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खुशियों की टोकरी, रंगों का मेल और गुड़िया का खेल

कहानियाँ सुनना ही नहीं, सुनाना और लिखना भी एक रोचक कला है। इसके लिए कल्पनाशक्ति और रचनात्मक सोच जरूरी है। बच्चों को कहानी लिखने के लिए प्रेरित करने के उद्देश्य से एक चित्र दिया गया, जिस पर देशभर के बच्चों ने अपनी कहानियाँ लिखकर भेजीं। चुनिंदा कहानियाँ प्रकाशित की गईं, ताकि बच्चे सीखते रहें और अपनी लेखन प्रतिभा को निखारते रहें। ऐसी गतिविधियाँ बच्चों को नए विचार सोचने और उन्हें शब्दों में ढालने का अवसर देती हैं।
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Oct 11, 2026
खुशियों की टोकरी, रंगों का मेल और गुड़िया का खेल
खुशियों की टोकरी, रंगों का मेल और गुड़िया का खेल

चित्र देखो कहानी लिखो प्रतियोगिता—99

बच्चों, कहानियां सुनने में जितना मजा आता है, उससे कई ज्यादा सुनाने में। कहानियां सुनाना भी खास तरह की प्रतिभा है। कहानियां वही सुना सकता है, जिसकी कल्पनाशीलता विस्तृत होती है। कल्पना भी इतनी हो कि कहानी रोचक बन पाए। आप भी इस रोचक प्रतिभा को अर्जित करना चाहते हैं तो कहानी कहना सीखना होगा। कहानी कहने की इसी प्रतिभा पर परिवार परिशिष्ट के 07 अक्टूबर के अंक में एक चित्र दिया गया और बच्चों को कहानी लिखने को कहा गया। देशभर से बच्चों की कई कहानियां मिलीं। चुनिंदा बच्चों की कहानियां परिवार परिशिष्ट के पेज चार पर लगाई गई और शेष यहां दी जा रही हैं। सभी बच्चे कहानियां लिखते रहें। हमारी कोशिश यही है कि वे सीखना और लिखना कभी न छोड़े।

जादुई गुड़िया और अनजान आदमी की मिठाई
अशमीत कौर, 9 वर्ष
दूर पहाड़ों की खूबसूरत वादियों में सरिता नाम की एक लड़की अपनी दादी के साथ रहती थी। सरिता को अपने खिलौने बहुत प्यारे लगते थे, लेकिन अपनी गुड़िया उसे सबसे अधिक प्यारी थी। वह अपनी गुड़िया को अपनी छोटी बहन की तरह रखती थी। उसे सजाती, खाना खिलाती और उसके साथ खूब खेलती थी। एक दिन सरिता अपनी गुड़िया को लेकर पार्क में खेलने गई। खेलते-खेलते दोनों के कपड़े मिट्टी से गंदे हो गए। सरिता ने गुड़िया के कपड़े धोए और उन्हें पास ही सुखाने के लिए डाल दिया। फिर वह अपनी गुड़िया के पास बैठकर खेलने लगी। तभी एक अनजान आदमी वहाँ आया। उसने सरिता को एक कटोरे में बहुत सारी मिठाई दी और बिना कुछ बताए वहाँ से चला गया। सरिता को यह मिठाई बहुत अच्छी लगी, लेकिन उसे यह पता नहीं था कि वह मिठाई कहाँ से आई थी और उसमें क्या मिला हुआ था। सरिता ने उसमें से एक मिठाई अपनी प्यारी गुड़िया को खिला दी। कुछ देर बाद अचानक उसकी गुड़िया हिलने लगी और फिर बोलते हुए सरिता के पास चलकर आई। सरिता यह देखकर दंग रह गई। उसने पूछा, “तुम कौन हो?” गुड़िया बोली, “मैं तुम्हारी दोस्त गुड़िया हूँ।” सरिता अपनी गुड़िया के साथ खेलने लगी, लेकिन तभी अचानक गुड़िया पीछे हटने लगी और देखते ही देखते गायब हो गई। सरिता बहुत घबरा गई। तभी उसे अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने सोचा, “मुझे उस अनजान आदमी से मिठाई लेनी ही नहीं चाहिए थी।” वह तुरंत दादी के पास गई और सारी बात बताई।

मेहनती तनिष्का
तनिष्का खारोल, 8 वर्ष
एक दिन तनिष्का अपनी माँ के साथ घर के काम में मदद कर रही थी। सुबह का समय था। धूप खिली हुई थी और आँगन में कपड़े धोकर रखे गए थे। तनिष्का ने सोचा कि वह भी कुछ काम करेगी। उसने कपड़ों की टोकरी उठाई और एक-एक करके छोटे-छोटे कपड़े रस्सी पर टाँगने लगी। तनिष्का बहुत सावधानी से कपड़े लगा रही थी ताकि वे नीचे न गिरें। पास में उसकी छोटी बहन यतिका भी बैठी थी। ऐसा लग रहा था मानो वह भी गुड़िया का काम देख रही हो। थोड़ी देर में सारे कपड़े रस्सी पर सूखने के लिए टँग गए। माँ ने जब यह देखा तो वे बहुत खुश हुईं। उन्होंने तनिष्का की प्रशंसा करते हुए कहा, “बेटी, जो बच्चे अपने माता-पिता की मदद करते हैं, वे जीवन में हमेशा आगे बढ़ते हैं।” तनिष्का को अपनी माँ की बात बहुत अच्छी लगी। उसने निश्चय किया कि वह रोज़ घर के छोटे-छोटे कामों में सहायता करेगी। उस दिन उसने सीखा कि कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता। मेहनत करने से हमें खुशी मिलती है और परिवार का काम भी आसान हो जाता है। उस दिन से तनिष्का हर दिन अपनी माँ की मदद करने लगी। उसकी मेहनत और अच्छे व्यवहार से घर में सभी खुश रहने लगे। दादी ने उसे समझाया, “बेटी, अनजान व्यक्ति से कभी भी मिठाई या कोई खाने की चीज नहीं लेनी चाहिए।”
सरिता ने अपनी गलती से सीख ली और वादा किया कि वह आगे से कभी किसी अनजान व्यक्ति से कुछ नहीं लेगी।

नन्ही पीहू की ज़िम्मेदारी
सक्षम गुमास्ता, 12 वर्ष
​एक सुंदर से गाँव में नन्ही पीहू अपनी छोटी बहन और माँ के साथ रहती थी। पीहू बहुत ही समझदार और मेहनती लड़की थी। वह हमेशा अपनी माँ के कामों में हाथ बंटाना पसंद करती थी। ​एक दिन सुबह जब मौसम बहुत सुहावना था और धूप खिली हुई थी, पीहू की माँ ने घर के सारे कपड़े धोए। माँ ने धुले हुए कपड़ों को एक बड़ी सी टोकरी में रखा। पीहू ने देखा कि माँ काफी थक गई हैं और उन्हें रसोई का काम भी करना है। पीहू ने तुरंत माँ से कहा, "माँ, आप आराम से रसोई का काम कर लीजिए, कपड़े सुखाने की ज़िम्मेदारी मेरी है।" ​माँ के मुस्कुराकर हाँ कहते ही पीहू टोकरी लेकर आंगन में आ गई। उसने एक-एक करके कपड़ों को रस्सी पर करीने से फैलाना शुरू किया। उसने छोटे-छोटे फ्रॉक और कपड़ों को सुखाने के लिए क्लिप्स की मदद से टांग दिया। वहीं पास में चटाई पर बैठी उसकी छोटी बहन अपने खिलौनों की टोकरी से खेल रही थी और अपनी बड़ी बहन को ध्यान से देख रही थी। पीहू कपड़े सुखाते-सुखाते अपनी छोटी बहन से बातें करती रही और उसका दिल भी बहलाती रही। ​जब सारे कपड़े रस्सी पर सूखने के लिए टंग गए, तब माँ बाहर आईं। पीहू की यह समझदारी और ज़िम्मेदारी देखकर माँ का दिल खुशी से भर गया। ​

गुड़िया के कपड़े
सक्षम तापड़िया, 11 वर्ष
राधा और उसकी छोटी बहन टिया में बहुत प्यार था। टिया की एक प्यारी सी गुड़िया थी, जिसका नाम मिट्ठू था। टिया दिन भर उसी के साथ खेलती रहती थी। एक दिन टिया ने देखा कि मिट्ठू के कपड़े बहुत गंदे हो गए हैं। उसने उदास होकर कहा, "दीदी, मिट्ठू के कपड़े गंदे हो गए, अब वो क्या पहनेगी?" दोनों बहनों ने मिलकर एक छोटी टोकरी में गुड़िया के छोटे-छोटे रंग-बिरंगे कपड़े इकट्ठे किए। आंगन में एक नल के पास बैठकर राधा ने बड़े प्यार से सारे कपड़े धोए। टिया पानी डालने में उसकी मदद कर रही थी। धोने के बाद राधा ने बाहर धूप में एक रस्सी बाँधी। टिया नीचे घास पर अपनी गुड़िया को गोद में लेकर बैठी थी। वो गुड़िया से कह रही थी, "देखो, दीदी तुम्हारे कपड़े कितने साफ धो रही हैं। अब तुम नई जैसी लगोगी।" राधा एक-एक करके छोटे-छोटे फ्रॉक, टोपी और जुराबें रस्सी पर सुखा रही थी। हवा में वे छोटे कपड़े उड़ रहे थे, जैसे कोई रंग-बिरंगा त्यौहार हो। कुछ देर बाद सारे कपड़े सूख गए। टिया ने अपनी गुड़िया को नए साफ कपड़े पहनाए। गुड़िया को देखकर दोनों बहनें खुशी से ताली बजाने लगीं। उस दिन टिया ने सीखा कि अपने खिलौनों का भी वैसे ही ख्याल रखना चाहिए जैसे हम अपना रखते हैं।

मेहनत का फल
गुनगुन पांचाल, 10 वर्ष
एक दिन की बात है। गर्मी का मौसम था। दो बहनें अपने घर के आँगन में खेल रही थीं। उनकी माँ ने घर के काम पूरे करने के बाद कपड़े धोकर रस्सी पर सुखाने के लिए डाल दिए। बड़ी बहन माँ की मदद करने के लिए आगे आई। वह एक-एक करके कपड़े उठाती और रस्सी पर डालती जा रही थी। हवा चल रही थी, इसलिए कपड़े जल्दी सूखने लगे। पास ही एक छोटी मेज पर फलों से भरी टोकरी रखी थी। टोकरी में लाल-लाल सेब और दूसरे फल देखकर दोनों बहनों का मन उन्हें खाने के लिए ललचा रहा था। छोटी बहन नीचे बैठकर अपनी गुड़िया के साथ खेल रही थी। बड़ी बहन कपड़े सुखाने के साथ-साथ अपनी छोटी बहन का भी ध्यान रख रही थी। कुछ देर बाद माँ वहाँ आईं। उन्होंने देखा कि बड़ी बेटी ने बिना कहे घर के काम में उनकी मदद की है। माँ बहुत खुश हुईं। उन्होंने दोनों बेटियों को पास बुलाया और प्यार से समझाया, “बच्चो, हमें हमेशा अपने माता-पिता की मदद करनी चाहिए। घर के छोटे-छोटे काम मिल-जुलकर करने से काम जल्दी पूरा होता है और परिवार में प्रेम भी बढ़ता है।” दोनों बहनों ने माँ की बात ध्यान से सुनी और आगे से हर काम मिलकर करने का वादा किया। माँ ने उन्हें फल दिए और दोनों बहनें खुशी-खुशी फल खाने लगीं।

मेरी ऊन की गुड़िया
लविष्का माली, 9 वर्ष
अनामिका एक बहुत ही शांत समझदार लड़की थी। उसको ऊन से कपड़े बुनना बहुत अच्छा लगता था । वो हर सर्दी में छोटे- छोटे स्वेटर और ऊनी फ्रोक्स बुना करती थी और उन्हें इकट्ठा करती थी ऐसा करते करते एक दिन उसने ऊन की एक प्यारी सी गुड़िया भी बनाई और उसके हाथ में एक ऊन की टोकरी भी बनाई जिसमें वो अपने बहुत से रंग - बिरंगे ऊन रखती थी । एक दिन वो कपड़े सुखा रही थी और सोच रही थी क्यों ना मैने जो अब तक इतनी सारी ऊन की खूबसूरत स्वेटर और फ्रोक्स बनाई है किसी अनाथालय में दे आऊ अभी सर्दिया भी आने वाली है और किसी ज़रूरतमंद को ये चीजें मिले तो कितना अच्छा हो ओर उसने यही किया। सारी स्वेटर और फ्रोक्स अनाथालय में दे दिए । जब वो वहां फ्रोक्स ओर स्वेटर दे रही थी तो उसे लगा कि इन चीजों से कही ज्यादा दूसरी जरूरत भी है। तो उसने अपने इस उन से स्वेटर बुनने के रुझान को देखते हुए इसे ही अपना व्यवसाय बनाया। वो ऑनलाइन वेबसाइट पर अपने हाथ से बने हुए स्वेटर और फ्रोक्स बचने लगी और उसका व्यवसाय अच्छा चलने लगा तो उसकी आमदनी बढ़ी ओर उसने अपनी आमदनी का आधा हिस्सा हमेशा गरीब ओर जरूरतमंद में दिया । इस तरह एक छोटी सी शुरुआत अनामिका के लिए जीवन की नई राह बन गई।

खुशियों की डोर
ग्रंथ सोनी, 8 वर्ष
रविवार की सुनहरी सुबह थी। आँगन में धूप की नन्ही-नन्ही किरणें बिखरी थीं। साँची अपनी माँ के साथ कपड़े सुखाने में लगी थी। माँ कपड़े रस्सी पर डालती जातीं और साँची उन्हें रंग-बिरंगी क्लिपों से टाँगती जाती। पास ही उसकी छोटी बहन सर्वांगी क्लिपों की टोकरी लेकर बैठी थी। मगर उसका मन केवल क्लिपें पकड़ाने में नहीं था। वह हर चीज को ध्यान से देख रही थी। अचानक उसने पूछा, “दीदी, कपड़े सुखाने के लिए रस्सी ही क्यों होती है? क्या कपड़ों की भी कोई अपनी पसंद होती है?” साँची हँस पड़ी। “कपड़ों की पसंद?” “हाँ!” सर्वांगी ने आँखें बड़ी करते हुए कहा, “लाल कपड़ा लाल क्लिप के साथ, नीला कपड़ा नीली क्लिप के साथ… देखो, कितने अच्छे लगेंगे!” माँ भी मुस्कुरा दीं। “अच्छा, तो आज तुम ही तय करो कि कौन-सी क्लिप किस कपड़े को मिलेगी।” सर्वांगी ने टोकरी अपने पास खींच ली। वह एक-एक कपड़े को देखती और बड़े ध्यान से उसकी क्लिप चुनती। “यह लाल क्लिप लाल कुर्ते के लिए… यह पीली क्लिप पीली फ्रॉक के लिए… और यह हरी क्लिप?” वह थोड़ी देर सोचती रही, फिर बोली, “हरी क्लिप उस सफेद कपड़े के लिए! सफेद में हरा बहुत खिलता है।” साँची ने कहा, “अरे वाह! तुम तो रंगों की कलाकार निकलीं।” सर्वांगी खुशी से मुस्कुरा उठी। कुछ देर बाद उसने देखा कि माँ बार-बार एक ही जगह से कपड़े उठाकर रस्सी तक ला रही हैं। उसने तुरंत कहा, “माँ, आप कपड़ों की टोकरी यहीं क्यों नहीं रख लेतीं? तब आपको बार-बार आना-जाना नहीं पड़ेगा।” माँ ने उसकी बात मानी। सचमुच काम और आसान हो गया। साँची ने हैरानी से कहा, “छोटी बहन, दिमाग तो तुम्हारा बड़ा तेज है!” सर्वांगी ने गर्व से कहा, “मैं छोटी हूँ, पर मेरी आँखें तो बड़ी हैं। सब कुछ देख लेती हूँ!” तीनों हँस पड़ीं। अब साँची कपड़े लगाती, माँ उन्हें ठीक करतीं और सर्वांगी कभी सही क्लिप ढूँढ़ती, कभी कपड़ों की टोकरी सही जगह रखती। थोड़ी ही देर में सारा काम पूरा हो गया। माँ ने राहत की साँस लेते हुए कहा, “आज तो मेरा काम बहुत जल्दी पूरा हो गया।” साँची मुस्कुराकर बोली, “क्योंकि आज हम तीनों ने मिलकर काम किया है।” सर्वांगी ने तुरंत कहा, “तो फिर घर का काम भी खेल जैसा है—सब मिलकर करो तो जल्दी खत्म!” तभी हवा का एक प्यारा-सा झोंका आया। रस्सी पर टंगे रंग-बिरंगे कपड़े लहराने लगे। सर्वांगी उन्हें देखकर खिलखिलाई। “दीदी, देखो! कपड़े भी खुश होकर नाच रहे हैं!” साँची ने मुस्कुराकर कहा, “शायद उन्हें पता चल गया है कि आज यह काम हम सबने मिलकर किया है।” माँ ने दोनों बेटियों को अपने पास बुलाया। तीनों कुछ पल चुपचाप लहराते कपड़ों को देखती रहीं। सर्वांगी ने धीरे से पूछा, “माँ, कल फिर हम तीनों साथ काम करेंगे न?” माँ ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “हाँ, क्योंकि साथ किया गया काम सिर्फ काम पूरा नहीं करता… घर को भी थोड़ा और अपना बना देता है।” साँची ने ऊपर देखा। हवा में लहराते कपड़ों के बीच उसे लगा जैसे रंग-बिरंगी क्लिपों ने पूरे परिवार को एक अदृश्य डोर में बाँध दिया हो। उस दिन से कपड़े सुखाने की वह साधारण-सी रस्सी उनके लिए साधारण नहीं रही।

मां की छोटी मददगार
कनिष्का राठौड़, 13 वर्ष
रविवार की सुबह गुनगुनी धूप खिली हुई थी। माँ ने सुबह-सुबह ढेर सारे कपड़े धोकर टोकरी में रखे थे अपनी माँ को थका हुआ देखकर बड़ी बहन रिमझिम ने सोचा कि आज वह माँ की मदद करेगी । रिमझिम ने कपड़े सूखने की टोकरी उठाई और बगीचे में आ गई । वह एक-एक करके कपड़े तार पर सूखने लगी। उसकी छोटी बहन टिंकू यह सब देखकर मुस्कुरा रही थी। टिंकू जमीन पर बैठ गई और टोकरी में रखी चिमटियां ( पीन ) उठाकर रिमझिम को थमने लगी। दोनों बहनों ने खेल-खेल मैं सारे कपड़े तार पर सुखा दिए । जब माँ बाहर आई और सुख कपड़ों को लहराते देखा, तो उनका चेहरा खुशी से खिल उठा। उन्होंने दोनों बच्चियों को प्यार से गले लगा लिया।

छोटी सी मदद
दिव्यवर्धन सिंह इंदा, 13 वर्ष
एक दिन की बात है। गर्मी की छुट्टियाँ चल रही थीं। मिहिर अपनी माँ के साथ घर के आँगन में खेल रहा था। तभी उसकी नजर आँगन में रखी एक टोकरी पर पड़ी। टोकरी में बहुत सारे रंग-बिरंगे कपड़े और एक कागज रखा हुआ था। माँ कपड़े धोकर रस्सी पर सुखा रही थीं। मिहिर ने सोचा कि माँ को अकेले इतना काम करते देखकर उनकी मदद करनी चाहिए। वह तुरंत उनके पास गया और कपड़े टाँगने में उनकी मदद करने लगा। वह कभी लाल फ्रॉक उठाता तो कभी नीली पैंट। कपड़े फैलाते समय उसे बहुत मजा आ रहा था। तभी उसकी नजर पास बैठी एक छोटी बच्ची पर पड़ी। वह बच्ची फूलों का सुंदर गुलदस्ता बना रही थी। मिहिर उसके पास गया और पूछा, “तुम ये फूल किसके लिए बना रही हो?” बच्ची ने मुस्कुराकर कहा, “आज मेरी माँ का जन्मदिन है। मैं उन्हें यह गुलदस्ता देकर खुश करना चाहती हूँ।” मिहिर को उसकी बात बहुत अच्छी लगी। उसने अपनी माँ से कुछ रंगीन रिबन लिए और बच्ची के गुलदस्ते को सजाने में उसकी मदद की। गुलदस्ता और भी सुंदर बन गया। बच्ची खुशी से बोली, “भैया, आपने मेरी बहुत मदद की। अब मेरी माँ जरूर खुश होंगी।”
मिहिर मुस्कुराया और बोला, “दूसरों की मदद करने से हमें भी खुशी मिलती है।” उस दिन मिहिर ने समझा कि खुशी पाने के लिए बड़ी चीजों की जरूरत नहीं होती। छोटी-सी मदद और प्यार भरा व्यवहार भी किसी के चेहरे पर बड़ी मुस्कान ला सकता है।

मिल-जुलकर काम
दीक्षित सुमन, 7 वर्ष
एक दिन रानी अपने घर के आँगन में कपड़े सुखा रही थी। पास ही उसकी छोटी बहन बैठकर अपने खिलौनों से खेल रही थी। तभी वहाँ रानी की सहेली मीना आई। उसने देखा कि रानी अकेले कपड़े सुखा रही है। मीना ने कहा, “रानी, मैं भी तुम्हारी मदद करती हूँ।” दोनों सहेलियाँ मिलकर कपड़े रस्सी पर टाँगने लगीं। छोटी बहन भी अपने खिलौने समेटकर उनके पास आ गई। थोड़ी ही देर में सारे कपड़े अच्छी तरह सूखने के लिए डाल दिए गए। रानी ने मीना को धन्यवाद दिया। दोनों बहुत खुश हुईं और फिर तीनों मिलकर खेलने लगीं।

जादुई गुड़िया
नव्या शर्मा, 9 वर्ष
एक गांव में कुंजल नाम की एक लड़की रहा करती थी वो एक खिलौने की गुड़िया को अपनी दोस्त मानती थी। उसने उस गुड़िया का नाम रानी रखा था। एक दिन कुंजल अपने दोस्तों के साथ खेल मैदान में खेल रही थी। तभी वहां कुछ आदमी आते हैं और वहां माँल बनाने की बात करते हैं तभी कुंजल की दोस्त वीरा कहती है माँल कहां बनेगा? तभी उनमें से एक आदमी बताता है कि इस मैदान मे हम माँल बनाने वाले हैं अब तुम लोग जाओ यहा से, हमें बहुत काम है। तभी सभी बच्चे दुखी होकर अपने घर चले जाते हैं। घर आकर कुंजल अपनी गुड़िया से कहती है काश तुम और मैं मिलकर इस मैदान को बचा पाते। पता नहीं अब हम सब बच्चे कहां खेलेंगे? तभी उसकी नजर कपड़ों में रखी एक चिट्ठी पर पडती है। जिसमें लिखा था कि मैं तुम्हारी दोस्त हूं रानी। मैं एक जादुई गुड़िया हूं, मैं किसी भी चीज को गायब कर सकती हूँ। ये पढकर कुंजल खुश होकर कहती है क्या तुम हमारे खेल के मैदान को बचा सकती हो? तभी जादुई गुड़िया बोलने लगती है पर कैसे? कुंजल उसे अपनी पूरी योजना बता देती है और अपने मित्रों को साथ लेकर खेल के मैदान में पहुंच जाती है। सब बच्चे वहां पर जाकर देखते हैं की वहां पर माँल बनाने का सारा सामान आ चुका है। तभी कुंजल अपनी जादुई गुड़िया को बोलती है कि यहां पर जो भी माँल बनाने का सामान आया हुआ है सबको गायब कर दो। ये सुनते ही जादुई गुड़िया एक-एक करके सारी चीजों को गायब कर देती है। ये देखकर वहां मौजूद सभी आदमी डर कर वहां से चले जाते हैं और मैदान खाली हो जाता है। तभी सभी बच्चे खुश होकर वहां पर खेलने लगते हैं।

छोटी-सी मदद, बड़ा-सा प्यार
स्नेहा आशीष मैथ्यू, 7 साल
सुबह की धूप में स्नेहा आँगन में कपड़े सुखा रही थी। उसकी छोटी बहन नित्या पास बैठी उसे ध्यान से देख रही थी। नित्या ने देखा कि कपड़ों की टोकरी बहुत भारी है। वह उठी और अपनी नन्ही हथेलियों से टोकरी उठाने लगी। स्नेहा मुस्कुराकर बोली, “नित्या, तुम अभी छोटी हो, मैं कर लूँगी।” नित्या ने मासूमियत से कहा, “दीदी, आप रोज़ मेरी इतनी मदद करती हो, आज मैं आपकी मदद करूँगी।” स्नेहा की आँखें नम हो गईं। उसने नित्या को गले लगा लिया। उस छोटे-से आलिंगन में बहन का प्यार, अपनापन और कृतज्ञता सब समा गया। नित्या ने एक-एक कपड़ा स्नेहा को पकड़ाया और दोनों हँसते हुए काम करने लगीं। उस दिन स्नेहा ने समझा कि मदद की कीमत बड़ी चीज़ों से नहीं, बल्कि मन से होती है। नित्या की छोटी-सी कोशिश ने स्नेहा के दिल में एक मीठी याद छोड़ दी।

मदद करना अच्छी बात
सुमित डूकिया, 7 वर्ष
एक गाँव में गुड़िया नाम की प्यारी-सी बच्ची रहती थी। वह अपनी माँ के कामों में हमेशा मदद करती थी। एक दिन गुड़िया आँगन में कपड़े सुखा रही थी। उसने एक-एक करके सारे छोटे कपड़े रस्सी पर अच्छे से फैला दिए। पास ही कपड़ों की टोकरी रखी थी। वहीं उसकी छोटी बहन रानी खिलौनों से खेल रही थी। गुड़िया ने अपनी बहन से कहा, “रानी, खेलना भी जरूरी है, लेकिन घर के छोटे-छोटे कामों में मदद करना भी अच्छी बात है।” रानी ने मुस्कुराकर अपनी बहन की मदद करने का फैसला किया। दोनों बहनों ने मिलकर सारे कपड़े व्यवस्थित किए और फिर साथ बैठकर खेलने लगीं। माँ ने दोनों को देखा तो बहुत खुश हुईं और बोलीं, “जो बच्चे मिल-जुलकर काम करते हैं, वे हमेशा खुश रहते हैं।”

चेहरे पर खुशी
कृतिका, 12 वर्ष
रविवार की सुबह रिया अपनी छोटी बहन गुड़िया के साथ घर के बाहर खेल रही थी। तभी उसकी माँ ने आकर कहा, “रिया, आज गुड़िया के पुराने कपड़े बहुत छोटे हो गए हैं। इन्हें धूप में सुखा दो और जो कपड़े ठीक हैं, उन्हें अलग कर देना।” रिया ने कपड़े टोकरी में रखे और एक-एक करके रस्सी पर सुखाने लगी। गुड़िया भी उसके पास बैठकर कपड़े पकड़ाने लगी। तभी रिया को याद आया कि उसकी पसंदीदा लाल फ्रॉक अब उसे छोटी हो गई है। उसने सोचा कि इसे गुड़िया को दे देना चाहिए। उसने फ्रॉक गुड़िया को पहनाई तो वह खुशी से उछल पड़ी। रिया ने कहा, “अब यह तुम्हारी है।” गुड़िया आईने के सामने जाकर बार-बार अपना कपड़ा देखने लगी। दोनों बहनें बहुत खुश हुईं। माँ ने यह देखा तो मुस्कुराकर कहा, “कपड़े पुराने हो सकते हैं, लेकिन किसी के चेहरे पर खुशी लाने की उनकी कीमत कभी कम नहीं होती।”

गुड़िया की धुलाई
एकांश शर्मा, 8 वर्ष
रितु को गुडियों से खेलना बहुत पसंद था। उसके पास दो छोटी गुडियाँ थीं - पीहू और चिंकी। एक रविवार सुबह रितु ने देखा कि उसकी गुडियों के कपड़े गंदे हो गए हैं। माँ ने कहा, "रितु, अपने कपड़ों की तरह गुड़िया के कपड़े भी साफ रखने चाहिए।" रितु ने तुरंत एक छोटे से टोकरी में पानी लिया और गुड़िया के छोटे-छोटे फ्रॉक, को धोना शुरू किया। उसने अपने छोटे हाथों से कपड़ो को रगड़ा और साफ किया। उसकी छोटी बहन मीनू पास ही बैठी अपनी गुड़िया को खिला रही थी और दीदी को देख रही थी। कपडे धोने के बाद रितु ने उन्हें निचोड़ा और धूप में टांग दिया। एक-एक करके उसने छोटे क्लिप से कपड़ो को तार पर लगाया। हवा में गुड़िया के रंग-बिरंगे कपड़े झूम रहे थे। मीनू ताली बजा कर बोली, "दीदी, गुड़िया अब नहाकर कितनी सुंदर लगेगी!" ऋतु मुस्कुरायी। समझ आया कि अपना औरअपनी चीजों का ख्याल रखना भी एक अच्छी आदत है। शाम तक कपड़े सुख गए और रितु ने गुडियों को नए जैसे साफ कपड़े पहन लिए।

गुड्डी की समझदारी
विनायक शर्मा, 7 वर्ष
गुड्डी 8 साल की प्यारी सी लड़की थी। वह अपनी मम्मी और छोटी बहन चुनमुन के साथ रहती थी। एक दिन सुबह मम्मी ने जल्दी-जल्दी कपड़े धोए, क्योंकि उन्हें बाजार जाना था। मम्मी ने कपड़ों की टोकरी आंगन में रखी और बोली, "गुड्डी, मैं अभी आती हूँ, तुम कपड़ों का ध्यान रखना।" मम्मी के जाते ही गुड्डी ने सोचा, "क्यों न मैं ही कपड़े सुखा दूँ, मम्मी खुश हो जाएंगी।" गुड्डी ने स्टूल पर टोकरी रखी। उसने एक-एक करके लाल फ्रॉक, नीला पजामा और पीली छोटी ड्रेस को तार पर बड़े प्यार से सुखाया। हवा में कपड़े झूम रहे थे। पास में ही उसकी 3 साल की छोटी बहन चुनमुन घास पर बैठी थी। उसके हाथ में टॉफियों भरी कटोरी थी। वह बड़ी उत्सुकता से दीदी को देख रही थी। चुनमुन बोली, "दीदी, मुझे भी काम दो ना!" गुड्डी हंस कर बोली, "तुम यहाँ बैठ कर ये टॉफियाँ खाओ और देखो कि कोई कपड़ा नीचे न गिरे।" दोनों बहनें खुशी-खुशी काम करने लगीं। तभी मम्मी बाजार से वापस आई। आंगन में सूखे हुए कपड़े और दोनों बेटियों को मिल-जुल कर बैठा देख उनकी आँखें भर आईं। मम्मी ने दोनों को गले से लगा लिया और कहा, "तुम दोनों मेरी सबसे अच्छी मददगार हो।"

मदद से भरी टोकरी
सूरज डांगी, 13 साल
रविवार की सुबह धूप बहुत सुहानी खिली थी। छोटी-सी रिया और उसकी बड़ी बहन स्नेहा सुबह से ही खुश थीं, क्योंकि आज वे दोनों मिलकर अपनी माँ की घर के कामों में मदद कर रही थीं। माँ ने सुबह-सुबह कपड़े धोए थे, और अब कपड़े सुखाने की ज़िम्मेदारी रिया और स्नेहा ने अपने कंधों पर ले ली थी।
आँगन में एक लंबी रस्सी बँधी हुई थी। पास में ही एक छोटी मेज़ पर कपड़ों से भरी टोकरी रखी थी। स्नेहा, जो बड़ी थी, रस्सी तक आसानी से पहुँच सकती थी। उसने टोकरी में से एक-एक करके कपड़े निकाले और उन्हें रस्सी पर सुखाने के लिए क्लिप से टाँगने लगी। रिया अभी छोटी थी, इसलिए वह नीचे ज़मीन पर बैठकर टोकरी से कपड़ों के क्लिप निकाल-निकाल कर स्नेहा को दे रही थी। कपड़े सुखाते-सुखाते दोनों बहनें बातें भी कर रही थीं और खेल भी रही थीं। स्नेहा ने जब एक छोटा-सा फ्रॉक सुखाया तो रिया ताली बजाकर मुस्कुरा उठी। रिया का हर काम में हाथ बँटाना स्नेहा को बहुत अच्छा लग रहा था। जब सारे कपड़े रस्सी पर सूखने के लिए टाँग दिए गए, तो दोनों बहनों ने एक-दूसरे को देखकर मुस्कुराहट दी। माँ ने जब आँगन में आकर देखा कि सारा काम इतनी जल्दी और अच्छे से हो गया है, तो उन्होंने दोनों को प्यार से गले लगा लिया। स्नेहा और रिया को समझ आया कि जब हम मिलकर काम करते हैं, तो कोई भी मुश्किल काम आसान और मज़ेदार बन जाता है।

नन्ही पीहू की समझदारी और मां का सुख
सिया वशिष्ट, 6 वर्ष
एक दिन सुबह-सुबह पीहू ने देखा कि उसकी माँ की तबीयत थोड़ी ठीक नहीं है, फिर भी वह घर के कामों में जुटी हुई हैं। पीहू बहुत ही समझदार बच्ची थी। उसने तय किया कि वह आज माँ को पूरी तरह आराम देगी और घर का काम खुद संभालेगी। उसने तुरंत अपनी बैंगनी फ्रॉक के ऊपर काम करने वाला एप्रन बाँधा और कमर कसकर आँगन में आ गई। माँ ने सुबह जो कपड़े धोकर टोकरे में रखे थे, पीहू उन्हें सुखाने के लिए रस्सी के पास पहुँची। स्टूल पर भारी टोकरा रखा था, जिसमें से उसने एक-एक करके कपड़े निकाले। उसने बहुत ही सलीके से लाल फ्रॉक और नीली पैंट को क्लिप की मदद से रस्सी पर टाँगना शुरू कर दिया। पीहू की छोटी बहन नीतू भी अपनी दीदी की समझदारी देख रही थी। वह चुपचाप टोकरे के पास ज़मीन पर बैठ गई और नीचे गिरे कपड़ों को समेटकर पीहू की मदद करने लगी। जब माँ कमरे से बाहर आईं, तो आँगन का यह नज़ारा देख कर दंग रह गईं। उनकी नन्ही पीहू इतनी समझदारी से सारे कपड़े सुखा चुकी थी। माँ की आँखों में खुशी के आँसू आ गए। उन्होंने पीहू को गले से लगा लिया और कहा, "आज तुमने साबित कर दिया कि मेरी बेटी सच में बहुत समझदार हो गई है।" पीहू की इस छोटी सी समझदारी ने माँ का दिल जीत लिया और पूरे घर में खुशियाँ बिखेर दीं।

खुश रहने की कला
धनुष चौधरी, 9 वर्ष
एक दिन रानी अपनी छोटी बहन गुड़िया के साथ आँगन में थी। माँ कपड़े धोकर लाई थीं और रानी उनकी मदद कर रही थी। रानी एक-एक करके कपड़े रस्सी पर डाल रही थी और गुड़िया पास बैठकर कपड़ों की क्लिपों से भरी टोकरी संभाल रही थी। गुड़िया रानी को सही क्लिप देकर उसकी मदद करती थी। दोनों बहनें हँसते हुए काम कर रही थीं। थोड़ी देर में सारे कपड़े रस्सी पर सूखने के लिए लग गए। माँ ने दोनों बेटियों को शाबाशी दी। उन्होंने कहा कि घर के छोटे-छोटे काम में मदद करना अच्छी बात है। रानी और गुड़िया बहुत खुश हुईं। फिर दोनों ने बची हुई क्लिपें इकट्ठी कीं और उन्हें सही जगह रख दिया। उस दिन दोनों ने सीखा कि मिलकर काम करने से काम जल्दी पूरा हो जाता है और परिवार खुश रहता है।

Updated on:
11 Oct 2026 11:11 am
Published on:
11 Oct 2026 11:10 am