
एक भारतीय आत्मा राष्ट्रकवि पं. माखनलाल चतुर्वेदी गांधीजी से मिलने के पहले क्रांतिकारी दल से जुड़े रहे। एक बार क्रांतिकारियों के लिए पिस्टल की खेप फलों की टोकरी में माखन दादा के पास खंडवा आई। अंग्रेजों को इसकी भनक लग गई और तलाशी लेने दादा के घर पहुंच गए। दादा ने एक कमरे की ओर इशारा कर कहा कि मेरी मौत का सामान उस कमरे में रखा है। अंग्रेजों के हिंदुस्तानी अफसर समझ गए, लेकिन मन में देशभक्ति की लहर उठने से तलाशी के दौरान कुछ नहीं मिलने की बात कहते हुए वापस चले गए।
देश आजादी की 80वीं वर्षगांठ मना रहा है। देश की आजादी में खंडवा का भी बड़ा योगदान रहा है। राष्ट्रकवि पं. माखनलाल चतुर्वेदी ने भी खंडवा से आजादी के आंदोलन की अलख जगाई थी। वर्ष 1913 में माखनदादा एक शिक्षक के रूप में खंडवा आए थे और इसे ही अपनी कर्मभूमि बना लिया था। शुरुआती दौर में माखन दादा ने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी कालूराम गंगराड़े के लिए प्रभा पत्रिका का प्रकाशन खंडवा से किया। सरकारी नौकरी में होने से दादा पत्रिका में छद्म नाम से लेख लिखते रहे। वर्ष 1925 में दादा ने खंडवा से कर्मवीर का प्रकाशन शुरू किया। इसके पूर्व 1920 से कर्मवारी का प्रकाशन जबलपुर से आरंभ हो चुका था।
आजादी के आंदोलन के दौरान रशियन क्रांति की पुस्तक खंडवा आई थी। अंग्रेज अफसर इस किताब को ढूंढ रहे थे। किताब दादा ने कर्मवीर प्रेस के दफ्तर में उसका कवर हटवाकर दूसरा कवर लगाकर रख दी थी। अंग्रेज अफसर सुबह-सुबह दादा के घर पहुंच गए। यहां तलाशी में पुस्तक नहीं मिली। अंग्रेजों ने प्रेस की तलाशी लेने की बात कही। दादा ने अपने मैनेजर भुवनेश्वरी प्रसाद सिन्हा से कहा कि इन्हें वहां तलाशी करवा दो, तुम पुस्तक लेकर पढऩे बैठ जाना। सिन्हा चतुर व्यक्ति थे, अंग्रेजों को प्रेस ले गए और कवर बदली हुई रशियन क्रांति की बुक लेकर पढऩे बैठ गए। अंग्रेज प्रेस में पुस्तक ढूंढते रहे, लेकिन नहीं मिली, जिसके बाद हारकर लौट गए।
क्रांतिदल से जुड़े रहने के दौरान क्रांतिकारियों तक पिस्टल की खेप पहुंचाने के लिए फलों की टोकरी में पिस्टल की खेप दादा के पास पहुंची। दादा ने उसे अलमारी में रखवा दी, इतने में अंग्रेज पुलिस के सर्कल इंस्पेक्टर तिवारी दल के साथ दादा के घर पहुंच गए। दादा समझ गए आज वे पकड़े जाएंगे। अंग्रेज सिपाहियों ने घर की तलाशी लेना शुरू की। दादा ने सर्कल इंस्पेक्टर तिवारी के कान में कहा मेरी मौत का सामान उस कमरे में है। एसआई तिवारी भले ही अंग्रेज पुलिस में अफसर थे, लेकिन दिल में आजादी की लौ जल रही थी। तिवारी खुद कमरे में गए और कुछ देर बाद आकर बोले चलों यहां कुछ नहीं है। तिवारी ने दादा से कहा एक घंटे बाद फिर तलाशी लेने आएंगे, दादा समझ गए और उनके जाते ही पिस्टल तय स्थान पर भिजवा दी।
दादा ने आजादी के आंदोलन के दौरान 1919 में इलाहबाद (अब प्रयागराज) में अपने गुरु के समक्ष आजादी के लिए क्रांति की शपथ ली थी। गुरु ने दादा को गंगाजी में खड़ा करवा कर गीता, जनेऊ, पिस्टल और हाथ में गंगाजल देकर शपथ दिलाई थी। दादा की मुलाकात 1920 में महात्मा गांधी से हुई तो वे क्रांतिदल छोडकऱ अहिंसक आंदोलन का हिस्सा बन गए। दादा जीवन भर अहिंसा के मार्ग पर चले, लेकिन आजादी के आंदोलन में कभी उन्होंने क्रांतिकारियों के विरोध में कभी नहीं लिखा।
-जैसा की माखन दादा के भतीजे प्रमोद चतुर्वेदी ने बताया।