकित्सकों के अभाव को देखते हुए नगर पालिका ने 1 जून 1886 से आगरा मेडिकल स्कूल में अध्ययनरत एक महिला छात्रा को 10 रुपए प्रतिमाह छात्रवृत्ति योजना प्रारंभ की। मुरादाबाद की रहने वाली एक ब्राह्मण स्त्री बीवी अशर्फी ने छात्रवृत्ति स्वीकार करके चिकित्सा शिक्षा प्राप्त की। चिकित्सा विज्ञान में डिप्लोमा की योग्यता प्राप्त करने के बाद वह करौली आ गई। तथा 18 अक्टूबर 1891 को महिला डिस्पेंसरी का कार्यभार संभाला।
वह बहुत प्रतिभावान महिला थी। उसने 3 वर्ष तक बेहतर सेवाएं करौली वासियों को प्रदान की। इस चिकित्सक की घरेलू परिस्थिति को देखते हुए राजपूताने के मुख्य चिकित्सा अधिकारी के आदेश से 6 सितंबर 1894 को यहां से स्थानांतरण कर दिया गया।
दूसरी महिला चिकित्सक उपलब्ध नहीं होने पर कुछ समय के लिए राजा को महिला चिकित्सालय बंद करना पड़ा।
एक वर्ष बाद अगस्त १८95 में आनंदी बाई ने रिक्त पद पर नियुक्ति के लिए आवेदन किया लेकिन उसके पास पद के अनुरूप योग्यता नहीं होने से नगर पालिका ने उसे 6 माह के प्रोवेशन पर नियुक्त किया। इस अवधि में उसकी सेवाएं संतोषजनक नहीं होने पर फरवरी 1896 में उसकी सेवाएं समाप्त कर दी गई। दूसरी महिला चिकित्सक उपलब्ध नहीं होने पर फिर डिस्पेंसरी को बंद किया गया।
हालांकि दो वर्ष बाद 1898 के शुरू में हरदोई -अवध में मेडिकल प्रेक्टिशनर रह चुकी एक बंगाली महिला श्रीमती ई.बोष को यहां पर नियुक्ति दी गई।
सन1898 की गर्मी में बंगाली महिला के बच्चे यहां की गर्मी को सहन नहीं कर सके और अंतत: उसने त्यागपत्र दे दिया लेकिन शीघ्र ही श्रीमती समुइल को ई.बोस के स्थान पर नियुक्ति मिल गई। इस महिला ने 1 वर्ष से अधिक समय तक अच्छा कार्य किया। राज्य के अधिकारियों से उसके रिश्ते बिगडऩे े पर नवंबर 1900 में उसका स्थानांतरण हो गया। इसके बाद दिसंबर 1900 में श्रीमती जार्ज ने आकर डिस्पेंसरी को नवजीवन प्रदान किया। श्रीमती जार्ज के बाद स्थानीय चिकित्सक एवं उसके अधीनस्थ की नियुक्ति होने पर डिस्पेंसरी सुचारू रूप से संचालित होने लगी। चिकित्सालय में नियुक्त महिला चिकित्सक के पद नाम से इस गली की प्रसिद्धि भी डाक्टरनी की गली के नाम से हुई। महिला चिकित्सालय के पड़ौसी प्रभुलाल कंपाउंडर ने भी इस चिकित्सालय में अपनी प्रारम्भिक सेवाएँ प्रदान की थीं ।