
सपनों को उड़ान भरने बड़े मैदान और सुविधाओं से भरी जिंदगी जरूरी नहीं। जरूरत होती है हौसले, मेहनत और अवसर की। बेटियां ने इस बात को सच साबित कर रही हैं। किसी ने घर के पीछे बने तबेले में वॉलीबॉल का अभ्यास कर राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचने का रास्ता बनाया। तो किसी ने खेतों की पगडंडियों पर दौड़कर प्रदेश स्तरीय प्रतियोगिता में जगह बनाई। गोल्ड मेडल जैसे पदक जीते, तो किसी ने शिक्षा के सहारे जिंदगी की दिशा बदल दी। अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस पर पढ़िए ऐसी ही बालिकाओं और बेटियों की प्रेरक कहानियां।
घर के पीछे तबेला था, लेकिन श्रद्धा की नजरों में वहां सिर्फ भैंसों के रहने की जगह नहीं थी। उसे उसी जगह अपने सपनों का मैदान नजर आया। पुलिस ग्राउंड घर से 5-6 किलोमीटर दूर था। रोज वहां पहुंचकर अभ्यास करना आसान नहीं था। श्रद्धा ने दूरी को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। घर के पीछे तबेले के खाली हिस्से को अभ्यास का मैदान बना लिया। नियमित मेहनत और लगन के साथ प्रैक्टिस कर उसने राष्ट्रीय शालेय वॉलीबॉल प्रतियोगिता में मध्यप्रदेश का प्रतिनिधित्व किया। उत्कृष्ट विद्यालय खंडवा में कक्षा 11वीं की छात्रा श्रद्धा पढ़ाई के साथ खेल में भी आगे बढ़ रही है। उसकी सफलता की कहानी में एक और खास बात है। उसने छोटी बहन ऋषिका को भी अपने साथ अभ्यास के लिए प्रेरित किया। अब दोनों बहनें खेल के मैदान में अपनी पहचान बनाने की राह पर हैं।
श्रद्धा का संदेश : सुविधाओं का इंतजार करने के बजाय उपलब्ध संसाधनों से शुरुआत करें। मेहनत और निरंतर अभ्यास से सपनों तक पहुंचने का रास्ता बनता है।
श्रद्धा ने जब घर के पीछे तबेले के खाली हिस्से में वॉलीबॉल का अभ्यास शुरू किया, तब छोटी बहन ऋषिका ने भी उसके साथ कदम बढ़ाए। ऋषिका भी उत्कृष्ट स्कूल में कक्षा 9वीं की छात्रा है। घर के पास खेल का मैदान नहीं था। लेकिन इस कमी ने उसके इरादों को कमजोर नहीं किया। बड़ी बहन को अभ्यास करते देखकर उसने भी वॉलीबॉल के साथ नियमित अभ्यास शुरू कर दी। इसी अभ्यास ने उसे राज्य स्तरीय शालेय वॉलीबॉल प्रतियोगिता तक पहुंचाया। दोनों बहनों की कहानी बताती है कि परिवार में एक व्यक्ति का हौंसला दूसरे के सपनों को भी ताकत दे सकता है। ऋषिका अब खेल को केवल शौक नहीं, बल्कि अपना कॅरियर बनाना चाहती है। उसकी नजरें आने वाले अवसरों पर हैं।
ऋषिका का संदेश : शुरुआत करने के लिए बड़े मैदान की जरूरत नहीं, मजबूत इरादे चाहिए। मैं मेहनत जारी रखकर खेल में अपना कॅरियर बनाना चाहती हूं।
मैदान बदलते हैं, लेकिन जीत के लिए जरूरी मेहनत नहीं। साक्षी बोरनारे ने इसे अपने अभ्यास से साबित किया है। उत्कृष्ट स्कूल में कक्षा 12 वीं की छात्रा साक्षी शालेय राज्य स्तरीय कबड्डी प्रतियोगिता के अंडर-19 वर्ग की विजेता टीम की सदस्य रही है। ताइक्वांडो में भी उसने अपनी प्रतिभा दिखाई और अंडर-19 संभाग स्तरीय प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक हासिल किया। वह पिछले पांच वर्षों से ताइक्वांडो का प्रशिक्षण ले रही है। प्रतिदिन दो घंटे का नियमित अभ्यास उसकी दिनचर्या का हिस्सा है। पढ़ाई के साथ दो खेलों में सक्रिय रहना अनुशासन और समय प्रबंधन की मांग करता है। साक्षी ने अपनी रुचि को लगातार मेहनत से जोड़ा। उसकी उपलब्धियां बताती हैं कि लक्ष्य स्पष्ट हो और अभ्यास नियमित हो, तो एक से अधिक क्षेत्रों में भी पहचान बनाई जा सकती है।
साक्षी का संदेश : सफलता एक दिन में नहीं मिलती। रोज का अभ्यास, अनुशासन और खुद पर भरोसा ही हमें लक्ष्य तक पहुंचाता है।
राधुबछिनया के पास अभ्यास के लिए आधुनिक ट्रैक और महंगे खेल संसाधन नहीं थे। उसके पास थीं खेतों की पगडंडियां और आगे बढ़ने का जज्बा। सुबह-सुबह वह खेतों के रास्तों पर दौड़कर अभ्यास करती। इसके बाद स्कूल पहुंचकर पढ़ाई करती। पंधाना के हंडियाखेड़ा निवासी सीमित संसाधनों और तमाम अभावों के बावजूद उसने अपने सपने को कमजोर नहीं पड़ने दिया। लगातार मेहनत का परिणाम रहा कि उसने राज्य स्तरीय शालेय एथलेटिक्स प्रतियोगिता में जगह बनाई। रनिंग और लंबी कूद में सहभागिता उसके लिए सिर्फ खेल प्रतियोगिता का हिस्सा नहीं, बल्कि अपनी क्षमता साबित करने का अवसर भी है। राधु की कहानी उन बेटियों के लिए प्रेरणा है, जो सुविधाओं की कमी के कारण अपने सपनों को छोटा कर लेती हैं। उसने दिखाया कि मंजिल तक पहुंचने के लिए शुरुआत करना सबसे जरूरी है।
राधु का संदेश : संसाधनों की कमी को अपनी कमजोरी न बनने दें। मेहनत करते रहें, क्योंकि हर छोटी शुरुआत आपको मंजिल के करीब ले जाती है।