लोक संस्कृति महापर्व भगौरिया को लेकर उत्साह है। जिले का सबसे बड़ा भगौरिया मेला शनिवार को बोरगांव बुजुर्ग में लगा। समय के साथ भगौरिया पर्व में आधुनिकता का समावेश हुआ है, लेकिन इसकी पारंपरिक पहचान आज भी बरकरार है। पारंपरिक परिधानों में आंखों में चश्मा लगा चांदी के गहने पहने युवतियां उल्लास के साथ पर्व मनाती नजर आई। युवक भी टोलियों में एक जैसे परिधानों में मांदल की थाम पर थिरकते रहे।
बोरगांव बुजुर्ग में शनिवार को भगौरिया मेल में आसपास के 50 से अधिक गांव, फालिया व टांडा से आदिवासी समाज के लोग उमड़े। यहां सुबह करीब 11 बजे से ही मेले में युवाओं की टोलियां पहुंचने लगी थी। दोपहर तक मेला पुरी तरह से भर गया। युवक व युवतियां ड्रेस कोड में नजर आए। लाल, गुलाबी, काले रंग की साड़ी पहनी युवतियां आकर्षक श्रृंगार कर मेले में पहुंची। गला, हाथ, कमर व बाजू में पारंपरिक चांदी के गहने पहन रखे थे।
युवक भी सज धज कर आंखों में चश्मा लगाए मेले का आनंद लेते रहे। युवाओं की टोलियों ने एक दूसरे को गुलाल लगाकर होली पर्व की बधाई थी। पंधाना विधायक छाया मोरे भी मेले में शामिल हुई। मेले में सुरक्षा व्यवस्था पुख्ता रही। बोरगांव चौकी प्रभारी आरपी यादव स्टाफ के साथ मेले में भ्रमण करते रहे।
समय के साथ भगौरिया पर्व में कई बदलाव देखने को मिले हैं। पहले यह केवल पारंपरिक मांदल (ढोल) की थाप और आदिवासी गीतों के साथ मनाया जाता था, लेकिन अब डीजे साउंड ने भी जगह बना ली है। पारंपरिक आभूषण जैसे चांदी के कड़े, बाजूबंद और गले के आभूषण पहने जाते थे, लेकिन अब आर्टिफिशियल ज्वेलरी ने भी अपनी जगह बना ली है। पारंपरिक परिधानों के साथ-साथ जींस-टीशर्ट, डिजाइनर घाघरा चोली और अन्य आधुनिक कपड़े भी पहनकर युवक-युवतियों मेले में आई। भगौरिया मेले में गुड की जलेबी खास होती है। ग्रामीणों इसकी मिठास का भी लुप्त उठाया।
बोरगांव बुजुर्ग पंचायत की तरफ से मेले में टेंट व्यवस्था की गई थी। अलग-अलग गांवों से आए ग्रामीण मांदल अपने साथ लेकर आए थे। टेंट में मांदल की थाप व थाली बजाते हुए गोल घेरा बनाकर ग्रामीणों ने अपना पारंपरिक नृत्य किया। हाथ में रूमाल और तीर कमान लिए युवा झूमते रहे। कुछ लोग खाने-पी में व्यस्त रहे। युवाओं ने एक दूसरे के साथ सेल्फी लेकर मेले में लुत्फ उठाया।