कवि सुरेंद्र शर्मा ने पढ़ी ऐसी पंक्तियां कि भर आया दिल
खंडवा. चांद को छूने में घमंड महसूस करते हैं, मां-बाप के पैर छूने में शर्म करते हैं। पहुंचना चाहते हैं सूर्य के रहस्य तक लेकिन नहीं पहुंचते भाई के दरवाजे तक। आज इस ऊंचाइयों पर बैठकर मैं सोचता हूं, इसके लिए मैंने कितनी खोदी है खाइयां..। अब मुझे अपने बाप की बेटी से अपनी बेटी अच्छी लगने लगी है, मुझे बाप के बेटे से अपना बेटा अच्छा लगने लगा है। अब मेरा बेटा कमा रहा है, कल मुझे उसके साथ रहना पड़ेगा, तमाचा मैंने माना है, तमाचा मुझे खाना पड़ेगा। वरिष्ठ हास्य कवि सुरेंद्र शर्मा ने जब कविता की ये पंक्तियां पढ़ी तो सभागार में मौजूद हर एक का दिल रो उठा और आंखों ने इसकी गवाही भी दी। मौका था सेठी संस्थान ट्रस्ट की ओर से आयोजित कार्यक्रमों की शृंखला में आलोक सेठी की नई पुस्तक 'जिंदगी और शायरीÓ के विमोचन के साथ कवि सम्मेलन व मुशायरे का। इससे पहले रात 8.50 से रात 9.47 बजे तक शायर तथा फिल्मी गीतकार शकील आजमी ने भी श्रोताओं को बांधे रखा।
लानत है इस दौर पर सोचता है अब- ये शख्स चला जाए तो खाना खाऊं : उन्होंने कहा- एक कमरा था, जिसमें रहते था मैं, मां-बाप के साथ, दो बहनें, एक थामेरा भाई। कमरा बहुत बड़ा था, हम लोग थे बहुत कम, इसलिए उस कमी को पूरा करने के लिए मेहमान बुला लेते थे हम। एक कमरे में मेहमान का स्वागत होता था, अब कोठी में मेहमान आता है तो सोचते हैं कब जाएगा। उर्दू के एक शायर ने कहा- एक वक्त था, सोचता था मैं, मेहमान आए तो खाना खाऊं, लानत है इस दौर पर सोचता है अब- ये शख्स चला जाए तो खाना खाऊं।
जितनी चादर, उतने पैर पसार...
अपनी इच्छाओं को सीमाओं में बांधे रखिए, वरना ये शौक गुनाहों में बदल जाएंगे। जो चादर मेरे पूरे परिवार के लिए बड़ी पड़ती थी, उस चादर से बड़े हो गए हमारे सब के पांव, लोग झूठ कहते हैं कि दीवारों में दरारें पड़ती हैं, हकीकत यही कि जब दरारें पड़ती हैं, जब दीवारें बनती है। पहले हम सब लोग दीवारों के बीच में रहते थे, अब हमारे बीच में दीवारें रहती हैं।