
उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में कोरोना काल में पहले मां का साया उठ गया। पिता अकेले रह गए। वे गोरखपुर में एक होटल में मजदूरी कर बच्चों का पालन-पोषण कर रहे थे। लेकिन कुछ समय बाद पिता का भी निधन हो गया। तीनों बच्चे बेसहारा हो गए। ऐसे में होटल संचालक ने उन्हें गोरखपुर के शिशु बाल गृह में पहुंचा दिया। वहां चार से पांच साल तक तीनों का बचपन बीता। अब दिवाली पर उनकी जिंदगी में नई रोशनी आई है। खंडवा की कृष्णा घड़िये ने तीनों बच्चों को गोद लेकर मां का आंचल दिया है। छोटू, पवन और अर्जुन अब मधुसूदन, महेश और मयंक के नाम से नई जिंदगी शुरू करेंगे।
किसी के बचपन की शुरुआत खिलौनों और मां की लोरियों से होती है। लेकिन छोटू, पवन और अर्जुन का बचपन अपनों के बिछड़ने और अपनों के इंतजार में बीता। कोरोना काल में माता-पिता का साया सिर से उठ गया। तब इनमें से सबसे छोटा महज दो साल का था। माता-पिता के निधन के बाद तीनों बच्चों की जिंदगी में ऐसा मोड़ आया कि उन्हें उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के शिशु बाल गृह में पहुंचना पड़ा। करीब चार से पांच साल तक बाल गृह की चारदीवारी ही उनका घर रही। अब दिवाली पर उनकी जिंदगी में नई रोशनी आई है। खंडवा की 50 वर्षीय कृष्णा घड़िये ने तीनों बच्चों को गोद लेकर उन्हें मां का आंचल दिया है। छोटू, पवन और अर्जुन अब मधुसूदन, महेश और मयंक के नाम से पहचाने जाएंगे।
तीनों बच्चों को दो नवंबर को गोरखपुर से खंडवा लाया गया। अब उनका नया घर महेश नगर में होगा। यहां उनके लिए नया परिवार और नई जिंदगी इंतजार कर रही है। सबसे बड़ा बेटा मधुसूदन 11 साल का है। महेश सात और मयंक पांच साल का है। कृष्णा कहती हैं कि बच्चों को पढ़ाना उनकी पहली प्राथमिकता है। उन्हें अच्छी शिक्षा और संस्कार देना चाहती हूं। बच्चों का मानसिक विकास हो। वे अपनी पसंद का लक्ष्य तय करें और उसे हासिल करें।
कृष्णा की अपनी जिंदगी भी संघर्षों से भरी रही है। ससुराल में प्रताड़ना झेली। घरेलू विवाद के चलते उन्हें घर से बाहर तक होना पड़ा। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। मुश्किल हालात में पढ़ाई जारी रखी। दिन में मजदूरी और रात में पढ़ाई की। रेलवे स्टेशन और बस स्टैंड पर रहकर भी पढ़ाई की। किराए का कमरा लेने तक की स्थिति नहीं थी। इसके बावजूद उन्होंने आगे बढ़ने का संकल्प नहीं छोड़ा।
वर्ष 1996 में शादी के बाद खंडवा में रहकर पढ़ाई की। वर्ष 1998 में कॉलेज में प्रवेश लिया और 2001 में कॉलेज की पढ़ाई पूरी की। बाद में माध्यमिक शिक्षक वर्ग-2 बनीं। वर्ष 2005 में धावड़ी में पदस्थ हुईं। वर्तमान में मलगांव के कन्या छात्रावास में पदस्थ हैं। यहां 50 सीटर छात्रावास की जिम्मेदारी संभाल रही हैं।
कृष्णा बताती हैं कि जीवन में जो तकलीफें झेली हैं, उनसे दूसरों का दर्द समझने की सीख मिली। अनाथ बच्चों को मां का प्यार और परिवार दे सकूं, यही इच्छा थी। इसी सोच के साथ वर्ष 2025 में बच्चों को गोद लेने के लिए ऑनलाइन आवेदन किया। किलकारी संस्था के माध्यम से प्रक्रिया पूरी हुई। अधीक्षक के सहयोग से तीनों बच्चों को नया परिवार मिला। अब उनका सपना इन बच्चों को पढ़ा-लिखाकर आत्मनिर्भर बनाना है।
कृष्णा घड़िये का जीवन संघर्ष की मिसाल है। ससुराल में प्रताड़ना झेली। आर्थिक तंगी के बीच पढ़ाई जारी रखी। दिन में मजदूरी की और रात में पढ़ाई की। रेलवे स्टेशन और बस स्टैंड पर रहकर भी हौसला नहीं छोड़ा। आज वे माध्यमिक शिक्षक हैं। मलगांव के कन्या छात्रावास में पदस्थ हैं। अब तीन अनाथ बच्चों को गोद लेकर उनके जीवन में मां की भूमिका निभाएंगी।
कृष्णा तीनों बच्चों की पढ़ाई को लेकर गंभीर हैं। मधुसूदन अभी कक्षा दो में पढ़ रहा है। छोटे बच्चों की पढ़ाई भी व्यवस्थित कराएंगी। उनका प्रयास है कि शुरुआती कक्षाओं में बच्चों की बुनियाद मजबूत हो। इसके बाद नियमित स्कूल में दाखिला दिलाएंगी। केंद्रीय विद्यालय में पढ़ाने की भी योजना है। बच्चों को सिर्फ शिक्षा ही नहीं, बल्कि अच्छा माहौल, संस्कार और अपनी पसंद का लक्ष्य चुनने की आजादी भी देंगी।