
खंडवा : अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस पर बेटियों ने हौसले को बनाया रास्ता।
खंडवा की बेटियां राष्ट्रीय खेल मैदान से बैंकॉक तक चमकीं । किसी ने शिक्षा तो किसी ने संघर्ष से संवारी जिंदगी। गांव की पगडंडियों से राष्ट्रीय खेल मैदान तक, आर्थिक तंगी से मुंबई में नौकरी तक और जिंदगी की सबसे बड़ी चुनौती से अंतरराष्ट्रीय खेल मंच तक। खंडवा की बेटियां अपने हौसले, मेहनत और आत्मविश्वास से नई पहचान गढ़ रही हैं।
जिले के ग्राम बड़गांव माल की रितिका गंगुले ने खेल के प्रति अपनी रुचि को राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता तक पहुंचाया है। मदन गंगुले की बेटी रितिका बीए द्वितीय वर्ष की छात्रा है। पढ़ाई के साथ उसकी दिलचस्पी खेलकूद और एथलेटिक्स में है। इसी लगन ने उसे अखिल भारतीय 10 किलोमीटर क्रॉस कंट्री प्रतियोगिता में सहभागिता का अवसर दिलाया। लंबी दूरी की दौड़ में शारीरिक क्षमता के साथ धैर्य, अनुशासन और निरंतर अभ्यास भी जरूरी होता है। रितिका की उपलब्धि बताती है कि गांव की बेटियां भी बड़े खेल मंचों तक पहुंच सकती हैं। उसके लिए यह सहभागिता आगे बढ़ने की एक महत्वपूर्ण सीढ़ी है। अब उसकी कहानी अन्य युवतियों को भी खेल के क्षेत्र में अवसर तलाशने की प्रेरणा दे सकती है।
रितिका का संदेश : अपने सपनों को गांव या शहर की सीमाओं में न बांधें। मेहनत और अनुशासन के साथ आगे बढ़ें, अवसर जरूर मिलेंगे।
रंजिता की जिंदगी में बदलाव एक शिविर की रसोई से शुरू हुआ। करीब पांच साल पहले वह ओंकारेश्वर में राष्ट्रीय सेवा योजना के जिला स्तरीय शिविर में मजदूरी करने पहुंची थी। वहां वह रसोई में रोटियां बेल रही थी। इसी दौरान उसकी मुलाकात एसएन कॉलेज के सहायक प्राध्यापक चंद्रपाल सिंह रावत से हुई। बातचीत में पता चला कि रंजिता 12 वीं में पढ़ती है, लेकिन आर्थिक तंगी के कारण आगे पढ़ने की उम्मीद छोड़ चुकी है। परिवार में उसकी शादी की तैयारी भी चल रही थी। ऐसे समय में प्राध्यापक ने उसे पढ़ाई जारी रखने के लिए प्रेरित किया और सहयोग का भरोसा दिया। बारहवीं के बाद रंजिता ने एसएन कॉलेज में प्रवेश लिया और बीए की पढ़ाई पूरी की। उसने मेहनत और लगन से अपना लक्ष्य हासिल किया। आज वह मुंबई में रेलवे पुलिस में नौकरी कर रही है। उसकी कहानी बताती है कि सही समय पर मिला मार्गदर्शन किसी की जिंदगी बदल सकता है। आर्थिक अभावों के बीच भी शिक्षा आगे बढ़ने का रास्ता खोल सकती है।
रंजिता का संदेश : गुरु के मार्गदर्शन ने मेरे जीवन का अंधियारा दूर हुआ। उनकी दी हुई शिक्षा और सीख को मैं कभी व्यर्थ नहीं जाने दूंगी।
स्पाइनल कॉर्ड इंजरी ने विशाखा पराशर की जिंदगी बदल दी, लेकिन उनके सपनों को नहीं रोक सकी। व्हीलचेयर पर आने के बाद उन्होंने हिम्मत जुटाई और व्हीलचेयर रग्बी को अपनी ताकत बनाया। लगातार अभ्यास और मेहनत के दम पर हाल ही में वह थाईलैंड के बैंकॉक में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व कर लौटी हैं। पिता विजय पराशर का सहयोग और प्रशिक्षक गौरव नामदेव का मार्गदर्शन उनके सफर में अहम है। अब विशाखा का सपना पैरालंपिक खेलों तक पहुंचकर देश के लिए प्रदर्शन करना है।
विशाखा का संदेश : मुश्किलें आपके सपनों की सीमा तय नहीं करतीं। खुद पर भरोसा रखिए, मेहनत करते रहिए और अपनी मंजिल की ओर बढ़ते रहिए।
Updated on:
11 Oct 2026 12:46 pm
Published on:
11 Oct 2026 12:46 pm
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