349 गांव प्रभावित, अधूरा मुआवजा और अधूरा पुनर्वास बना किसानों की पीड़ा
कटनी. सिंचाई और विद्युत उत्पादन के बड़े सपने के साथ शुरू हुई बाणसागर बहुउद्देशीय परियोजना आज भी हजारों विस्थापित परिवारों के लिए संघर्ष और पीड़ा का प्रतीक बनी हुई है। वर्ष 1978 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई की सरकार द्वारा रीवा जिले के देवलौंद में इस परियोजना का शिलान्यास किया गया था। उद्देश्य था तीन नदियों को बांधकर मध्यप्रदेश में सिंचाई और बिजली उत्पादन को बढ़ावा देना, लेकिन 46 वर्ष बीत जाने के बाद भी प्रभावितों को पूर्ण न्याय नहीं मिल पाया है। परियोजना से प्रभावित किसानों की जमीन, मकान, बाग-बगीचे, वृक्ष और आजीविका के नुकसान की भरपाई के लिए शासन ने मुआवजा, सरकारी नौकरी और आवासीय पट्टा देने की घोषणा की थी।
भू-अर्जन अधिकारी, आरआई और पटवारियों द्वारा राजस्व अधिनियम की धारा 4 व 9 के तहत गांव-गांव जनसुनवाई भी की गई। वर्ष 1991-92 से 2005 तक मुआवजा वितरण की प्रक्रिया चली, लेकिन 30 जून 2006 को राज्य शासन ने भू-अर्जन कार्य को शून्य घोषित कर दिया, जबकि कई गांवों की आपत्तियां उस समय भी लंबित थीं। कटनी जिले की विजयराघवगढ़ तहसील के आंशिक डूब प्रभावित गांव कोनिया, कुदरी, उबरा, मनघटा, लूली, खेरवा उर्दानी, डीघी सहित कई गांवों में 2005-06 तक भी मुआवजा अधूरा रहा। बिना आपत्तियों का निराकरण किए ही प्रक्रिया समाप्त कर दी गई।
कटनी, सतना और शहडोल जिलों के कुल 349 गांव बाणसागर जलभराव क्षेत्र में आए। किसानों को भूमि की श्रेणी के अनुसार मात्र 1500 से 2500 रुपए प्रति इकाई के हिसाब से मुआवजा दिया गया, जिसे वे अत्यंत कम बताते हैं। किसानों का आरोप है कि मुआवजा वितरण में बिचौलियों और भ्रष्ट अधिकारियों की मिलीभगत रही, राशि बढ़वाने के नाम पर भारी कमीशन वसूला गया और दलालों के जरिए चेक वितरित किए गए। बांध निर्माण 1995-96 में पूर्ण हुआ और उद्घाटन तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने किया। वर्ष 2010 में गेट बंद कर पूर्ण जलभराव किया गया, जिससे सैकड़ों गांव स्थायी रूप से डूब क्षेत्र में आ गए और किसानों की संपत्ति पूरी तरह नष्ट हो गई।
दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि आज भी हजारों प्रभावित परिवार मुआवजा, नौकरी और आवासीय पुनर्वास पट्टे की प्रतीक्षा कर रहे हैं। घोषित सुविधाएं कागजों तक सीमित रह गईं। विजयराघवगढ़ विधानसभा क्षेत्र के ग्राम लूली निवासी समाजसेवी व मजदूर नेता चंद्र प्रताप तिवारी वर्षों से प्रभावितों को न्याय दिलाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उन्होंने अधिकारियों और शासन-प्रशासन को अनेक पत्र, आवेदन और जनसुनवाई की मांग की। उनके प्रयासों से 2021-22 में कुछ गांवों के किसानों को आंशिक मुआवजा मिला, लेकिन समस्या अब भी जस की तस है।