
Seed drills and basal doses will increase wheat production
बालमीक पांडेय @ कटनी. परंपरागत खेती छोडकऱ आधुनिक तकनीक अपनाने वाले किसानों के लिए खेती वरदान साबित हो रही है। बेहतर खेती किसानों के लिए प्रेरणादायी साबित हो रही है। ढीमरखेड़ा क्षेत्र के ग्राम पंचायत बम्हनी के आश्रित ग्राम बनहरी के किसान पारस पटेल प्रेरणास्रोत बनकर सामने आए हैं। किसान ने इस रबी सीजन में सुपर सीड ड्रिल पद्धति और बेसल डोज खाद का प्रयोग कर 9 एकड़ में गेहूं की बोवनी की है, जिससे उत्पादन में प्रति एकड़ 5 से 8 क्विंटल तक की बढ़ोतरी होगी। नवंबर माह में की गई बोवनी के बाद वर्तमान में खेत में गेहूं की फसल एकरूपता के साथ लहलहा रही है और बालियां निकल आई हैं।
कृषि विभाग के अधिकारी आरएन पटेल की सलाह पर किसान ने डीबीडब्ल्यू-187 किस्म के गेहूं की खेती की। पारस पटेल ने बताया कि परंपरागत छिटवा बोवनी में एक एकड़ में 80 से 100 किलोग्राम बीज लगता था, जबकि सुपर सीड ड्रिल पद्धति से मात्र 50 किलोग्राम बीज प्रति एकड़ पर्याप्त रहा। इससे बीज लागत लगभग आधी हो गई।
किसान ने बोवनी के समय 12:32:16 उर्वरक का प्रयोग किया, जिससे पौधों को प्रारंभिक अवस्था में ही संतुलित पोषण मिला। इस खाद में नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश का संतुलन होने से खाद सीधे जड़ों तक पहुंची और पौधे मजबूत, हरे-भरे व चमकदार बने। पारंपरिक पद्धति में डीएपी डालकर बाद में यूरिया देने से शुरुआती 20 दिनों तक नाइट्रोजन की कमी रहती है, जिससे फसल की वृद्धि प्रभावित होती है।
पारस पटेल ने बताया कि पहले एक एकड़ में खाद पर करीब 3800 रुपए खर्च होते थे, जबकि इस पद्धति में मात्र 2300 रुपए की खाद लगी। सुपर सीड ड्रिल से बोवनी की गहराई डेढ़ से दो इंच समान रहने से फसल की लंबाई और बढ़वार में एकरूपता आई है। इससे उत्पादन 20 से 22 क्विंटल प्रति एकड़ या उससे अधिक होने की संभावना है।
किसान पारस पटेल अब आसपास के किसानों को भी इस तकनीक से खेती करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। पास के ग्राम पिपरिया शुक्ल के किसानों ने भी यह पद्धति अपनानी शुरू कर दी है। कृषि अधिकारी आरएन पटेल ने बताया कि बड़वारा और ढीमरखेड़ा तहसील क्षेत्र में अब भी लगभग 95 प्रतिशत किसान छिटवा बोवनी कर रहे हैं। सीड ड्रिल और बेसल डोज पद्धति अपनाने से किसानों को प्रति एकड़ 5 से 8 क्विंटल अतिरिक्त उत्पादन मिलेगा। यह तकनीक न सिर्फ उत्पादन बढ़ाएगी, बल्कि किसानों की आय में भी उल्लेखनीय वृद्धि करेगी।
जिले के एक प्रगतिशील किसान ने नरवाई जलाए बिना गेहूं की बोनी कर बेहतर उत्पादन हासिल करने मिसाल पेश की है। किसान ने परंपरागत तरीके से खेत की सफाई कर आग लगाने के बजाय आधुनिक कृषि तकनीक अपनाई, जिससे लागत भी घटी और फसल की गुणवत्ता भी बेहतर रही। किसान ने बताया कि नरवाई न जलाने से खेत की उर्वरता बनी रही, मिट्टी में नमी सुरक्षित रही और जैविक तत्वों को नुकसान नहीं पहुंचा। इसका सीधा असर गेहूं की बढ़वार और दाने की भरपूर भराव पर पड़ा। फसल रोगों से भी काफी हद तक सुरक्षित रही, जिससे दवाइयों पर होने वाला खर्च कम हुआ। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार नरवाई न जलाने से पर्यावरण प्रदूषण भी कम होता है और भूमि की सेहत लंबे समय तक बनी रहती है। किसान की इस पहल से आसपास के अन्य किसान भी प्रेरित हो रहे हैं और पर्यावरण हितैषी खेती की ओर कदम बढ़ा रहे हैं।
Published on:
12 Feb 2026 12:45 pm
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