
कासगंज. जिनके राज में कभी सूर्य अस्त नहीं होता था, उन अंग्रेजों ने इसे बनाया था। बाद में इस पुल ने आजादी की लड़ाई देखी, बदलते कासगंज के पल पल का गवाह बना। आखिर में दुर्घटनाओं का कारण बनने लगा तो सदा—सदा के लिए इसका भी नामोंनिशां मिटा देने की तैयारी है। रेलवे की यह आरयूबी रेली से कासगंज आने वाली रेलों के लिए बनाई गई थी।
तेरह दशक रहा शहर के साथ
अंग्रेजों ने 4 जनवरी 1887 को इसका उदृघाटन किया था और इस तरह से 13 दशक तक सिंगल लेन का यह पुल शहर के काम आता रहा। जर्जर सिंगल लेन इस पुल को तीन दिन बाद रेलवे अधिकारी हटाने का काम करने वाले हैं। इससे पहले किसी भी तरह की दुर्घटना की आशंका के चलते एहतियातन इंतजाम किए जा रहे हैं। कासगंज से बरेली को जाने वाली बंद हो चुकी रेलवे लाइन पर स्थित है। इस पुल के नीचे से आगरा-एटा के अलावा मथुरा-बरेली की ओर वाहनों का आवागमन होता है। कासगंज-मथुरा राज्य मार्ग 33 पर स्थित यह रेलवे का अंडर पास पुल पिछले कई वर्षों से अनुपयोगी है।
गिर रहे ईंट पत्थर
कहा जाता है कि अंग्रेजों की बनाई इमारतें आज भी उसी दम खम से खड़ी हैं लेकिन अनुपयोगी होने व मरम्मत ना होने से इस रेलवे अंडर पास पुल से आये दिन ईंट- पत्थर गिरते रहते हैं। अंग्रेजी शासन के दौरान रेलवे का यह आरयूबी ब उस समय की आबादी के हिसाब से यह पुल केवल एक ही वाहन के निकलने के लिए था, लेकिन शहर की आबादी और वाहनों की तादात बढ़ने के कारण यह पुल समस्या की वजह बन गया। सकरा होने के कारण इस पुल पर अब तक दर्जनों हादसे हो चुके हैं, तो तमाम लोगों की जान जा चुकी है। वैसे भी यह पुल एटा-कासगंज के चार लेन होने में बाधा बना हुआ था। चार लेन बनाने का काम पुल और पेड़ों के कारण पिछड़ रहा था। अब इस पुल के हटने से यातायात व्यवस्था में सुधार होगा तो शहर को राहत मिलेगी।