
हरियाली
हर साल मानसून (Monsoon) के साथ पौधरोपण के सरकारी अभियान शुरू होते हैं। मंत्री, जनप्रतिनिधि और अधिकारी पौधे लगाते हैं, फोटो खिंचती है और अभियान पूरा हो जाता है। कुछ माह बाद वही पौधे पानी के अभाव में सूख जाते हैं या मवेशियों का निवाला बन जाते हैं। मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) के कटनी (Katni) जिले के बड़वारा विकासखंड के छोटे से गांव बिजौरी (Bijauri) में 26 साल पहले बोया गया एक विचार आज भी हरा है। इस गांव में पौधे लगाए नहीं जाते, उन्हें परिवार की तरह पाला जाता है।
पर्यावरण संरक्षण और जल संकट को देखते हुए साल 2000 में बिजौरी के युवाओं और ग्रामीणों ने मानव जीवन विकास समिति बनाई। शुरुआत प्राकृतिक नालों पर बोरी बंधान बनाकर बारिश का पानी रोकने से हुई। इसके साथ पौधरोपण शुरू हुआ, लेकिन एक संकल्प लिया गया कि जितने पौधों की देखभाल हो सकेगी, उतने ही लगाए जाएंगे। समिति के सचिव निर्भय सिंह ठाकुर ने कहा कि उनके लिए सफलता पौधों की संख्या नहीं, उनका जीवित रहना है। बिजौरी की कहानी यही बताती है कि धरती को हरा करने के लिए हमेशा बड़े बजट या अभियान की जरूरत नहीं होती। कभी-कभी एक गांव का छोटा-सा संकल्प, कई पीढिय़ों के लिए छांव बन जाता है।
इस मुहिम में हर पौधे की जिम्मेदारी किसी परिवार, किसान, महिला समूह, स्कूल को सौंपी गई। जहाँ पानी और सुरक्षा का इंतजाम था, वहीं पौधे लगाए गए। नतीजा यह रहा कि तीन साल में लगाए करीब तीन लाख पौधों में से 90% आज भी जीवित हैं। इस दौरान बच्चे पौधों को नाम देते हैं, महिलाएं निगरानी करती हैं और परिवार समय पर पानी देते हैं। इस तरह ये पौधे गांव की सामूहिक ज़िम्मेदारी बन गए।
समिति की यह मुहिम कटनी के बिजौरी से निकलकर पड़ोसी दमोह जिले के 160 गांवों तक पहुंच चुकी है। हर साल करीब एक लाख स्थानीय, फलदार और छायादार पौधे लगाए जा रहे हैं। कई जगह ये पौधे पेड़ बनकर सड़कों, खेतों की मेड़ों, स्कूलों और सार्वजनिक जगहों को छांव दे रहे हैं। इस पहल की जड़े सिर्फ हरियाली तक सीमित नहीं हैं। गांवों में करीब 80 छोटे जल संरक्षण तालाब भी बनाए गए हैं।
Updated on:
09 Aug 2026 03:20 am
Published on:
09 Aug 2026 03:16 am
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