
चित्र देखो कहानी लिखो प्रतियोगिता—98
बच्चों, कहानियां सुनने में जितना मजा आता है, उससे कई ज्यादा सुनाने में। कहानियां सुनाना भी खास तरह की प्रतिभा है। कहानियां वही सुना सकता है, जिसकी कल्पनाशीलता विस्तृत होती है। कल्पना भी इतनी हो कि कहानी रोचक बन पाए। आप भी इस रोचक प्रतिभा को अर्जित करना चाहते हैं तो कहानी कहना सीखना होगा। कहानी कहने की इसी प्रतिभा पर परिवार परिशिष्ट के 30 सितंबर के अंक में एक चित्र दिया गया और बच्चों को कहानी लिखने को कहा गया। देशभर से बच्चों की कई कहानियां मिलीं। चुनिंदा बच्चों की कहानियां परिवार परिशिष्ट के पेज चार पर लगाई गई और शेष यहां दी जा रही हैं। सभी बच्चे कहानियां लिखते रहें। हमारी कोशिश यही है कि वे सीखना और लिखना कभी न छोड़े।
कल्पना की दुनिया
यशस्व कुमावत, 7 वर्ष
एक सुनहरी दोपहर रिया समुद्र तट पर रेत से खेल रही थी। ठंडी हवाएं चल रही थीं और आसमान में सितारे जैसे सुनहरे सपने तैर रहे थे। रिया ने अपनी बाल्टी और कुदाल उठाई और बड़े चाव से एक भव्य रेत का महल बनाना शुरू कर दिया। उसने महल पर सुंदर मीनारें बनाईं और उन पर छोटे-छोटे रंग-बिरंगे झंडे लगाए। वह अपनी ही धुन में खोई हुई थी और उसकी आंखों में एक अनोखी चमक थी। धूप से बचने के लिए उसने एक बड़ी सी हैट पहन रखी थी। देखते ही देखते रिया ने अपनी मेहनत और कल्पना से एक खूबसूरत महल तैयार कर दिया। भले ही वह रेत का था, लेकिन उस पल रिया के लिए वह किसी असली राजमहल से कम नहीं था। उसने जाना कि कोशिश करने से हम अपनी छोटी सी दुनिया को भी खूबसूरत बना सकते हैं।
धैर्य और हिम्मत
दीक्षिता दहिया, 8 वर्ष
एक दिन रिया अपने माता-पिता के साथ समुद्र किनारे घूमने गई। समुद्र की लहरें बहुत सुंदर लग रही थीं और ठंडी हवा चल रही थी। रिया ने देखा कि किनारे पर बहुत सारी नरम रेत पड़ी है। उसके मन में रेत का महल बनाने का विचार आया। रिया ने अपनी बाल्टी और फावड़ा निकाला और रेत इकट्ठी करने लगी। उसने पहले महल की नींव बनाई। फिर उसने बाल्टी की मदद से महल की दीवारें और ऊँची-ऊँची मीनारें बनाईं। मीनारों के ऊपर उसने छोटी-छोटी झंडियाँ भी लगाईं। कुछ देर की मेहनत के बाद एक सुंदर रेत का महल तैयार हो गया।
रिया अपने महल को देखकर बहुत खुश हुई। उसने सोचा कि वह अपने दोस्तों को भी यह महल दिखाएगी। तभी अचानक समुद्र की एक बड़ी लहर किनारे तक आई और महल का एक हिस्सा टूट गया। रिया थोड़ी उदास हो गई, लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी। उसने फिर से रेत इकट्ठी की और टूटे हुए हिस्से को ठीक करने लगी। थोड़ी देर में उसका महल फिर से सुंदर बन गया। रिया ने खुशी से कहा, “अगर हम मेहनत करें और हार न मानें, तो हर मुश्किल को दूर कर सकते हैं।” उस दिन रिया ने सीखा कि मेहनत, धैर्य और हिम्मत से सफलता जरूर मिलती है।
सोमवार की दोपहर का तोहफा
ईश्वर सुथार, 07 वर्ष
यह सोमवार की एक खुशनुमा दोपहर थी जब 13 साल की माया अपनी मम्मी-पापा के साथ शहर के मशहूर 'सिल्वर बीच' पर पहुंची। नीले समंदर की लहरें तट से टकरा रही थीं और आसमान में सफेद रुई जैसे बादल तैर रहे थे। हल्की हवा चल रही थी जो चेहरे को छूकर गुजर जाती थी। माया एक क्रिएटिव लड़की थी, और आज उसके पास खाली समय था। वह तट पर रेत के एक ऊंचे टीले के पास बैठी और उसने अपनी पेंटिंग किट खोली। सबसे पहले, उसने एक बड़ा सा रेत का महल बनाना शुरू किया। उसने अपने दोनों हाथों का इस्तेमाल करके रेत को जमा किया और उसे एक इमारत का आकार दिया। फिर, उसने पास ही पड़े रेत के बकेट को पानी से भरा और उसमें रंगीन पेंट्स मिलाए। उसकी ब्रश रंगे हुए रेत पर सरकने लगी। उसने रेत के महल की दीवारें, गुंबद और खिड़कियों पर गहरे रंग के डिज़ाइन बनाए। सबसे पहले एक बड़ा, फिर दो छोटे टॉवर—बिल्कुल जैसा वह चाहती थी। उसने लाल रंग से तिरंगे झंडे बनाए और उन्हें सबसे ऊंची मीनार पर लगा दिया। अंत में, उसने चमकदार सितारों के स्टीकर चुने और उन्हें महल की दीवारों पर चिपका दिया, जो सूरज की रोशनी में जगमगा रहे थे। जब महल बनकर तैयार हुआ, तो यह किसी परी-कथा के महल जैसा लग रहा था। माया की मम्मी-पापा ने उसे बनाने में उसकी मदद भी की थी, और उसकी इस कला को देखकर वे बहुत खुश थे। वे सभी समंदर के किनारे बैठकर इस खूबसूरत दृश्य का आनंद ले रहे थे।
रेत का सुंदर महल
हरनिश प्रजापत, 10 वर्ष
एक दिन आरवी अपने परिवार के साथ समुद्र तट पर घूमने गई। मौसम बहुत सुहावना था। आसमान में सफेद बादल तैर रहे थे और ठंडी हवा चल रही थी। आरवी ने गुलाबी टोपी और बैंगनी रंग की सुंदर फ्रॉक पहन रखी थी। वह बहुत खुश थी। समुद्र तट पर पहुँचकर आरवी ने रेत से एक बड़ा और सुंदर महल बनाने का निश्चय किया। उसने अपनी छोटी बाल्टी और फावड़ा निकाला। पहले उसने गीली रेत इकट्ठी की। फिर वह ध्यान से महल बनाने लगी। उसने महल में ऊँचे-ऊँचे बुर्ज बनाए और छोटे-छोटे दरवाजे भी बनाए। महल देखकर ऐसा लग रहा था जैसे किसी राजा का महल हो। आरवी बहुत मेहनत कर रही थी। वह बार-बार रेत लाती और अपने महल को और सुंदर बनाती। कुछ समय बाद उसका महल तैयार हो गया। पास से गुजर रहे लोग भी उसके महल को देखकर खुश हुए। सभी ने उसकी मेहनत की प्रशंसा की।
तभी आरवी ने सोचा कि हमें हर काम मन लगाकर करना चाहिए। मेहनत और धैर्य से किया गया काम हमेशा अच्छा बनता है। उसने अपने महल के पास एक छोटा झंडा भी लगाया। शाम होने लगी तो आरवी अपने परिवार के साथ घर लौट गई। जाते समय वह अपने सुंदर महल को देखकर मुस्कुरा रही थी। उस दिन उसने सीखा कि मेहनत, लगन और धैर्य से हम कोई भी काम अच्छी तरह कर सकते हैं। यह दिन उसके लिए बहुत यादगार बन गया।
समुद्र तट का जादू
जनक राजपुरोहित, 8 वर्ष
एक दिन की बात है। एक छोटी लड़की समुद्र के किनारे छुट्टियां मनाने गई थी। उसका नाम रिया था। रिया को रेत से खेलना बहुत पसंद था। उसने अपने साथ एक छोटी बाल्टी और फावड़ा भी लिया था। रिया ने समुद्र के पास बैठकर रेत से एक सुंदर महल बनाना शुरू किया। उसने पहले महल की दीवारें बनाईं। फिर उसने महल के चारों ओर ऊँचे-ऊँचे बुर्ज बनाए। बुर्जों के ऊपर उसने छोटे-छोटे झंडे भी लगाए। महल देखने में बहुत सुंदर लग रहा था। रिया बहुत खुश थी। वह अपने बनाए महल को देखकर मुस्कुरा रही थी। तभी समुद्र की एक बड़ी लहर आई और महल के पास तक पहुँच गई। रिया थोड़ी डर गई, लेकिन उसने हिम्मत नहीं छोड़ी। उसने जल्दी से महल के चारों ओर रेत की एक मजबूत दीवार बना दी। कुछ देर बाद लहरें वापस चली गईं। रिया का महल सुरक्षित था। वह खुशी से उछल पड़ी। उसने अपने माता-पिता को बुलाकर अपना सुंदर महल दिखाया। सभी ने रिया की बहुत तारीफ की। रिया ने सीखा कि मेहनत, धैर्य और समझदारी से हर काम को सुंदर बनाया जा सकता है।
रितु का जादुई किला
निहान शर्मा, 5 वर्ष
चिलचिलाती धूप में, समुद्र किनारे बैठी नन्ही रितु अपने सपनों का किला बना रही थी। उसने अपनी फूलों वाली टोपी पहनी थी और बैंगनी रंग की पोशाक में वह बहुत खुश लग रही थी। अपने छोटे से बाल्टी और फावड़े से, उसने गीली रेत से ऊँचे टॉवर और मीनारें बनाईं, जिस पर लाल झंडे फहरा रहे थे। जैसे ही रितु ने अपने किले को देखा, उसे लगा कि उसमें से कुछ जादुई चमक आ रही है। आसपास की हवा में तारे चमकने लगे और हवा में एक हल्की सुगंध फैल गई। शायद यह उसकी कल्पना थी या शायद उस दिन सचमुच कुछ जादू हुआ था। रितु ने मुस्कुराते हुए अपने 'जादुई किले' को देखा, और उसके चेहरे पर खुशी की कोई सीमा नहीं थी।
सुंदर लहरों का साथ
करूणेश टेलर, 12 वर्ष
एक दिन अनन्या अपने माता-पिता के साथ समुद्र किनारे घूमने गई। समुद्र की लहरें बहुत सुंदर लग रही थीं। अनन्या ने देखा कि किनारे पर बहुत सारी गीली रेत थी। उसके मन में रेत का एक सुंदर महल बनाने का विचार आया। उसने बाल्टी और फावड़े की मदद से रेत इकट्ठी करनी शुरू की। पहले उसने महल की नींव बनाई। फिर धीरे-धीरे ऊँची दीवारें और चार सुंदर मीनारें बनाने लगी। वह महल को सजाने के लिए छोटी-छोटी सीपियाँ और रंग-बिरंगे पत्थर भी चुनकर लाई। काफी मेहनत के बाद उसका महल तैयार हो गया। वह खुशी से महल को देख ही रही थी कि अचानक समुद्र की एक बड़ी लहर आई और महल का एक हिस्सा बह गया। अनन्या थोड़ी उदास हुई, लेकिन उसने हार नहीं मानी। उसने फिर से रेत इकट्ठी की और अपने महल को पहले से भी सुंदर बनाने लगी। इस बार उसने महल के चारों ओर छोटी-सी नाली भी बना दी, ताकि पानी सीधे महल तक न पहुँचे। कुछ देर बाद महल तैयार हो गया। अनन्या ने अपने माता-पिता को बुलाकर अपना सुंदर महल दिखाया। सभी ने उसकी मेहनत की खूब तारीफ की। अनन्या समझ गई कि असफलता से निराश नहीं होना चाहिए। मेहनत और धैर्य से हम अपनी गलतियों को सुधारकर सफलता पा सकते हैं।
प्रिशा और जादू का समंदर
अनुष्का, 13 वर्ष
शहर की भागदौड़ से दूर, प्रिशा अपने मम्मी-पापा के साथ समन्दर किनारे छुट्टियाँ बिताने आई थी। आठ साल की प्रिशा को नई कहानियाँ गढ़ना बहुत पसंद था। एक सुनहरी दोपहर, अपनी बैंगनी फ्रॉक और फूलों वाली हैट पहने प्रिशा रेत पर आ बैठी। उसने अपनी बाल्टी और औज़ार निकाले और रेत से एक आलीशान महल बनाना शुरू कर दिया। वह महल में तीन ऊँची मीनारें और छोटे-छोटे झंडे बनाकर बारीकियाँ तराशने में खो गई। तभी एक जादुई चमत्कार हुआ! जैसे ही उसने महल के दरवाज़े को आख़िरी रूप दिया, रेत से एक हल्की-सी मीठी धुन निकलने लगी। प्रिशा हैरान होकर देखने लगी कि समन्दर की लहरों में से एक छोटी-सी परी बाहर आई।
परी ने मुस्कुराकर कहा, "नमस्ते प्रिशा! मैं इस समन्दर की परी हूँ। तुमने केवल रेत का महल नहीं बनाया, बल्कि अपनी कल्पना से इसमें 'धुनों का जादू' भर दिया है।" अचानक महल के दरवाज़े खुले और रेत के छोटे-छोटे पुतले बाहर आकर नाचने-गाने लगे। कोई राजा-रानी की कहानी सुना रहा था, तो कोई समन्दर की परियों के किस्से। प्रिशा का बनाया महल कहानियों की दुनिया बन चुका था। सूरज ढलने लगा तो परी ने कहा, "प्रिशा, जब भी तुम्हें कहानियों की याद आए, बस दिल से इस धुन को महसूस करना।" प्रिशा ने अपने जादुई महल को विदा कहा। वह समझ गई थी कि असली जादू किसी वस्तु में नहीं, बल्कि हमारी सोच और कल्पना में होता है। उस दिन के बाद, प्रिशा जब भी अपनी खिड़की के पास बैठती, उसे वही मीठी धुन सुनाई देती और वह एक नई कहानी लिखने लगती।
मीनारों वाला महल
ऋषित कुमार
उम्र - 8 वर्ष
एक बार की बात है। इवांशी नाम की एक बहुत ही प्यारी बच्ची थी। उसे पढ़ाई के साथ-साथ घूमने और खेलने का बहुत शौक था। एक बार वह अपने माता-पिता के साथ केरल घूमने गई। वहाँ वह जब एक समुद्र तट के पास पहुंची, तो उसकी खूबसूरती में खो गई। वहाँ चारों तरफ रेत फैली थी, दूर तक फैले पानी के ऊपर बादल बहुत खूबसूरत लग रहे थे। वह वहां फैले रेत में खेलनी लगी, ओर उसने कुछ ही देर में रेत से एक खूबसूरत किला बना दिया, जिसकी मीनारों पर उसने दो झंडे भी लगाए। उसके बनाए किले को देखकर उसके माता पिता के चेहरे पर मुस्कान आ गयी, ओर सभी खुशी खुशी आगे घूमने के लिए चल दिये।
लहरों पर सवारी
आरव जांगिड़, 11 वर्ष
अनन्या को हमेशा से ही समंदर और उसकी लहरों से बहुत प्यार था ।गर्मियों की छुट्टियों में वह अपने परिवार के साथ एक सुन्दर समुद्री किनारे पर घूमने गयी।आसमान में हल्के हल्के बादल थे। अनन्या अपने साथ एक छोटी बाल्टी और फावड़ा लेकर रेत के बीच बैठ गयी ।उसका सपना था,कि वह एक सुन्दर और शानदार रेत का किला बनाये।उसने बहुत ध्यान से मिट्टी इकट्ठा कर के किले की मीनार पर 'छोटे -छोटे'झंडे लगाए और चारो तरफ सुन्दर दरवाजे भी लगाए। उसने अपनी टोपी के फूलों की तरह किले को भी सजाने की कोशिश की।
किला लगभग बन कर तैयार हो ही चुका था,कि समंदर की लहर आयी और किले का एक हिस्सा बहाकर ले गयी। अनन्या पहले तो उदास हुई, पर उसने हार नहीं मानी वह मुस्कराई और दुबारा से रेत इकट्ठा कर के पहले से भी मजबूत और सुन्दर किला बनाया। अनन्या ने उस दिन सीखा की सफलता पाने के लिए मेहनत और धर्य बहुत जरूरी है ।उसकी ये छोटी सी कोशिश उसके लिए यादगार सीख बन गयी।
सुंदर महल में फूल
अनुराग प्रताप सिंह, 7 वर्ष
गर्मियों की छुट्टियों में रिया अपने माता-पिता के साथ समुद्र तट की सैर पर गई थी। नीले समंदर की उठती लहरें और ठंडी हवा का झोंका उसके मन को बहुत भा रहा था। रिया ने धूप से बचने के लिए अपनी पसंदीदा फूलों वाली बड़ी सी हैट और सुंदर बैंगनी फ्रॉक पहनी हुई थी।
रेत पर बैठकर खेलना रिया को सबसे ज्यादा पसंद था। उसने अपनी छोटी बाल्टी और औजार निकाले और भीगी सुनहरी रेत से कुछ अनोखा बनाने की ठान ली। उसने धीरे-धीरे रेत को जमा किया और एक भव्य किले का आकार देने लगी। रिया पूरी एकाग्रता के साथ किले में ऊंचे गुंबद, खूबसूरत मेहराबदार दरवाजे और मजबूत दीवारें तराशने लगी। उसने किले की मीनारों पर लाल रंग के छोटे-छोटे झंडे भी लगाए, जिससे वह बिल्कुल परियों के देश का राजमहल लगने लगा। रिया की मेहनत रंग लाई और देखते ही देखते रेत का एक जादुई किला तैयार हो गया। समुद्र की लहरें जब तट के पास आतीं, तो मानों उस सुंदर महल को देखकर मुस्कुराती हुई वापस लौट जातीं। पास से गुजर रहे लोग भी रिया की इस अद्भुत कला और मेहनत की तारीफ कर रहे थे। रिया जानती थी कि शाम होते ही समुद्र की कोई बड़ी लहर आकर उसके महल को बहा ले जाएगी
छोटी परी और सपनों का किला
युवान शर्मा, उम्र 9 साल
सोनम की उम्र अभी 9 साल थी, लेकिन उसकी कल्पनाओं की उड़ान बहुत बड़ी थी हर साल गर्मियों की छुट्टियों में वह अपने माता-पिता के साथ समंदर के किनारे घूमने जाती थी। इस बार भी वह नीले समंदर के तट पर पहुंची, समंदर की ठंडी लहरें चमकती हुई रेत और आसमान में उड़ते पंछी उसे किसी जादुई दुनिया जैसे लग रहे थे| सोनम ने अपनी पसंदीदा गुलाबी टोपी पहनी और रेट पर बैठ गई उसने अपने साथ एक पीली बाल्टी और एक छोटा सा खिलौना लिया था वह रेत से शानदार किला बनाना चाहती थी। उसने बाल्टी में गीली रेत भरी और बड़े प्यार से थपथपाया और उलट दिया धीरे-धीरे एक खूबसूरत मीनार खड़ी हो गई सोनम ने उसके लिए सजाने के लिए आसपास से रंग-बिरंगे शंख और सीपिया इकट्ठी की।
बेटी पर गर्व
हेमा जांगिड़, 8 वर्ष
डिंपल और उसके मम्मी पापा एक दिन समुद्र किनारे घूमने गए, डिंपल के मम्मी पापा फोटो खींचने में व्यस्त हो गए डिंपल बोर होने लगी। उसने बीच पर मिट्टी का घर बनाने का सोचा। वह मिट्टी से घर बनाने लगी उसने बहुत सुंदर घर बनाया उसके आस पास के लोग उसकी तारीफ करने लगे यह सुनकर उसके मम्मी पापा अपनी बेटी पर गर्व करने लगे।
समंदर की पहली सैर
कृतिका, 12 वर्ष
कृतिका को नई-नई जगह घूमना और सैर-सपाटे पर जाना बहुत अच्छा लगता था। जैसे ही गर्मियों की छुट्टियाँ पड़ीं, उसका मन कहीं बाहर जाने को करने लगा। इस बार उसके पापा उसे दूर समंदर किनारे (बीच पर) घुमाने ले गए। कृतिका ने पहली बार इतना बड़ा समंदर देखा था। पानी की बड़ी-बड़ी लहरें जब किनारे पर आकर टकरातीं, तो ऐसा लगता मानो कोई मधुर बाजा बज रहा हो। सिर पर अपनी फूलों वाली टोपी लगाए कृतिका गीली रेत पर बैठ गई। उसने पापा के साथ मिलकर रेत के कई रूप बनाए। फिर कृतिका ने अपनी कल्पना से रेत का एक बड़ा और सुंदर महल तैयार किया। उसमें छोटे-छोटे झरोखे, बुर्ज और ऊपर एक नन्हीं झंडी भी लगाई। रेत का महल इतना खूबसूरत बना कि देखकर पापा का चेहरा खुशी से खिल उठा। वहाँ घूम रहे बाकी लोग भी रुककर देखने लगे और कृतिका की खूब तारीफ की। दिनभर मौज-मस्ती के बाद दोनों ने छाँव में बैठकर आराम किया और शाम ढलते ही हँसी-खुशी घर लौट आए। छुट्टियाँ खत्म होने के बाद जब स्कूल खुला, तो मास्टर जी ने सभी बच्चों से पूछा कि छुट्टियों में किसने क्या किया। सभी साथियों ने अपने-अपने किस्से सुनाए। कृतिका की बारी आई, तो उसने खुश होकर समंदर की लहरों और अपने रेत के महल की पूरी बात मास्टर जी और दोस्तों को बताई। सबने ताली बजाकर उसकी बात की खूब सराहना की।
रिया का महल
तुषार मेवाड़ा, 11 वर्ष
एक सुंदर धूप वाले दिन, रिया समुद्र के किनारे घूमने गई। वह हमेशा से बहुत रचनात्मक लड़की थी और उसे नई-नई चीज़ें बनाना पसंद था। समुद्र की ठंडी लहरें और नर्म रेत देखकर उसका मन खुशी से झूम उठा। रिया ने तुरंत अपने खिलौने निकाले। उसने एक छोटा हरा बाल्टी और एक छोटा बेलचा लिया और गीली रेत से एक शानदार महल बनाना शुरू कर दिया। उसने बड़ी मेहनत से महल की ऊँची मीनारें बनाईं और उन पर छोटे-छोटे लाल झंडे भी लगाए। वह अपने महल को एकदम असली राजा-रानी के महल जैसा रूप देना चाहती थी।
जब महल बनकर तैयार हो गया, तो रिया बहुत खुश हुई। वह वहीं पास में रेत पर बैठ गई। उसने पास में रखे अपने छोटे रेडियो को चालू किया और समुद्र की ठंडी हवाओं के बीच मधुर संगीत का आनंद लेते हुए अपने बनाए सुंदर महल को निहारने लगी। वह दिन रिया के लिए बहुत ही यादगार और जादुई था।
समुद्रतट की सैर
नेहल जैन, 10 वर्ष
एक बार की बात है। एक लड़की का नाम नेहल था। उसकी एक बहुत बड़ी इच्छा थी कि उसे समुद्रतट (बीच) पर जाना था। एक दिन उसकी यह इच्छा पूरी होने जा रही थी। नेहल के मम्मी-पापा ने बीच पर जाने का सोचा और नेहल को लेकर अगले दिन निकल गए। नेहल को यह भी नहीं पता था कि वे कहाँ जा रहे हैं, फिर भी वह मन ही मन खुश हो रही थी। जैसे ही वे बीच पर पहुँचे, नेहल की आँखें खुशी से चमक उठीं। वह जाते ही वहाँ की रेत से एक सुंदर-सा महल बनाने लगी। उसको महल बनाने में बहुत मजा आ रहा था। उसका महल बनने ही वाला था, लेकिन किसी कारणवश वह अपने मम्मी-पापा के पास गई। उसके बाद जब वह वापस लौटकर अपना महल पूरा करने आई, तो उसने देखा कि उसका महल किसी ने गिरा दिया है, तो वह उदास होकर रोने लगी और एक कोने में जाकर बैठ गई। उसकी मम्मी ने उसे समझाया कि हमें जीवन में कभी भी हार नहीं माननी चाहिए। नेहल अपनी माँ की बातों से प्रेरित होकर फिर से एक नया महल बनाने लगी। उसने जल्द ही अपना नया महल बना लिया। ऐसा लग रहा था मानो आसमान भी तारे टिमटिमाकर नेहल का साथ दे रहा हो।
अंजेला का सपना
भाविक, 11 वर्ष
एक दिन अंजेला अपने पिताजी के साथ बाहर टहल रही थी। अचानक उसकी नज़र तट की तरफ पड़ी तो वह पिताजी से ज़िद करने लगी। उसके पिताजी उसकी ज़िद से परेशान होकर उसे तट पर ले गए। वहाँ जाते ही उसने मिट्टी से अलग-अलग चीज़ें बनाना शुरू कर दिया। वह कभी कोई पहाड़ बनाती तो कभी महल। शाम का समय था। आसमान में तारे और पक्षी थे, ठंडी हवा चल रही थी और रेडियो में संगीत बज रहा था, जो उसके लिए एक अलग ही माहौल था। उसने एक सुंदर सा महल बनाकर अपने पिताजी को दिखाया और उन्होंने उसे शाबाशी दी। अचानक हवा के एक झोंके से मिट्टी उसकी आँखों में चली गई। वह आँखों को मलने लगी तो उसने पाया कि वह अपने कमरे में बिस्तर पर लेटी हुई है। उसने सोचा, कितना अच्छा सपना था! न जाने क्यों उसे ऐसा लग रहा था कि यह सपना उसे ज़िंदगी भर याद रहेगा।
झंडों का घर
सनी वालिया, 10 वर्ष
रिया ने तय किया कि वह आज एक शानदार महल बनाएगी। उसने अपनी छोटी सी बाल्टी और फावड़े की मदद से रेत को इकट्ठा करना शुरू किया। वह पूरी लगन से रेत के बड़े-बड़े ढेर बनाकर उन्हें महल के मीनारों का आकार देने लगी। धीरे-धीरे उसकी कल्पना हकीकत बदलने लगी। उसने महल की दीवारों पर सुंदर नक्काशी की और मीनारों के ऊपर छोटी-छोटी सूखी लकड़ियों से झंडे भी लगाए।
यादगार पल
आरव गोयल, 8 वर्ष
रिया की गर्मी की छुट्टियों से वो अपने माता-पिता के साथ समुद्र के किनारे घूमने गई थी। जब वो समुद्र के किनारे पहुँची, तो उसने वहाँ पर हल्की गीली मिट्टी देखी, तो उसने माता से पूछा की वो मिट्टी में खेल ले क्या? तो उसकी माता ने कहा हाँ। तब रिया ने उस मिट्टी से एक सुंदर घर बनाया और उसे सजा दिया। अपना घर देखकर वो बहुत खुश हुई।
खुशी की लहरें
हर्षित गुप्ता, 12 वर्ष
एक दिन एक छोटी बच्ची घूमने के लिए समुद्र किनारे गई। उसके माता-पिता ने पास में एक कमरा बुक किया था। बच्ची जल्दी से रेत का किला बनाने के लिए समुद्र किनारे चली गई। उसके पास एक बाल्टी, एक बैग और एक छाता था। वह थोड़ी देर तक रेत का किला बनाने में व्यस्त रही। फिर वह कुछ देर छाते के नीचे आराम करने लगी। तभी उसके दिमाग में एक बढ़िया विचार आया। उसने सोचा कि वह अपने रेत के किले को लाल रंग से सजाएगी, उस पर झंडे लगाएगी और एक दरवाज़ा भी बनाएगी। उसने बैंगनी रंग के कपड़े पहने थे, जिन पर एक सुंदर सफेद रंग की बेल्ट थी। उसने नारंगी रंग की टोपी भी पहनी हुई थी। जब उसने अपना सुंदर रेत का किला बनाना खत्म किया, तभी उसके मम्मी और पापा उसे बुलाने आ गए। बच्ची खुशी-खुशी अपने मम्मी-पापा के पास गई और उनके साथ वापस अपने कमरे में चली गई।
रेत से बना सपना
आरोही शर्मा, 12 वर्ष
एक बार की बात है। रिया नाम की एक लड़की अपनी माँ के साथ समुद्र किनारे घूमने गई थी। उसे रेत में खेलना बहुत पसंद था। उसने वहाँ बैठकर रेत से एक सुंदर महल बनाने का सोचा। उसने बाल्टी और फावड़े की मदद से रेत इकट्ठी की और धीरे-धीरे महल बनाने लगी। उसने महल की कई छोटी-बड़ी मीनारें बनाईं और उन्हें बहुत सुंदर तरीके से सजाया। कुछ समय बाद उसका महल तैयार हो गया। रिया अपने बनाए हुए महल को देखकर बहुत खुश हुई। वह सोचने लगी कि काश यह महल सच में होता और वह इसमें रह पाती। तभी समुद्र की एक तेज लहर आई और महल के पास तक पहुँच गई। रिया डर गई कि कहीं उसका महल टूट न जाए। लेकिन लहर वापस चली गई और उसका महल बच गया। रिया ने राहत की साँस ली और अपने महल को देखकर मुस्कुराने लगी। उसने अपनी माँ को बुलाकर अपना सुंदर महल दिखाया। माँ ने उसकी मेहनत की तारीफ की। रिया बहुत खुश हुई और उसने सोचा कि मेहनत और कल्पना से हम साधारण चीज को भी सुंदर बना सकते हैं।
उदासी को दूर करो
कबीर मालवीय, 7 वर्ष
गर्मियों की छुट्टियों में अनन्या अपने माता-पिता के साथ समुद्र किनारे घूमने गई थी। समुद्र की लहरें बहुत सुंदर लग रही थीं। अनन्या ने अपनी टोपी पहनी और रेत में खेलने बैठ गई। उसने बाल्टी और फावड़े की मदद से रेत का एक सुंदर महल बनाना शुरू किया। महल में ऊँची-ऊँची मीनारें, छोटे-छोटे दरवाजे और खिड़कियाँ थीं। उसने महल के चारों ओर खाई भी बनाई। वह अपने बनाए महल को देखकर बहुत खुश हुई। तभी एक बड़ी लहर आई और महल का एक हिस्सा बहा ले गई। अनन्या थोड़ी उदास हुई, लेकिन उसने हार नहीं मानी। उसने फिर से रेत इकट्ठी की और महल को पहले से भी सुंदर बनाने लगी। पास खेल रहे कुछ बच्चों ने उसे देखा और उसकी मदद करने आ गए। किसी ने मीनार बनाई, किसी ने दीवार सजाई और किसी ने सीपियों से महल को सजाया। थोड़ी देर में सबने मिलकर एक बहुत सुंदर रेत का महल बना दिया। सूरज ढलने लगा तो अनन्या ने अपने दोस्तों के साथ महल की तस्वीर खींची। उसने मुस्कुराते हुए कहा, “अकेले हम कुछ कर सकते हैं, लेकिन मिल-जुलकर हम बहुत कुछ कर सकते हैं।” उस दिन अनन्या ने सीखा कि मुश्किल आने पर हार नहीं माननी चाहिए और मिलकर काम करने से हर काम आसान हो जाता है।
मेहनत का महल
साक्षी शर्मा, 13 वर्ष
समुद्र के किनारे सुनहरी रेत पर नन्ही मायरा बैठी थी। सिर पर नारंगी टोपी, बैंगनी फ्रॉक और आँखों में बड़े-बड़े सपने। आज वो कोई आम खेल नहीं खेल रही थी, वो अपना महल बना रही थी। मायरा ने सुबह अपनी माँ से कहा था, "माँ मैं एक ऐसा महल बनाऊँगी जिसमें कोई दुखी न हो।" माँ मुस्कुरा दी थी। घंटों से वो रेत को सहेज रही थी। तीन बुर्ज, दो झंडे, एक बड़ा दरवाजा। पास में एक बाल्टी में गीली रेत और उसके औजार बिखरे पड़े थे। समंदर की लहरें पीछे से उसे देख रही थीं पर मायरा को सिर्फ अपने महल की फिक्र थी।तभी एक छोटा लड़का आया और बोला"ये तो टूट जाएगा, लहर आएगी तो बह जाएगा।" मायरा ने मुस्कुराते हुए कहा, "पता है, पर जब तक है तब तक तो सुंदर है न। उसने ब्रश से बुर्ज को आखिरी आकार दिया। वो महल रेत का था, पर उसकी खुशी असली थी। नारंगी छाते के नीचे बैठी मायरा को लग रहा था जैसे वो सच में उस महल की राजकुमारी है।शाम होने लगी माँ ने आवाज दी। मायरा उठी, अपने रेत के महल को एक बार प्यार से देखा और बोली "कल फिर आऊँगी, फिर से बनाऊँगी।" लहरें धीरे-धीरे किनारे की ओर बढ़ रही थीं। महल शायद रात तक न बचे, लेकिन मायरा ने जो बनाना सीखा था। सपने देखना, मेहनत करना और उस पल में खुश रहना। वो हमेशा उसके साथ रहने वाला था।
सपनों का महल
कान्हा माहेश्वरी, 7 वर्ष
एक खुशी नाम की छोटी बच्ची थी। उसे कहानी सुनना बहुत पसंद था। वह हमेशा कहानियों में राजा रानी के महलों के बारे में सुनती थी। एक दिन वह समुद्र के किनारे गई ,और सोचा मैं भी अपना एक सुंदर महल बनाऊंगी। उसने वहां पर रेत से महल बनाया। बनाते-बनाते वह सपने देखने लगी। इस महल में मैं और मेरी गुड़िया रानी हम दोनों रहेंगे। सपना देखते देखते वह मुस्कुराने लगी, और महल बनाने लगी। और जब महल बनाया, तो वह महल उसके सपनों जैसा ही सुंदर था।
रेत का खेल
राजरतन, 10 वर्ष
एक बार की बातें एक लड़की का नाम गुड़िया था । उसे मिट्टी से कुछ ना कुछ बनाने की आदत थी ।एक दिन वह मिट्टी का महल बना रही थी। उसे महल में तीन मीनार थी ।और एक बड़ा दरवाजा दरवाजा था। उसने महल के ऊपर उसकी पसंदीदा झंडी लगा दी। इस महल के पास एक बड़ा समुद्र था। उसे पता था कि समुद्र की एक लहर आए तो महल बह जाएगा तभी उसने महल के चारों और बड़े दीवार बना दी। वह महल उसके दिल में रह गया।
मिट्टी की खुशबू
मोक्षिका शेखावत, 11 वर्ष
हर साल की तरह इस साल भी रिया अपने माता-पिता के साथ समुद्र किनारे घूमने गई। उस मुलायम रेत में रिया अपना महल सजा रही थी पास ही में छतरी लगाकर उसके माता-पिता बैठे थे समुद्र की लहरें बहुत सुंदर लग रही थी और मधुर ध्वनि उत्पन्न कर रही थी।आकाश में तारे टिमटिमा रहे थे और चिड़िया उड़ रही थी उसने फूलों वाली टोपी पहनी और उस दिन रीया बहुत खुश थी । रिया को यकीन नहीं हुआ कि उसने इतना बड़ा महल खुद बनाया था। दूर से बहुत सुंदर नजारा दिखाई दे रहा था। मिट्टी की सुगंध बहुत ही अच्छी आ रही थी उस दिन रिया मन खुशी से झूम उठा था। उसके पास उसका बटन वाला पर्स भी पड़ा था। जो वह हमेशा अपने साथ रखती थी। वह उसकी पसंदीदा चीज थी।
रेत का जादुई महल
गौरांशी कसेरा, 12 वर्ष
एक बार की बात है, गुनगुन नाम की एक प्यारी बच्ची अपने माता-पिता के साथ समुद्र किनारे घूमने गई। वहाँ उसने सुनहरी रेत देखी और उसके मन में एक सुंदर सा महल बनाने का विचार आया। गुनगुन ने अपनी छोटी बाल्टी और फावड़ा निकाला। वह रेत को पानी से गीला करके धीरे-धीरे महल बनाने लगी। उसने महल के चारों ओर ऊँची दीवारें, सुंदर बुर्ज और छोटे-छोटे दरवाजे बनाए। सबसे ऊपर उसने लाल झंडे भी लगा दिए। जब महल तैयार हुआ तो गुनगुन खुशी से ताली बजाने लगी। तभी समुद्र से आती ठंडी हवा ने उसके महल को छुआ। अचानक उसे लगा जैसे महल चमकने लगा हो! महल के दरवाजे से एक नन्ही सुनहरी परी बाहर आई। परी ने मुस्कुराकर कहा, 'गुनगुन, तुम्हारी मेहनत और कल्पना बहुत सुंदर है। याद रखना, जो बच्चा लगन से कुछ बनाता है, उसके सपने भी एक दिन सच हो सकते हैं। '
गुनगुन ने परी को धन्यवाद दिया। अगले दिन वह फिर समुद्र किनारे आई और अपने दोस्तों के साथ मिलकर एक और बड़ा रेत का महल बनाया।
रेत का सुंदर महल
कबीर फगेड़िया, 9 वर्ष
एक दिन की बात है। डिंपल नाम की एक छोटी लड़की अपने माता-पिता के साथ समुद्र के किनारे घूमने गई। डिंपल ने सुंदर सी बैंगनी रंग की ड्रेस पहनी थी और सिर पर लाल रंग की फूलों वाली टोपी लगाई थी। वह बहुत खुश थी। समुद्र के किनारे पहुँचकर डिंपल ने देखा कि वहाँ बहुत सारी नरम रेत थी। उसने सोचा कि क्यों न रेत से एक बड़ा और सुंदर महल बनाया जाए। उसने अपनी छोटी बाल्टी और फावड़ा निकाला। फिर वह रेत इकट्ठी करने लगी। डिंपल ने पहले महल की बड़ी दीवार बनाई। उसके बाद उसने महल के चारों तरफ छोटी-छोटी मीनारें बनाईं। मीनारों के ऊपर उसने झंडे भी लगाए। महल के सामने उसने एक छोटा सा दरवाजा और खिड़कियाँ बनाईं। महल इतना सुंदर लग रहा था जैसे वह किसी परी की कहानी का महल हो। डिंपल महल को और सुंदर बनाने के लिए उसमें सीपियाँ और छोटे पत्थर लगाने लगी। तभी समुद्र की एक बड़ी लहर आई और रेत के महल के पास तक पहुँच गई। डिंपल थोड़ी डर गई, लेकिन उसने जल्दी से महल के चारों तरफ रेत की एक ऊँची दीवार बना दी। कुछ देर बाद महल पूरा तैयार हो गया। डिंपल ने अपने माता-पिता को बुलाकर अपना महल दिखाया। सबने उसकी बहुत तारीफ की। डिंपल बहुत खुश हुई। सूरज धीरे-धीरे डूबने लगा और आसमान सुंदर रंगों से भर गया। डिंपल ने अपने महल की एक तस्वीर खींची और सोचा, “आज का दिन मेरी जिंदगी का सबसे अच्छा दिन था।”