विलुप्त होते गिद्धों को लेकर एक बार फिर की गणना खत्म हो गई। इस बार के बारे आंकड़े में भी निराशाजनक है। पश्चिम व पूर्व कालीभीत सहित जिले भर के जंगलों में भटकने के बाद भी वन कर्मियों को एक भी गिद्ध नहीं मिला। यह िस्थति पिछले तीन सालों से बनी हुई है।
जिले से विलुप्त होते इजिप्शियन वल्चर (गिद्ध) का पता लगाने के लिए 20 से 22 फरवरी तक 14 बीटों में गिद्धों की गणना की गई। एपी कलेक्ट ऐप से वनकर्मियों ने गिद्धों का पता लगाया गया। तीन दिन तक घन जंगल, पहाड़ी क्षेत्र के साथ शहरी क्षेत्र में वनकर्मियों ने गिद्धों की िस्थति का पता लगाने का प्रयास किया, लेकिन एक जगह गिद्ध नजर नहीं आए हैं।
हालांकि गणना के दौरान गिद्ध कहीं नजर नहीं आए हैं। लेकिन आम दिनों में यह जरूर दिखे हैं। वन विभाग के पास इसका भी एक डेटा हैं। जिसमें जंगल में गिद्धों की उपिस्थति बनी हुई है। बताया जाता है कि इन्हें यहां आसानी से भोजन उपलब्ध हो पा रहा है। जिससे यहां इनकी संख्या 10 से अधिक हैं।
पशुओं के बीमार होने पर अक्सर डाइक्लोफेनाक दवा दी जाती है। इसका इंजेक्शन लगा देते हैं। इसका असर पशुओं की कीडनी पर होता है। उनके मर जाने के बाद जब उनके शवों को गिद्ध खाते हैं तो उनकी भी मौत हो जाती है। गिद्धों के विलुप्त होने के पीछे यह बड़ा कारण सामने आया है। हालांकि अब पशुओं को डाइक्लोफेनाक दवा देने पर प्रतिबंध लगा हुआ है।
- विलुप्त होते इजिप्शियन वल्चर की िस्थति का पता लगाने के लिए इस वर्ष तीन दिनों तक गणना की गई। ग्रामीण और वन परिक्षेत्र में वनकर्मी ने भ्रमण किया है। इस दौरान एक भी गिद्ध नजर नहीं आया। हालांकि वन क्षेत्र में कुछ जगह गिद्ध है जो आम दिनों में नजर आए हैं। - राकेश कुमार डामोर, डीएफओ।