मौन की शक्तिनिकुंज यादव, उम्र 12 वर्षसमुद्र किनारे युवा हवासील चंचु अपनी बड़ी योजनाओं का शोर मचा रहा था, जबकि अनुभवी धीर शांत रहकर पानी की हलचल भांप रहा था। चंचु के पूछने पर धीर ने सिखाया कि सफलता शोर मचाने से नहीं, बल्कि धैर्य और अटूट एकाग्रता से मिलती है। यह दृश्य सिखाता है […]
मौन की शक्ति
निकुंज यादव, उम्र 12 वर्ष
समुद्र किनारे युवा हवासील चंचु अपनी बड़ी योजनाओं का शोर मचा रहा था, जबकि अनुभवी धीर शांत रहकर पानी की हलचल भांप रहा था। चंचु के पूछने पर धीर ने सिखाया कि सफलता शोर मचाने से नहीं, बल्कि धैर्य और अटूट एकाग्रता से मिलती है। यह दृश्य सिखाता है कि केवल बड़े सपने देखना पर्याप्त नहीं है, असली उपलब्धि अहंकार त्यागने और सही अवसर की प्रतीक्षा करने से मिलती है। जिस तरह शांत पक्षी ही मछली पर सटीक वार करता है, वैसे ही संयमित व्यक्ति जीवन में जीतता है। चंचु समझ गया कि ऊंची उड़ान के लिए केवल पंख नहीं, बल्कि आंतरिक शांति और संकल्प अनिवार्य हैं।
रामू और शामू की सच्ची मित्रता
हरीश धनाऊ ,उम्र 9 वर्ष
समुद्र तट पर रहने वाले दो बगुले, रामू और शामू, गहरे मित्र थे। एक दिन शामू घायल हो गया और उसका उड़ना असंभव हो गया। संकट की इस घड़ी में रामू ने अपनी दोस्ती का धर्म निभाया, उसने न केवल शामू को भोजन और पानी दिया, बल्कि हर पल उसके साथ रहकर उसकी देखभाल की। शामू के स्वस्थ होने पर जब उसने आभार जताते हुए खुद को रामू का कर्जदार बताया, तो रामू ने बड़ी सादगी से कहा, मित्रता में कर्ज नहीं, केवल साथ और सहयोग होता है। यह अनुभव उनकी दोस्ती को और भी अटूट बना गया। यह कहानी सिखाती है कि निस्वार्थ सेवा ही सच्ची मित्रता की नींव है।
सुनहरी मछली या पुराना जूता
रिद्धिमा , उम्र 12 वर्ष
राजू और श्याम दो बगुले दोस्त थे। राजू नटखट था, जबकि श्याम शांत स्वभाव का। एक दिन नदी के खंभों पर धूप सेंकते हुए राजू ने मज़ाक में कहा, देखो श्याम! अभी-अभी एक जादुई सुनहरी मछली मेरे मुंह के पास से गुजरी। भोला श्याम सोच में पड़ गया। तभी उसे पानी में कुछ चमकता हुआ दिखा। उसने उत्साहित होकर कहा, राजू, देखो वह जादुई मछली वहीं है। राजू हंसकर बोला, अरे मूर्ख वह मछली नहीं, सूरज की किरणों का प्रतिबिंब है पर श्याम नहीं माना और दोनों में बहस होने लगी। अपनी बात सच साबित करने के लिए श्याम ने झट से पानी में चोंच मारी। जब उसने वह सुनहरी चीज़ बाहर निकाली, तो राजू लोट-पोट होकर हंसने लगा। वह कोई जादुई मछली नहीं, बल्कि एक पुराना पीला जूता था।
सच्ची मित्रता और सूझबूझ
नाम ध्रुव ,उम्र 12 साल
एक बार रमेश और राज नाम के दो बगुले झील के ऊपर से उड़ रहे थे। थक जाने पर वे दोनों किनारे के पत्थरों पर आराम करने बैठ गए। तभी एक शिकारी की नज़र सुंदर रमेश पर पड़ी और उसने उस पर जाल फेंकने की कोशिश की। खतरा भांपकर राज ने तुरंत रमेश को धक्का दे दिया, जिससे वह पानी में गिरकर बच गया। शिकारी ने हार नहीं मानी और राज को जाल में फंसा लिया। तभी रमेश पानी से उड़कर आया और अपनी चोंच में भरा कीचड़ शिकारी की आंखों पर फेंक दिया। शिकारी अंधा हो गया और इस बीच राज जाल काटकर बाहर निकल आया। दोनों सुरक्षित उड़ गए और एक-दूसरे की जान बचाने के लिए शुक्रिया अदा किया।
सच्ची मित्रता
दिवांशु बिजारणियां ,उम्र 11 साल
एक किसान के खेत में एक बतख रोज आकर फसल को नुकसान पहुंचाती थी। किसान ने कई बार उसे भगाया, लेकिन वह नहीं मानी। अंत में तंग आकर किसान ने उसे पकड़ लिया और एक मजबूत रस्सी से बांध दिया। असहाय बतख अपनी जान बचाने के लिए ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाई। उसकी पुकार सुनकर उसकी सहेली बतख तुरंत वहां पहुंची। उसने अपनी चोंच से रस्सी के बंधन को काटकर अपनी मित्र को मुक्त कर दिया। किसान के आने से पहले ही दोनों सहेलियां खुशी-खुशी आसमान में उड़ गईं। इस घटना ने साबित कर दिया कि सच्चा मित्र वही है जो विपत्ति में साथ दे।
बंदरगाह की अनोखी दोस्ती
आर्या भंडारी , उम्र 12 वर्ष
समुद्र किनारे मीनू और पीनू नाम के दो पेलिकन रहते थे। चंचल मीनू अक्सर अपनी बहादुरी की बातें करता, जबकि शांत पीनू उसे धैर्य से सुनता। एक शाम मीनू ने समुद्र पार जाने की इच्छा जताई, जिस पर पीनू ने उसे अपनों के साथ रहने का सुख समझाया। तभी मीनू की चोंच में मछली फंसने से वह घबरा गया, पर पीनू ने हंसते हुए उसकी मदद की। दोनों ने सीखा कि आपसी सहयोग और साथ ही जीवन की असली खूबसूरती है।
हिम्मत का सहारा
रचित गुप्ता , उम्र 12 वर्ष
समुद्र के किनारे दो पेलिकन रहते थे मोती और चीकू। एक दिन अचानक तेज़ तूफ़ान आ गया और समुद्र में ऊंची-ऊंची लहरें उठने लगीं। दोनों सुरक्षित स्थान पर उड़कर जाना चाहते थे, लेकिन हवा का वेग इतना तेज़ था कि उड़ना असंभव था। मोती ने सूझबूझ दिखाई और पास ही में लगे एक मज़बूत खंभे पर जा बैठा। दूसरी ओर, चीकू एक छोटे से पत्थर पर खड़ा था। धीरे-धीरे पानी का स्तर बढ़ने लगा और पत्थर डूबने लगा। चीकू घबराकर चिल्लाया, मोती, अब क्या होगा? मैं तो डूब जाऊंगा। मोती ने धैर्य से उत्तर दिया, डरो मत दोस्त, बस सही समय का इंतज़ार करो और अपनी पकड़ मज़बूत रखो। थोड़ी देर बाद हवा की रफ्तार कम हुई। चीकू ने अपनी पूरी हिम्मत जुटाई और एक लंबी उड़ान भरकर मोती के पास खंभे पर पहुंच गया। कुछ ही देर में तूफ़ान पूरी तरह शांत हो गया और दोनों सुरक्षित थे। चीकू ने राहत की सांस ली और कहा, आज मैंने सीखा कि मुसीबत के समय घबराने के बजाय धैर्य से काम लेना चाहिए।
घमंड का परिणाम
जितेंद्र निंबल , उम्र 8 वर्ष
एक विशाल तालाब के किनारे दो बगुले रहते थे। दोनों पक्के मित्र थे, लेकिन उनमें से एक बगुला अत्यंत घमंडी था। उसे अपने लंबे पंखों और ऊंची उड़ान पर बहुत नाज़ था। इसके विपरीत, दूसरा बगुला बहुत ही शांत और समझदार था। एक बार भीषण गर्मी के कारण तालाब का पानी सूखने लगा। समझदार बगुले ने चिंतित होकर कहा, मित्र, पानी कम हो रहा है, हमें समय रहते किसी सुरक्षित स्थान की खोज करनी चाहिए। लेकिन घमंडी बगुले ने उसकी बात अनसुनी कर दी और अहंकार में बोला, मुझे किसी की सलाह या मदद की ज़रूरत नहीं है, मैं अपनी देखभाल खुद कर सकता हूं। धीरे-धीरे तालाब पूरी तरह सूख गया और मछलियां खत्म हो गईं। भूख से बेहाल होकर दोनों पास के एक गांव की ओर उड़े। वहां उन्हें अनाज से भरी एक टोकरी दिखाई दी। घमंडी बगुला बिना सोचे-समझे तुरंत उस पर जा बैठा, लेकिन तभी टोकरी पलट गई और उसका पैर उसमें फंस गया। वह जितना निकलने की कोशिश करता, उतना ही उलझता जाता। यह देख समझदार बगुले ने अपनी सूझ-बूझ दिखाई और पास पड़ी एक रस्सी को अपनी चोंच से खींचकर टोकरी को सहारा दिया, जिससे उसके मित्र का पैर आज़ाद हो गया। घमंडी बगुला बुरी तरह डर गया था। उसे अपनी गलती का एहसास हुआ और उसने हाथ जोड़कर मित्र से क्षमा मांगी। उसने कहा, आज मुझे समझ आया कि घमंड हमेशा नुकसान पहुंचाता है और संकट में एक सच्चा मित्र ही सबसे बड़ी ढाल होता है।
घमंडी और बुद्धिमान पेलिकन
पीयूष मीणा , उम्र 12 साल
एक झील के किनारे नीलू और पीलू नाम के दो पेलिकन रहते थे। पीलू को अपने शिकार कौशल पर बहुत घमंड था, जबकि नीलू धैर्यवान था। एक दिन पीलू बड़ी मछली के लालच में अपनी चोंच फैलाकर घंटों खंभे पर बैठा रहा, जिससे उसकी गर्दन थक गई पर हाथ कुछ न लगा। वहीं नीलू ने एकाग्रता से सही समय का इंतज़ार किया और छोटी-छोटी मछलियों से अपना पेट भर लिया। अंत में, खाली हाथ और थके हुए पीलू को अपनी भूल का अहसास हुआ। नीलू ने उसे समझाया कि शिकार के लिए दिखावा नहीं, बल्कि सही समय पर सटीक वार जरूरी है।
सच्ची मित्रता
ऋतिका न्याती ,उम्र- 8 वर्ष
एक सरोवर के किनारे ऊंची चट्टान पर दो पक्षी रहते थे। उनमें अटूट मित्रता थी। वे साथ में उड़ते, भोजन खोजते और सूर्यास्त होने पर अपने ठिकाने पर लौट आते। एक दिन अचानक मौसम ने करवट ली। काले बादल छा गए और भीषण तूफान के साथ सरोवर की लहरें उफान मारने लगीं। एक पक्षी चट्टान पर सुरक्षित था, किंतु दूसरा पास पड़ी एक लकड़ी पर बैठा था। तेज़ हवा के झोंकों से लकड़ी डगमगाने लगी, जिससे वह पक्षी घबरा गया और उसने अपने मित्र को पुकारा। दूसरा पक्षी बिना अपनी जान की परवाह किए तुरंत उड़कर उसके पास पहुंचा और बोला, “घबराओ मत प्रिय मित्र, मैं तुम्हारे साथ हूं। दोनों ने एक-दूसरे को सहारा दिया और संतुलन बनाए रखा। जब तूफान शांत हुआ, तो दोनों सुरक्षित थे। उस दिन उन्होंने यह गहराई से समझा कि सच्ची मित्रता की पहचान संकट के समय ही होती है।
बातूनी कछुआ और दो हंस
जीविका , उम्र 8 वर्ष
एक सूखते तालाब को देख दो हंसों ने अपने मित्र कछुए को सुरक्षित स्थान पर ले जाने की योजना बनाई। उन्होंने एक लकड़ी ली और कछुए को उसे बीच से पकड़ने को कहा, जबकि हंसों ने लकड़ी के सिरों को अपनी चोंच में थाम लिया। हंसों ने चेतावनी दी कि उड़ते समय वह अपना मुंह न खोले। जैसे ही वे आसमान में उड़े, नीचे लोगों का शोर सुनकर अपनी आदत से मजबूर कछुआ बोल पड़ा। मुंह खोलते ही लकड़ी छूट गई और वह सीधे जमीन पर गिरकर अपनी जान गंवा बैठा।
समझदारी की उड़ान
अदम्य चतुर्वेदी , उम्र 7 वर्ष
एक समय की बात है, राम और श्याम नाम के दो बगुले आसमान में ऊंची उड़ान भर रहे थे। वे बहुत दूर से उड़कर आ रहे थे और अब उनके पंख बुरी तरह थक चुके थे। तभी उन्हें नीचे एक अत्यंत सुंदर और नीले पानी की झील दिखाई दी। थकान से चूर राम बोला, भाई, अब मुझसे और नहीं उड़ा जा रहा, मुझे आराम चाहिए। राम ने सावधानी से नीचे देखते हुए कहा, भाई, झील तो सुंदर है पर यह बहुत गहरी लग रही है। सीधे पानी में उतरना खतरनाक हो सकता है। तभी श्याम को एक उपाय सूझा। उसने उत्साह से कहा, “क्यों न हम किनारे से पत्थर लाकर पानी में डालें? जब पत्थरों का ढेर ऊपर दिखने लगेगा, तब हम उन पर बैठकर आराम कर सकेंगे। राम को यह विचार पसंद आया। दोनों ने मेहनत की और छोटे-छोटे पत्थर झील के किनारे एक जगह जमा किए। धीरे-धीरे पत्थर पानी के ऊपर दिखने लगे। राम और श्याम उन पत्थरों पर बैठ गए। ठंडी हवा और पानी की कल-कल आवाज ने उनकी सारी थकान मिटा दी। कुछ देर आराम करने के बाद, जब उन्होंने दोबारा उड़ान भरी, तो राम गर्व से बोला, भाई, आज तुम्हारी समझदारी ने हमें डूबने से बचा लिया। श्याम मुस्कुराया और दोनों खुशी-खुशी अपनी मंजिल की ओर उड़ चले।
प्रकृति की दयालुता
कृशिव ,उम्र 12 वर्ष
बहुत समय पहले की बात है, बत्तखों का एक झुंड एक अत्यंत सुंदर झील के किनारे रहता था। उस झील के चारों ओर का प्राकृतिक सौंदर्य अद्भुत था। पानी इतना स्वच्छ और पारदर्शी था कि कांच की तरह झील की तलहटी साफ़ दिखाई देती थी। बत्तख हर रोज़ झील के शीतल जल में विहार करते और आनंद से खेलते थे। एक दिन कुछ इंसानों की नज़र उस खूबसूरत जगह पर पड़ी। वे झील की सुंदरता देखकर अचंभित रह गए। धीरे-धीरे यह बात अन्य लोगों तक भी पहुंची और उस पावन परिवेश से अभिभूत होकर लोगों ने वहां बसना शुरू कर दिया। देखते ही देखते वहां एक शहर बस गया। मनुष्य स्वभाव से थोड़ा स्वार्थी होता है। अपनी सुख-सुविधाओं के लिए उन्होंने एक-एक कर पेड़ों को काटना शुरू कर दिया। कुछ ही समय में हरे-भरे जंगल ठूंठ में बदल गए। पेड़ों के कटने से पर्यावरण का संतुलन बिगड़ गया, झील सूखने लगी और उसका पानी दूषित हो गया। स्वच्छ वातावरण में रहने वाले बत्तख अब बीमार होकर मरने लगे। बत्तखों के मुखिया ने स्थिति की गंभीरता को देखते हुए सभी को एकत्रित किया और कहा, "यह झील हमारे पूर्वजों की धरोहर और हमारे लिए पवित्र है। हम अपनी इस जन्मभूमि को ऐसे नष्ट नहीं होने देंगे। सभी बत्तखों ने मुखिया की बात का समर्थन किया। मुखिया की सलाह पर, सभी बत्तखों ने एक साथ मिलकर प्रकृति से 'जल प्रार्थना' करना शुरू किया। बत्तखों की निस्वार्थ और करुण प्रार्थना ने प्रकृति के हृदय को झकझोर दिया। देखते ही देखते आसमान बादलों से घिर गया और ऐसी मूसलाधार वर्षा हुई कि झील फिर से पानी से लबालब भर गई। चारों ओर हरियाली वापस लौटने लगी। यह चमत्कार देख बत्तखों की ख़ुशी का ठिकाना न रहा और वे श्रद्धापूर्वक प्रकृति का धन्यवाद करने लगे।