खंडवा

मशीन और लकड़ी का खर्च बराकर…इस लिए 50 लाख के शवदाह गृह की बजाए लोग परंपरागत कर रहे अंत्येष्टि

हरिशचंद्र मुक्ति केंद्र में शवदाह गृह और लकड़ी का खर्च बराकर है। इस लिए लोग परंपरागत अंत्येष्टि कर रहे हैं। दोनों पर खर्च बराबर होने के कारण लोगों ने 50 लाख के शवदाह गृह से बनाई दूरी बना ली है। एक साल में मशीन से सिर्फ 3 अंत्येष्टि हुईं। जबकि बाकी परिवारों ने परंपरागत चिता को चुना।
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Sep 21, 2026
Municipal Corporation Khandwa
खंडवा : हरिशचंद्र मुक्तिधाम परिसर में शवदाह गृह

हरिशचंद्र मुक्ति केंद्र में शवदाह गृह और लकड़ी का खर्च बराकर है। इस लिए लोग परंपरागत अंत्येष्टि कर रहे हैं। दोनों पर खर्च बराबर होने के कारण लोगों ने 50 लाख के शवदाह गृह से बनाई दूरी बना ली है। एक साल में मशीन से सिर्फ 3 अंत्येष्टि हुईं। जबकि बाकी परिवारों ने परंपरागत चिता को चुना।

365 दिन में सिर्फ तीन शवों की अंत्येष्टि

नगरीय क्षेत्र में स्थित हरिशचंद्र मुक्ति केंद्र का शवदाह गृह चालू हुए 365 दिन हो गई। अब तक सिर्फ तीन शवों की अंत्येष्टि हो सकी है। इससे पहले चार साल से बनकर तैयार शवदाह गृह का संचालन बंद रहा। निगम ने सामाजिक संस्थाओं से संचालन के लिए मंथन किया। कोई तैयार नहीं हुआ तो निगम ने संचालन के लिए दो कर्मचारियों की नियुक्ति कर दी है।


4 साल तक बंद रहा, जागररूकता की ठोस योजना नहीं

चार साल तक बंद रहे इस शवदाह गृह को चालू करने के बाद भी निगम लोगों का भरोसा नहीं जीत सका। अब जिम्मेदारी लोगों की परंपरा पर डालने के बजाय निगम को बताना होगा कि मशीन पर इतना खर्च करने के बाद इसके उपयोग और जनजागरूकता की ठोस योजना क्यों नहीं बनाई गई। इससे लाखों रुपए की लागत से तैयार शवदाह गृह की मशीनरी शोपीस बनी हुई है। जबकि मशीन और लकड़ी से अंत्येष्टि में खर्च में भी कोई बड़ा अंतर नहीं है।

50 लाख के शवदाह गृह पर जम रही धूल

शहर में अंत्येष्टि के लिए हरिशचंद्र मुक्तिधाम और किशोर कुमार समाधि स्थल परिसर में मुक्ति केंद्र बनाया गया है। शहर में प्रतिदिन औसत पांच से छह अंत्येष्टि होती है। हरिशचंद्र मुक्तिधाम में शवदाह गृह का निर्माण कराया गया। इसमें करीब 38 लाख रुपए की मशीन लगाई गई है। भवन और अन्य व्यवस्थाओं को मिलाकर कुल लागत करीब 50 लाख रुपए है।

शवदाह गृह की कोविड में जरूरत महसूस हुई थी

कोविड के दौरान शवों की अंत्येष्टि के लिए शवदाह गृह की जरूरत महसूस हुई थी। वर्ष 2022-23 में बनकर तैयार हो गया। संचालन के लिए बजट नहीं होने से करीब चार साल तक यह बंद पड़ा रहा। करीब एक साल पहले नगर निगम ने इसे चालू करने की पहल की। सामाजिक संस्थाओं और समितियों की बैठक बुलाई गई। संचालन की जिम्मेदारी लेने का आग्रह किया गया। निगम ने बिजली और पानी नि:शुल्क देने की बात कही। संस्था को सिर्फ गैस का खर्च उठाना था। इसके बावजूद कोई संस्था संचालन के लिए आगे नहीं आई।

संस्था नहीं मिली तो निगम ने खुद संभाली व्यवस्था

सामाजिक संस्थाओं के तैयार नहीं होने पर निगम ने खुद शवदाह गृह का संचालन शुरू किया। दो कर्मचारियों की नियुक्ति की गई। प्रभारी अधिकारी भूपेंद्र सिंह के अनुसार एक साल में मशीन से केवल तीन शवों का दाह संस्कार हुआ है। ज्यादातर परिवार परंपरागत लकड़ी से दाहसंस्कार कर हैं।

मशीन और लकड़ी का खर्च लगभग बराबर

मशीन से एक शव अंत्येष्टि में 3500 रुपए खर्च होता है। परंपरागत 3 से 4 क्विंटल लकड़ी लगती है। 700-800 रुपए प्रति क्विंटल की दर से 2100 से 3200 रुपए खर्च होते हैं। अन्य सामग्री जोडऩे पर खर्च 3500 रुपए से अधिक हो जाता है। निगम ने मशीन से अंत्येष्टि की दर 3500 रुपए तय की है। दोनों का बराबर ही है।

खर्च में बड़ा अंतर नहीं

शवदाह गृह के उपयोग को बढ़ाने के लिए खर्च का अंतर बताना जरूरी है। जब मशीन और लकडिय़ों से अंत्येष्टि का खर्च लगभग समान है, तो लोगों को मशीन की प्रक्रिया और सुविधा समझाकर जागरूक किया जा सकता है। इसका प्रयास भी किया गया। धीरे-धीरे लोग शवदाह गृह को अपनाएं।

सुनील जैन, समाजसेवी


इनका कहना : प्रियंका सिंह राजावत, आयुक्त, निगम

परंपरा के कारण लोग मशीन से अंत्येष्टि कराने में सहज नहीं हैं। सामाजिक संस्थाओं के साथ चर्चा की गई है। जागररूकता बढ़ाने के प्रयास किए जा रहे हैं। धीरे-धीरे लोग मशीन का उपयोग करेंगे।

Updated on:
21 Sept 2026 11:54 am
Published on:
21 Sept 2026 11:54 am