वनोपज से शुरू हुआ था व्यापार का सफर, अव्यवस्थित यातायात के बोझ तले दबती नजर आ रही पुरानी बाजार, क्षेत्र अनाज मंडी बन गया और अब यहां गल्ला, ड्राइफू्रट्स, बीज और कीटनाशकों का बड़ा थोक कारोबार संचालित हो रहा है
कटनी. शहर का ऐतिहासिक घंटाघर बाजार आज भी कटनी की व्यापारिक धडकऩ माना जाता है। कभी यहां दूर-दूर से व्यापारी महुआ, हर्र, बहेरा, लाख और गोंद जैसी वनोपज लेकर पहुंचते थे। समय बदला तो यही क्षेत्र अनाज मंडी बन गया और अब यहां गल्ला, ड्राइफू्रट्स, बीज और कीटनाशकों का बड़ा थोक कारोबार संचालित हो रहा है। इतिहास और व्यापार से भरा यह बाजार आज जाम, अतिक्रमण और लोडर वाहनों की अव्यवस्था से जूझ रहा है। शहर की पुरानी पहचान अब अव्यवस्थित यातायात के बोझ तले दबती नजर आ रही है।
जानकारी के अनुसार घंटाघर बाजार की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसका निर्माण एक पुराने कुएं के ऊपर कराया गया था। वर्ष 1933-34 में पीरामल सरावगी द्वारा बनवाया गया घंटाघर आज भी शहर की पहचान बना हुआ है। पुराने समय में व्यापारी बैलगाडिय़ों के साथ यहां पड़ाव डालते थे। नीचे बना कुआं व्यापारियों और मवेशियों की प्यास बुझाता था। बाद में पानी दूषित होने और हादसे की आशंका के चलते नगर निगम ने कुएं को बंद करा दिया। अंग्रेजी शासनकाल में घंटाघर मैदान वनोपज व्यापार का बड़ा केंद्र हुआ करता था। यहां कटनी के अलावा पन्ना, उमरिया और दमोह तक से व्यापारी पहुंचते थे। महुआ, हर्र, बहेरा, लाख और गोंद का बड़ा कारोबार होता था। धीरे-धीरे यहां अनाज का व्यापार बढ़ा और पूरा इलाका अनाज मंडी के रूप में विकसित हो गया। बाद में नई कृषि उपज मंडी पहरूआ शिफ्ट होने के बावजूद घंटाघर बाजार की रौनक कम नहीं हुई।
घंटाघर बाजार में आज भी रोजाना करीब एक करोड़ रुपये का कारोबार होता है। यहां लगभग 300 दुकानें और 50 से अधिक ठेले संचालित होते हैं। कई व्यापारिक प्रतिष्ठान 100 से 130 साल पुराने हैं, जहां अब तीसरी पीढ़ी व्यापार संभाल रही है। बाजार में चावल, दाल, गेहूं, ड्राइफू्रट्स, बीज और कीटनाशकों का बड़ा थोक कारोबार होता है। जिले के साथ आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से भी किसान यहां खरीदी करने पहुंचते हैं।
घंटाघर बाजार की सबसे बड़ी समस्या लोडर वाहनों का अव्यवस्थित संचालन है। घंटाघर के आसपास सडक़ किनारे खड़े वाहन दिनभर जाम की स्थिति पैदा करते हैं। व्यापारी कई बार प्रशासन से शिकायत कर चुके हैं। तिलक राष्ट्रीय स्कूल के पीछे खाली मैदान को वैकल्पिक स्थान भी तय किया गया, लेकिन आज तक वाहनों को वहां शिफ्ट नहीं कराया जा सका। आटो, ई-रिक्शा और लोडर वाहनों की भीड़ से घंटाघर चौक दिनभर अव्यवस्थित बना रहता है।
घंटाघर बाजार में कई ट्रांसपोर्ट कंपनियां संचालित हैं। नो-एंट्री के बावजूद बड़े वाहन दिन में ही बाजार में प्रवेश कर जाते हैं और लोडिंग-अनलोडिंग का काम चलता रहता है। संकरे रास्तों पर खड़े ट्रकों और सडक़ तक फैले ठेलों-दुकानों से खरीदारों और राहगीरों को भारी परेशानी होती है।
घंटाघर बाजार सिर्फ व्यापार नहीं, बल्कि शहर की सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान भी है। पूरन के समोसे कई जिलों तक प्रसिद्ध हैं। बाजार के बीच स्थित मंदिर लोगों की आस्था का केंद्र है। पास स्थित रामलीला मैदान वर्षों से धार्मिक आयोजनों और रामलीला मंचन का गवाह रहा है। घंटाघर के पास स्थापित अग्रसेन महाराज की प्रतिमा भी इस क्षेत्र की विशेष पहचान है।