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गोल घेरे में कहानियों की पाठशाला चित्र देखो कहानी लिखो प्रतियोगिता—94

कहानियों के माध्यम से बच्चों को अच्छे संस्कार और हिम्मत से सपने साकार करने की सीख देती यह एक सुंदर रचना है। इसमें बताया गया है कि सही मार्गदर्शन से बच्चों में मदद, सत्य और सकारात्मकता जैसे गुण जगाए जा सकते हैं।
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Sep 08, 2026
गोल घेरे में कहानियों की पाठशाला
गोल घेरे में कहानियों की पाठशाला

बच्चों, कहानियां सुनने में जितना मजा आता है, उससे कई ज्यादा सुनाने में। कहानियां सुनाना भी खास तरह की प्रतिभा है। कहानियां वही सुना सकता है, जिसकी कल्पनाशीलता विस्तृत होती है। कल्पना भी इतनी हो कि कहानी रोचक बन पाए। आप भी इस रोचक प्रतिभा को अर्जित करना चाहते हैं तो कहानी कहना सीखना होगा। कहानी कहने की इसी प्रतिभा पर परिवार परिशिष्ट के 02 सितंबर के अंक में एक चित्र दिया गया और बच्चों को कहानी लिखने को कहा गया। देशभर से बच्चों की कई कहानियां मिलीं। चुनिंदा बच्चों की कहानियां परिवार परिशिष्ट के पेज चार पर लगाई गई और शेष यहां दी जा रही हैं। सभी बच्चे कहानियां लिखते रहें। हमारी कोशिश यही है कि वे सीखना और लिखना कभी न छोड़े।

राजा के अच्छे संस्कारों का पाठ
ईवांशी वर्मा, 8 वर्ष

हमारे छोटे से विद्यालय में एक बहुत प्यारी शिक्षिका प्रिया हैं। उन्हें बच्चों से बहुत प्यार है। एक दिन सभी बच्चो को कक्षा में गोल घेरे में बैठ गए। शिक्षिका भी उनके बीच बैठीं और बोलीं— आज मैं तुम्हें एक कहानी सुनाऊंगी। सभी बच्चे खुशी से उनकी ओर देखने लगे। कोई मुस्कुरा रहा था, तो कोई उत्सुकता से कहानी सुनने के लिए आगे झुक गया। शिक्षिका ने कहानी शुरू की। कहानी एक ऐसे छोटे बच्चे राजा की थी, जो हमेशा दूसरों की सहायता करता था और सभी से प्रेमपूर्वक बात करता था। कहानी सुनाते हुए शिक्षिका ने बच्चों से पूछा— बच्चों, हमें अपने जीवन में क्या करना चाहिए? एक बच्चे ने कहा— हमें सभी की मदद करनी चाहिए। दूसरी बच्ची बोली— हमें अपने दोस्तों से प्यार करना चाहिए। शिक्षिका मुस्कुराईं और बोलीं— बिल्कुल सही। हमें हमेशा सत्य बोलना चाहिए, बड़ों का सम्मान करना चाहिए और जरूरतमंद लोगों की सहायता करनी चाहिए। सभी बच्चों ने अच्छे संस्कार अपनाने का वचन दिया। कहानी समाप्त होने पर सभी बच्चों ने तालियां बजाईं। उस दिन बच्चों ने केवल एक कहानी ही नहीं सुनी, बल्कि प्यार, मित्रता, सहायता और अच्छे संस्कारों का महत्वपूर्ण पाठ भी सीखा।

जादुई घेरा और सपनों की बात
सिद्धांत पटेल, 13 वर्ष
उड़ान गांव के उस छोटे से सरकारी स्कूल के कमरे में रोशनी की एक पतली सी किरण खिड़की से सीधे ज़मीन पर बिछी चटाई पर आ रही थी। वह कमरा सिर्फ दीवारों से नहीं, बल्कि बच्चों के सपनों से गढ़ा गया था। रोज़ दोपहर को जब मीनू दीदी ज़मीन पर पालथी मारकर बैठतीं, तो उनके आस-पास एक जादुई घेरा बन जाता था। इस घेरे में चिंटू, मीनू, राजू, गोलू और छोटी पिंकी अपने सारे दुःख-दर्द भूलकर बैठ जाते थे। आज मीनू दीदी की आंखों में एक अनोखी चमक थी। उन्होंने अपनी उंगली हवा में उठाई और कहा, "बच्चों, आज मैं तुम्हें एक ऐसे पंछी की कहानी सुनाऊंगी, जिसके पास पंख नहीं थे, लेकिन उसके पास उड़ने की ज़िद थी।" कमरे में एकदम सन्नाटा छा गया। किताबों की अलमारी और शांत खड़ा ब्लैकबोर्ड भी जैसे सांस रोककर दीदी की बात सुनने लगे।दीदी ने बताया कि कैसे उस नन्हे पंछी ने अपनी हिम्मत और मेहनत से आसमान की सबसे ऊंची सीख को छू लिया। कहानी सुनते-सुनते राजू की आंखों में चमक आ गई और पिंकी के होठों पर एक प्यारी सी मुस्कान तैर गई। मीनू दीदी सिर्फ़ कहानियां नहीं सुनाती थीं, बल्कि हर बच्चे के अंदर छिपे एक नए इंसान को जगाती थीं। वह सिखाती थीं कि दुनिया में चाहे कितनी भी मुश्किलें आ जाएं, अगर तुम्हारे इरादे नेक हैं, तो तुम कुछ भी हासिल कर सकते हो। वह जादुई घेरा केवल एक कक्षा नहीं था, वह एक ऐसी जगह थी जहां भविष्य के डॉक्टर, इंजीनियर और अच्छे इंसान तैयार हो रहे थे। जब कहानी खत्म हुई, तो बच्चों की तालियों की गड़गड़ाहट से वह पूरा कमरा गूंज उठा।

मीनू दीदी की जादुई चटाई
पीहू राठौड़, 9 वर्ष
सुंदरपुर गांव के सरकारी स्कूल में एक छोटी सी लाइब्रेरी थी। वहाँ एक बड़ी ही प्यारी, बैंगनी रंग की गोल चटाई बिछी थी। स्कूल के बच्चे उसे 'जादुई चटाई' कहते थे, क्योंकि जब भी मीनू दीदी उस पर बैठती थीं, तो किताबों के पन्ने अपने आप जादुई कहानियों में बदल जाते थे। एक दिन शनिवार की दोपहर, रोहन, अली, रिया, समीर, पिंकी और छोटू दौड़ते हुए लाइब्रेरी पहुंचे। मीनू दीदी ने मुस्कुराकर उन्हें गोल घेरे में बिठाया। दीदी ने ब्लैकबोर्ड की तरफ इशारा करते हुए पूछा, "बच्चों, आज हम कौन सी सैर पर चलें? जंगल की सैर या आसमान की?" छोटू ने हाथ उठाकर कहा, "दीदी, आसमान की सैर!"मीनू दीदी ने अपनी आंखें बंद कीं और एक अनोखी कहानी सुनानी शुरू की। उन्होंने बताया कि कैसे एक छोटा सा बादल का टुकड़ा, जिसका नाम 'चीकू' था, हवा के साथ पूरी दुनिया की सैर करता था। चीकू जब भी किसी सूखे खेत को देखता, वहाँ बरस जाता और किसान खुश हो जाते। वह पहाड़ों से टकराता तो उसे नए दोस्त मिलते।कहानी सुनते-सुनते सभी बच्चे इतने खो गए कि उन्हें लगा वे सच में बादलों के बीच उड़ रहे हैं। रिया और समीर तो खुशी से ताली बजाने लगे।कहानी खत्म होने पर मीनू दीदी ने कहा, "बच्चों, जैसे चीकू बादल ने बरसकर दूसरों की मदद की, वैसे ही हमें भी हमेशा दूसरों के काम आना चाहिए। यही सबसे बड़ी खुशी है।"सभी बच्चों ने हामी भरी और तय किया कि वे भी चीकू बादल की तरह हर दिन किसी न किसी की मदद ज़रूर करेंगे। उस दिन के बाद से, वह जादुई चटाई बच्चों के लिए सिर्फ कहानी सुनने की जगह नहीं, बल्कि अच्छी बातें सीखने का एक जरिया बन गई।

चलो खेल के साथ पढ़ाई करें
दक्ष कुमावत, 10 वर्ष
एक बार की बात है, एक शहर में राजीव, समीर, राजन और भार्गव अपनी बहनों के साथ खुशी-खुशी रहते थे। उनकी एक बहन का नाम प्रिया और दूसरी का नाम खुशी था। उन सभी को आपस में साथ खेलना बहुत पसंद था। उनके पास अपना कोई घर नहीं था, बल्कि वे एक अनाथ आश्रम में रहते थे जो उन्हें बिल्कुल घर जैसा ही लगता था। परंतु, उन बच्चों को पढ़ाई करना बिल्कुल भी पसंद नहीं था। वहां उनकी देखरेख करने वाली मां का नाम शुभा और पिता का नाम शुभम था। शुभा ने बच्चों के पढ़ाई न करने की बात पिताजी (शुभम) को बताई और उनसे इस समस्या का कोई समाधान निकालने को कहा। शुभम ने इस बारे में पूरे दिन अपने ऑफिस में सोच-विचार किया। जब वे घर लौटे, तो माताजी ने पूछा, "क्या कोई समाधान मिला?" शुभम पहले तो बहुत चिंतित दिखे, फिर उन्होंने कहा, "हां, मुझे समाधान मिल गया है।" मां उत्सुकता से बोल पड़ीं, "क्या! तो आखिर आपने उपाय निकाल ही लिया! अब जल्दी से बताइए कि आखिर वह समाधान है क्या?"राजीव और समीर बच्चों में सबसे बड़े थे, इसलिए पिता इस समस्या के समाधान के रूप में उन दोनों को ही बाकी बच्चों को साथ में खिलाने और पढ़ाने का दायित्व सौंपना चाहते थे। परंतु, माँ ने वह दायित्व खुद अपने हाथों में ले लिया। अगली सुबह माताजी ने जैसे ही खेलने की बात कही, सभी बच्चे तुरंत उनके सामने आकर बैठ गए। माताजी ने खेल-खेल में ही सभी बच्चों को बड़ी आसानी से पढ़ा दिया। इसके बाद वे सभी बच्चे बेहद खुश रहने लगे।

हमारी प्यारी पाठशाला
महीपाल सिंह राजपुरोहित, 8 वर्ष
एक दिन की बात है। कक्षा में बच्चे गोल घेरा बनाकर बैठे थे। सामने उनकी शिक्षिका मीरा मैडम बैठी थीं। सभी बच्चे बड़े ध्यान से उनकी बात सुन रहे थे। मैडम ने मुस्कुराकर पूछा,“बच्चो! बताओ, हमें विद्यालय आना क्यों अच्छा लगता है?” राजवीर बोला, “क्योंकि यहां हमें नई-नई बातें सीखने को मिलती हैं। नंदनी ने कहा, “मुझे तो दोस्तों के साथ पढ़ना और खेलना अच्छा लगता है।” तभी शिवराज बोला, “मैडम! मुझे सबसे अच्छा तब लगता है, जब आप कहानी सुनाती हैं।” सब बच्चे हंस पड़े। मैडम ने कहा, “बहुत खूब! लेकिन विद्यालय केवल पढ़ने की जगह नहीं है। यहां हम मिल-जुलकर रहना, एक-दूसरे की मदद करना और अच्छी आदतें भी सीखते हैं।” इतने में खिड़की से तेज हवा आई और मेज पर रखी कुछ किताबें नीचे गिर गईं। बच्चे तुरंत उठे और सभी किताबें मिलकर व्यवस्थित कर दीं। मैडम ने बच्चों की ओर देखकर कहा, “देखा! यही है सच्ची शिक्षा—जो सीखें, उसे अपने व्यवहार में भी उतारें।” सभी बच्चों ने एक साथ कहा,
“हम रोज कुछ नया सीखेंगे और सबकी मदद करेंगे!” मैडम मुस्कुराईं। कक्षा तालियों से गूंज उठी।

जीत से ज्यादा मेहनत महत्वपूर्ण
मोहित चौधरी, 10 वर्ष
एक दिन स्कूल की शिक्षिका ने बच्चों को एक कहानी सुनाई। उन्होंने कहा, “बच्चों, आज हम ऐसी कहानी सुनेंगे, जिसमें जीत से ज्यादा महत्वपूर्ण मेहनत और दूसरों की मदद करना है।” कक्षा में सभी बच्चे ध्यान से बैठ गए। शिक्षिका ने कहानी शुरू की—एक छोटे से गाँव में आरव नाम का लड़का रहता था। वह पढ़ाई में बहुत अच्छा था और हमेशा कक्षा में सबसे ऊपर आने की कोशिश करता था। उसे अपनी सफलता पर बहुत गर्व था। एक दिन स्कूल में परीक्षा हुई। आरव ने बहुत मेहनत की और अच्छे अंक प्राप्त किए। लेकिन उसी परीक्षा में उसके मित्र मोहन के अंक कम आए। मोहन बहुत उदास था। वह पढ़ाई में कमजोर था और उसे कठिन सवाल समझने में परेशानी होती थी।
आरव ने पहले सोचा कि वह अपनी जीत का आनंद अकेले मनाए, लेकिन फिर उसने मोहन की उदासी देखी। उसने मोहन से कहा, “अगर तुम चाहो तो मैं रोज तुम्हें पढ़ने में मदद कर सकता हूं।” अगले दिन से दोनों साथ पढ़ने लगे। आरव ने मोहन को कठिन सवाल सरल तरीके से समझाए। कुछ महीनों बाद फिर परीक्षा हुई। इस बार मोहन ने बहुत अच्छे अंक प्राप्त किए। मोहन की खुशी देखकर आरव को भी बहुत खुशी हुई। शिक्षिका ने दोनों को शाबाशी देते हुए कहा, “सच्ची खुशी केवल सबसे ऊपर आने में नहीं, बल्कि किसी को ऊपर उठाने में है।” उस दिन आरव समझ गया कि दूसरों की मदद करके मिली सफलता ही सबसे बड़ी सफलता होती है।

एक बड़ी सीख
अनिका बर्णवाल, 11 वर्ष
गर्मियों की छुट्टियों के बाद सभी बच्चे स्कूल जाने के लिए उत्सुक्त थे।सुबह सुबह सभी बच्चे वक्त से विद्यालय पही गए। बच्चों का पहला दिन था इसलिए सभी बच्चे घर के कपड़े पहन के आये थे। अध्यापिका सभी बच्चों को देखकर बहुत खुश हुई। सभी ने अपनी अध्यापिका को देख कर अभिवादन किया। उन्होंने टीचर से एक कहानी सुनने की ज़िद की। बच्चों के इतना बोलने पर टीचर ने उन्हें एक ऐसी कहानी सुनाई कि सभी बच्चे खुश हो गए। उन्होंने टीचर को अलविदा कहके घर गए सभी आज बहुत खुश थे।

उत्साही बच्चों की कक्षा
जिज्ञासा बारिया, 7 वर्ष
एक बार की बात है, एक प्राथमिक विद्यालय में मीनू नाम की एक बहुत ही प्यारी और दयालु अध्यापिका थीं। उन्हें बच्चों को नई-नई कहानियाँ सुनाना और उनके साथ समय बिताना बहुत पसंद था। एक दिन, मीनू जी ने अपनी कक्षा के बच्चों के लिए कुछ अलग करने का सोचा। उन्होंने कक्षा के बीच में एक बड़ा और सुंदर गोल कालीन बिछाया। उन्होंने सभी बच्चों—अमित, राहुल, टीना, सोनू और रिया को उस कालीन पर एक घेरा (सर्कल) बनाकर बैठने के लिए कहा।जब सभी बच्चे आराम से बैठ गए, तो मीनू जी भी उनके सामने बैठ गईं। उन्होंने अपनी उंगली उठाकर मुस्कुराते हुए कहा, "बच्चों, आज हम किताबों से नहीं, बल्कि अपनी कल्पना से एक नई कहानी बनाएंगे!" यह सुनकर सभी बच्चे बहुत खुश और उत्साहित हो गए।मीनू जी ने कहानी की शुरुआत की, "एक घने जंगल में एक छोटा और समझदार खरगोश रहता था..." इसके बाद उन्होंने एक-एक करके सभी बच्चों को कहानी में अपनी तरफ से एक-एक वाक्य जोड़ने के लिए कहा।राहुल ने कहा कि खरगोश को एक जादुई गाजर मिली, तो टीना ने जोड़ा कि उस गाजर को खाते ही खरगोश हवा में उड़ने लगा। सभी बच्चे अपनी-अपनी कल्पना से कहानी को आगे बढ़ा रहे थे और खूब हंस रहे थे।

ज्ञान का अनोखा खेल
गौरव जांगिड़, 10 वर्ष
एक दिन मीनू मैडम ने अपनी कक्षा के बच्चों के लिए कुछ अलग करने का सोचा। उन्होंने रोज़ की तरह कुर्सियों पर बैठने के बजाय सभी बच्चों को ज़मीन पर एक गोल घेरा बनाकर बैठने को कहा। चिंटू, राहुल, मीना, सोनू और रीना बहुत खुश होकर मैडम के चारों तरफ बैठ गए।मीनू मैडम ने मुस्कुराते हुए कहा, "बच्चों, आज हम किताबों से नहीं, बल्कि एक खेल से सीखेंगे। इस खेल का नाम है 'कहानी बुनो'।" उन्होंने एक-एक करके बच्चों से बात करना शुरू किया। मैडम ने अपनी उंगली से इशारा करते हुए चिंटू से पूछा कि अगर उसे जंगल में एक जादुई पेड़ मिले, तो वह उससे क्या मांगेगा? चिंटू सोच में पड़ गया और बाकी सभी बच्चे उत्सुकता से मैडम की बात सुनने लगे।मैडम ने बच्चों को समझाया कि पढ़ना और सीखना केवल परीक्षा पास करने के लिए नहीं, बल्कि अपनी सोच को बड़ा बनाने के लिए है। बच्चों को यह नया तरीका बहुत पसंद आया। सबने मिलकर एक बहुत ही मजेदार कहानी बनाई। उस दिन बच्चों ने जाना कि मिलकर सीखने में कितना आनंद आता है।

मोबाइल का असर
त्रिशा संचेती, 7 वर्ष
त्रिश, कृति, विवान, कियान, अनय, वियान सभी बच्चे एक ही मोहल्ले में रहते थे और एक ही स्कूल पढ़ने जाते थे। वैसे तो सभी बच्चे अनुशासन से रहते थे, लेकिन कृति, कियान और अनय अपने माता-पिता के लाड की वजह से गैर अनुशासित होते गए और मोबाइल देखने में अपना ज्यादा समय बिताने लगे। खाना खाते वक्त भी मोबाइल देखते रहते थे। ज्यादा मोबाइल देखते रहने से उनकी आंखें कमजोर हो गई और उनके नजर के चश्मा लग गए। एक दिन हमारे मोहल्ले में एक किराएदार रहने आए, जिनके एक बेटी थी जिसका नाम पूर्वां था जो बच्चों को घर पर ट्यूशन पढ़ाती थी। सभी बच्चों के माता-पिता ने अपने बच्चों को पूर्वा दीदी के पास पढ़ने भेजना शुरू किया। एक दिन पढ़ाते समय पूर्वा दीदी ने अपने हाथ की एक अंगुली उठाई और सभी बच्चों से पूछा कि यह कितनी अंगुली है। सभी बच्चों ने सही जवाब दे दिया लेकिन कृति, कियान और अनय कुछ नहीं बता पाए और इधर-उधर देखने लगे क्योंकि वह तीनों उस दिन अपना चश्मा लाना भूल गए थे जिससे उन्हें दीदी की एक अंगुली ठीक से दिखाई नहीं दी। पूर्वां दीदी ने उस दिन ज्यादा मोबाइल देखने से होने वाले नुकसान के बारे में समझाया। उन तीनों ने दीदी से प्रॉमिस किया कि वह आज के बाद ज्यादा मोबाइल नहीं देखेंगे और अच्छे एवं अनुशासित बच्चे बनेंगे।

सच्ची कहानी की जीत
नीतू, 13 वर्ष
एक विद्यालय में बच्चों की एक विशेष कक्षा लगती थी। उस दिन सभी बच्चे अपनी शिक्षिका के चारों ओर गोल घेरा बनाकर बैठे थे। शिक्षिका बहुत प्रसन्न दिखाई दे रही थीं। उन्होंने बच्चों से कहा, “बच्चो! तुम सभी अपनी पसंद की कहानी लिखकर मुझे भेजो। इनमें से जो कहानी सबसे अच्छी होगी, उसे विद्यालय की पत्रिका में प्रकाशित किया जाएगा।” यह सुनकर सभी बच्चे बहुत उत्साहित हो गए। हर बच्चा अपनी कहानी को सबसे अच्छा बनाने के लिए मेहनत करने लगा। किसी ने राजा और रानी की कहानी लिखी, तो किसी ने पशु-पक्षियों की कहानी। एक बच्ची ने अपने गांव के एक गरीब किसान की कहानी लिखी, जो कठिन परिस्थितियों में भी ईमानदारी और मेहनत से अपना जीवन बिताता था। अगले दिन सभी बच्चों ने अपनी-अपनी कहानियाँ शिक्षिका को दे दीं। शिक्षिका ने सभी कहानियां ध्यानपूर्वक पढ़ीं। कुछ कहानियाँ बहुत रोचक थीं, लेकिन किसान वाली कहानी उन्हें सबसे अधिक पसंद आई। उसमें सरल भाषा में मेहनत, ईमानदारी और धैर्य का सुंदर संदेश दिया गया था। शिक्षिका ने सभी बच्चों को पास बुलाकर कहा, “तुम सबने बहुत अच्छा प्रयास किया है, लेकिन सबसे अच्छी कहानी वही होती है जो पाठक के मन को छू ले और उसे कुछ अच्छा सीखने की प्रेरणा दे।” यह सुनकर वह बच्ची बहुत खुश हुई। बाकी बच्चों ने भी उसके लिए तालियाँ बजाईं। शिक्षिका ने उसकी कहानी विद्यालय की पत्रिका में प्रकाशित करने का निर्णय लिया।

ज्ञान का अनोखा क्लासरूम
अर्जुन कुमार, 11 वर्ष
गुरुवार का दिन कक्षा में बहुत खास था। अध्यापिका रीमा मैम ने आज सभी बच्चों से कहा कि आज पढ़ाई टेबल-कुर्सी पर नहीं, बल्कि ज़मीन पर बैठकर होगी। उन्होंने ज़मीन पर एक सुंदर गोल चटाई बिछा दी। कक्षा के छह बच्चे—रोहन, आरव, प्रिया, साहिल, कबीर और अनन्या—बहुत खुश होकर चटाई पर गोल घेरा बनाकर बैठ गए। रीमा मैम ने मुस्कुराते हुए अपनी उंगली ऊपर उठाई और बच्चों को एक नई बात बताई। उन्होंने कहा, "बच्चों, हमारी कक्षा का ब्लैकबोर्ड खाली है, लेकिन अलमारी में रखी ढेरों किताबें हमें नया ज्ञान देने के लिए तैयार हैं। आज हम सीखेंगे कि ज्ञान ही हमारी सबसे बड़ी शक्ति है।" साहिल और रोहन बड़े ध्यान से मैम की बात सुन रहे थे। कबीर और अनन्या ने खुश होकर पूछा, "मैम, क्या हम किताबों से नई-नई कहानियां और अंतरिक्ष की बातें सीख सकते हैं?" रीमा मैम ने कहा, "बिल्कुल! अगर तुम मन लगाकर पढ़ोगे, तो जीवन में बहुत आगे बढ़ोगे।" रीमा मैम ने बच्चों को किताबों से एक बहुत ही मज़ेदार और ज्ञानवर्धक कहानी सुनाई। सभी बच्चे बड़े ध्यान से कहानी सुनते रहे और बीच-बीच में अपने सवाल भी पूछते रहे। पढ़ाई का यह अनोखा तरीका देखकर बच्चे बहुत खुश हुए। कहानी खत्म होने के बाद बच्चों ने मैम को धन्यवाद कहा और वादा किया कि वे रोज़ मन लगाकर पढ़ाई करेंगे। बच्चों के चेहरे पर छाई खुशी देखकर रीमा मैम भी बहुत प्रसन्न हुईं। यह दिन सभी बच्चों के लिए बहुत ही यादगार और खुशियों से भरा रहा।

ज्ञान का दीप और जादुई कहानियां
रेयांश सैनी, 10 वर्ष
​एक सुंदर और शांत गांव के स्कूल में अध्यापिका अनीता हमेशा बच्चों को नए-नए तरीकों से पढ़ाती थीं। एक दिन उन्होंने कक्षा के सभी बच्चों को ज़मीन पर बने एक गोल कालीन पर बैठने को कहा। रोहन, रिया, मीता, और साहिल उत्सुकता से एक-दूसरे को देखने लगे।
​अनीता जी ने मुस्कुराते हुए अपनी उंगली उठाई और कहा, "बच्चों, आज हम किताबों से परे एक ऐसी दुनिया में जाएंगे जहां कल्पनाओं की कोई सीमा नहीं है। आज मैं आपको एक ऐसी जादुई गुफा की कहानी सुनाऊंगी, जहां ज्ञान के चिराग जलते हैं।" ​सभी बच्चे उत्सुकता से आंखें फैलाए अध्यापिका जी की बात ध्यान से सुनने लगे। अनीता जी ने कहानी शुरू की कि कैसे एक छोटे से बालक ने अपनी उत्सुकता और समझदारी से एक पूरे गांव को अंधकार से बाहर निकाला था। बच्चे इतने ध्यान से सुन रहे थे कि पूरी कक्षा में एकदम शांति छा गई थी। रोहन और साहिल के चेहरे पर खुशी और आश्चर्य के भाव स्पष्ट दिख रहे थे। ​कहानी खत्म होते ही अनीता जी ने बच्चों से पूछा, "तो बताओ बच्चों, इस कहानी से हमें क्या सीख मिलती है?" ​रिया ने तुरंत हाथ उठाया और कहा, "मैडम, ज्ञान ही सबसे बड़ा धन है और हमें हमेशा नई चीजें सीखने के लिए उत्सुक रहना चाहिए!" अध्यापिका जी ने उसकी समझदारी की तारीफ की। उस दिन सभी बच्चों ने समझा कि पढ़ाई सिर्फ परीक्षाओं के लिए नहीं, बल्कि जीवन को सुंदर बनाने और समझने का माध्यम है।

कहानी सुनाने की कक्षा
अंश, 10 वर्ष
एक दिन की बात है। एक विद्यालय की कक्षा में अध्यापिका बच्चों को कहानी सुनाने के लिए बुलाती हैं। उस दिन कक्षा में पाँच बच्चे बैठे थे। अध्यापिका ने सभी बच्चों से कहा, “आज हम सब मिलकर अपनी-अपनी कहानी सुनाएंगे। जो बच्चा ध्यान से कहानी सुनेगा, वह अंत में कहानी का सार बताएगा।” सबसे पहले एक बच्चा आगे आया और उसने एक ईमानदार लकड़हारे की कहानी सुनाई। उसने बताया कि एक गरीब लकड़हारा नदी के किनारे लकड़ी काटता था। एक दिन उसकी कुल्हाड़ी नदी में गिर गई। उसने झूठ बोलने के बजाय सच बताया। उसकी ईमानदारी से प्रसन्न होकर उसे उसकी कुल्हाड़ी के साथ इनाम भी मिला। इसके बाद दूसरी बच्ची ने एक प्यासे कौए की कहानी सुनाई। उसने बताया कि कौए ने अपनी बुद्धि से घड़े में कंकड़ डालकर पानी ऊपर किया और अपनी प्यास बुझाई। बाकी बच्चों ने भी साहस, मेहनत और मित्रता से जुड़ी छोटी-छोटी कहानियां सुनाईं। सभी बच्चे एक-दूसरे की कहानी बड़े ध्यान से सुन रहे थे। अध्यापिका ने उनकी प्रशंसा करते हुए कहा, “कहानियां केवल मनोरंजन नहीं करतीं, बल्कि हमें जीवन की अच्छी बातें भी सिखाती हैं।” सभी बच्चों ने निश्चय किया कि वे रोज़ एक अच्छी कहानी पढ़ेंगे और उसे अपने मित्रों को सुनाएंगे। उस दिन से कक्षा में कहानी सुनाने की एक सुंदर परंपरा शुरू हो गई।

Updated on:
08 Sept 2026 03:04 pm
Published on:
08 Sept 2026 03:04 pm