कटनी

देश की आजादी के पहले 1927 से खुला है जिला सहकारी बैंक, लेकिन नहीं है यह सुविधा

देश की आजादी के 9 फरवरी पहले 1927 से जिला सहकारी बैंक और जिलेभर में उसकी 9 ब्रांचें खुली हुईं हैं।

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Dec 31, 2019
District Cooperative Bank is not a Katni Headquarters
District Cooperative Bank is not a Katni Headquarters

बालमीक पांडेय @ कटनी. जिला मुख्यालय में देश की आजादी के 9 फरवरी पहले 1927 से जिला सहकारी बैंक और जिलेभर में उसकी 9 ब्रांचें खुली हुईं हैं। ब्रांचों से 54 सहाकारी समितियों का संचालन हो रहा है। इन समितियों और बैंकों का ऑफ सीजन में प्रतिदिन का टर्नओवर 35 से 50 लाख रुपये है और रखी-खरीफ फसल बोवनी व बिक्री के सीजन में 6 से 15 करोड़ रुपये प्रतिदिन का लेनदेन होता है, लेकिन जानकर ताज्जुब होगा कि यह लेनदेने पिछले कई वर्षों से खासा प्रभावित हो रहा है।

इसी मुख्य वजह है जिला सहकारी बैंक का मुख्यालय जिला में न होकर संभाग में है। जबलपुर में मुख्यालय होने के कारण न सिर्फ बैंक, समितियां व अधिकारी-कर्मचारी परेशान वर्षों से हो रहे हैं बल्कि इन समिति व बैंकों के माध्यम से लेनदेन करने वाले डेढ़ लाख से अधिक किसान परेशान हैं। जानकारी के अनुसार सिविल लाइन में जिला सहकारी बैंक है।

इसकी 9 ब्रांच बहोरीबंद, बाकल, रीठी, विजयराघवगढ़, बरही, उमरियापान, स्लीमनाबाद, बड़वारा, कटनी शामिल हैं। इन बैंकों में 98 हजार किसानों के चालू खाते हैं। इसके अलावा 20 हजार से अधिक अन्य सामान्य खाते हैं, जिनमें भी लेनदेने होता है। दोनों सीजन में 35 हजार किसान लेनदेने करते हैं। इतना बड़ा कारोबार होने और 1998 में कटनी जिला बनने के 21 साल बाद भी मुख्यालय कटनी में नहीं बनाया गया।

मुख्यालय न होने से ये गंभीर समस्या
जिला सहकारी बैंक का मुख्यालय न होने से जिलावासियों को गंभीर समस्या का समाना करना पड़ रहा है। सबसे पहले तो कृषकों की साख सीमा मंजूरी समिति, बैंक व जिला से न होकर संभाग से करानी पड़ती है, इसके लिए प्रस्ताव ब्लॉक, जिला व फिर जबलपुर जाता है। इस प्रक्रिया में किसानों को एक से दो माह तक का इंतजार करना पड़ता है। इसके अलावा जिले के बैंकों में होने वाले लेनदेन की रकम जबलपुर चली जाती है, जिससे यहां के खाता धारकों को बैंक के कई दिन चक्कर काटने पड़ते हैं।

खास-खास:
- 32 हजार 236 किसान वर्तमान में कर रहे लेनदेन।
- 95 हजार 631 खाता धारक सहकारी बैंकों के हैं सहारे।
- 2017 में सहकारिता समिति में मुख्यालय बनने बना था प्रस्ताव।
- 20 साल से प्रस्ताव व फंड का नहीं हैं जिले में प्रावधान।
- 15 साल से कर्मचारियों को रखने नहीं है कोई व्यवस्था।

होती है यह समस्या
- कैश न होने से अमानत जमा व निकालने में होती है परेशानी।
- समय पर रुपये न मिलने से किसानों के कामकाज होते हैं प्रभावित।
- समय पर भुगतान न मिलने से किसान व ग्राहक करते हैं शिकायत।
- रुपये न होने से सहकारी समितियां अब नहीं देतीं किसानों को कर्ज।

ब्रांचों में यह है रुपये देने की स्थिति
01. भनपुरा नं. 1 निवासी नवल किशोर मंगलवार को जिला सहकारी बैंक पहुंचा। नवल ने बताया कि उसे अपने खाते से 35 हजार रुपये निकालने हैं, लेकिन वह चार दिन से चक्कर काट रहा हैं। कैश न होने की बात कह बैंक कर्मी लौटा देते हैं।
02. राकेश सिंह ठाकुर उमरियापान सहकारी बैंक मैनेजर ने कहा कि प्रतिदिन 15 से 16 लाख कैश की पड़ती है जरुरत, एक माह से मिल रहा मात्र 4 से पांच लाख रुपये, लोगों को कम करना पड़ता है भुगतान।
03. अवधेश शर्मा सहकारी बैंक बाकल ब्रांच ने बताया कि 4 से 5 लाख रुपये प्रतिदिन चाहिए होता है, लेकिन पिछले कई दिनों से मात्र डेड़ से दो लाख रुपये ही मिल रहे हैं, जिससे भारी समस्या है। उचित मूल्य की दुकान से आने वाली राशि से काम चला रहे हैं।
04. नारायण सिंह निवासी बाकल बैंक में 50 हजार रुपये लेने के लिए शनिवार को पहुंचे, उन्हें बैंक ने रुपये न होने के कारण मात्र 25 हजार का भुगतान किया गया, 25 हजार रुपये मंगलवार को दिए गए।

जिले में ये सहकारी समितियां हैं संचालित
सहकारी विपणन संस्था कटनी, प्राथमिक कृषि साख समिति कटनी, कन्हवारा, पहाड़ी, पिपरौंध, तेवरी, पडऱभटा, कौडिय़ा, बहोरीबंद, हथियागढ़, कुआं, कूडऩ, बाकल, सिहुंड़ी, बरही, खमतरा, ढीमरखेड़ा, दशरमन, सिलौंड़ी, झिन्ना पिपरिया, रीठी, बिलहरी, बडग़ांव, बरही, पिपरिया, उबरा, विलायतकला, कांटी, सिनगौड़ी, विजयराघवगढ़, देवरकलां, जिवारा, कैलवारा, तिलगवां, देवगांव, बसाड़ी, इमलिया, चांदनखेड़ा, नन्हवारा सेझा, बकलेहटा, रैपुरा, अमेहटा, देवरी मंगेला, मुरवारी, धरवारा, देवरी खरगवां, सलैया पटोरी, धूरी, उमरियापान, बड़वारा, खितौली, स्लीमनाबाद, हीरापुर कौडिय़ा, स्लीमनाबाद आदि संचालित हैं।

इनका कहना है
मप्र में 38 सहकारी बैंक हैं। 1998 में जो जिला बने हैं उसमें कई स्थानों पर नए मुख्यालय नहीं बने। वित्तीय स्थिति बेहतर न होने से यह समस्या है। ऋण माफी की रकम नहीं मिलने, किसानों से बेहतर वसूली न होने व कैश की कमी से बैंकों की स्थिति बेहतर नहीं है। स्थिति सुधरने पर मुख्यालय के लिए पहल होगी।
डॉ. अरुण मसराम, उपसंचालक सहकारिता।

Updated on:
31 Dec 2019 12:17 pm
Published on:
31 Dec 2019 12:21 pm