
खंडवा. हरियाली की गोद मे बसा सिविल लाइन क्षेत्र, प्रवासी पक्षियों को आकर्षित करता अटल सरोवर नागचून तालाब, इंदौर रोड पर झीलोद्यान, शहर के बीच घंटाघर का बगीचा, आबना नदी से टापू बने भीमकुंड से लेकर मुक्तिधाम तक फैला छोटा जंगल, राहगीरों को सुकून देता घने पेड़ों की छांव से ढका जसवाड़ी रोड। जानकारों के अनुसार पहले निमाड़ में नीम के पेड़ों की अधिकता रही, नीम के पेड़ों आड़ में होने से बन गया निमाड़, सुनने में आता है खंडवा का नाम भी कभी खांडव वन था। वातावरण अनुकूल होने से शहर में पक्षियों की कमी नहीं है। वन्यप्राणी भी आए दिन विचरण करते शहर में आ रहे है। हमें खंडवा को वन तो नहीं बनाना है, लेकिन यहां की हरियाली को सहेज कर रखना है। प्रकृति ने सौभाग्य से बहुत कुछ दे ही रखा है, जरूरत है तो बस जागरुकता की, विकास या आपदा में गिरे पेड़ों के बदले पेड़ लगाने की दृढ़ इच्छाशक्ति की। पर्यावरण प्रेम हमे विरासत में मिला है, तभी तो पशु-पक्षियों की संख्या अधिक है हमारे यहां, पर्यावरण के नाम से बने इस निमाड़ में पेड़ लगाकर निमाड़ का पुन: निर्माण कर विरासत को बचाना है। शहर को क्लीन खंडवा ग्रीन खंडवा बनाना है।
सांसों में ताजगी महसूस होने लगती है
तीन पुलिया पार करते ही शुद्ध हवाओ से सांसों में ताजगी सी महसूस होने लगती है। पुलिस लाइन से लेकर टैगोर पार्क, निमाड़ नर्सरी, जिला पंचायत, आदिमजाति कल्याण विभाग, कलेक्टर बंगला, पुलिस अधीक्षक कार्यालय, आकाशवाणी कार्यालय हरसूद नाके तक पूरा सिविल लाइन हरियाली की चादर ओढ़े हुए है। तरह- तरह के पेड़ों से हरा-भरा यह क्षेत्र पक्षियों की आश्रय स्थली बना हुआ है। यहां हरियाला तोतो की कई प्रजाति, छोटा बाज़, छोटा उल्लू, बढ़ा उल्लू, सनबर्ड, टेलबेर्ड, हमिंग बर्ड, हार्नबिल, इंडियन मेंगपाई, किंगफिशर, फ्रीजेंट, काला आइबिस, मैना, बुलबुल, फाख्ता, टिटहरी जैसे पक्षी बहुतायत में है। जिन्हें आसानी से देखे जा सकते है। विकास के नाम पर काटे गए पेड़ के बदले पौधे लगाकर पेड़ बनाने तक जिम्मेदारी तय है। सरकारी योजनाओं में पौधरोपण होते तो बड़े स्तर पर होते है, लेकिन देखरेख के अभाव में पौधे पेड़ नहीं बन पाते। सामाजिक संस्थाएं पौरोपण के क्षेत्र में अपना काम तो कर रही है लेकिन फंड की कमी व विभागों की सहायता नही मिलने से कमी रह जाती है।