कोलकाता

कवि सम्मेलन में कुमार विश्वास ने सुनाई अपनी राजनीतिक आत्मकथा

अंकुश कैसे सहते, कबीर के वंशज चुप कैसे रहते
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Updated: 2 Mar 2018, 7:59 PM IST
KOLKATA

कोलकाता

महानगर में आयोजित कवि सम्मेलन में देश के मशहूर कवि डॉ. कुमार विश्वास ने अपनी खट्टी-मीठे राजनीतिक अनुभवों के ताने-बाने से बुनी गहरी भावात्मक कविताओं से स्रोताओं को गुदगुदाया, हंसाया और झकझोरा। हंसी ही हंसी में उन्होंने प्रभावशाली तरीके से अपने प्रतिद्वंदियों पर चोट करने वाली अपनी राजनीतिक आत्मकथा सुनाई।
होली से पूर्व गुरुवार को वेस्ट बंगाल गारमेंट मनुफेक्चरर्स एण्ड डीलर्स एसोसिएशन की ओर से कोलकाता के बालीगंज पार्क इलाके में होली प्रीति सम्मेलन के मौके पर कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। कवि सम्मेलन की शुरूआत राजस्थान के कवि दिनेश बावड़ा ने अपनी कविताओं से की। कवि सम्मेलन में आए कुमार विश्वास ने सरल लय-छन्द के ताने-बाने से राजनीतिक पृष्ठभूमि पर बुनी कविताओं में अपनी राजनीतिक आत्मकथा सुना कर शमां बाध दिया।

उन्होंने आम आदमी पार्टी (आप) में अपनी आपबीती पर लिखी कविता- वाणी पर इतना अंकुश कैसे सहते, चुप कैसे रहते, भी सुनाई। - वे बोले दरबार सजाओ, वे बोले जयजयकार लगाओ, वे बोले हम जितना बोले तुम केवल उतना दोहराओ। वाणी पर इतना अंकुश कैसे सहते, हम कबीर के वंशज चुप कैसे रहते, हम दिनकर के वंशज चुप कैसे रहते, सुनाया तो लोगों से खचाखच भरा हॉल वाह-वाह और तालियों से गंूज उठा। थोड़ा कोलाहल धीमा हुआ तो फिर उन्होंने अगली पंक्तियां सुनाई- हमने कहा अभी मत बदलो, दुनियां की आशाएं हम हैं। वे बोले, अब सत्ता की बरदाई भाषा हम हैं। हम बोले व्यर्थ नहीं बोले गूंगों की भाषा हम है। वे बोले शोर मचाओ इसी शोर से आए हम हैं। इतने कोलाहल में हम क्या करते। हम कबीर के वंशज चुप कैसे रहते। इस पर फिर से स्रोताओं की तालियों और वाह-वाह से हॉल गूंज उठा। आप प्रमुख अरविन्द केजरिवाल पर कड़ा प्रहार करते हुए उन्होंने एक अन्य कविता पढ़ी- पुरानी दोस्ती को नई ताकत से मत तौलो, ये संबंधों की तुरपाई है षडय़ंत्रों से मत खोलो। मेरे लहजे की छेनी से गढ़े कुछ देवता जो कल, मरे लब्जों पर मरते थे वो अब कहते है कि मत बोलो। कुमार विश्वास ने कहा कि कविता कभी भी राजनीति से समझौता नहीं कर सकती। जिस दिन कविता राजनीति से समझौता कर लेगी, उस दिन या तो कविता खत्म हो जाएगी या राजनीति खत्म हो जाएगी। इससे पहले डॉ. कुमार विश्वास ने देश की राजनीति पर चोट करते हुए जोगिरा गाया और स्रोताओं को होली के रंग से सराबोर कर दिया।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी , कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी , राजस्थान की वसुंधरा राजे की सरकार कड़ा कटाक्ष करते हुए उन्होंने कहा- कांग्रेस है 48 के युवा जोश के साथ, बहु और बहुमत से वंचित राहुल की बारात। विजय मणि मणिशंकर दे गए सिब्बल दे गए ताज, मांग-मांग कर वोट साहब की फट गई आवाज। वसुंधरा की धरा हिल गई शाह है बेचैन, मुख्यमंत्री की कुर्सी पर है सचिन पायलट के नयन। माल्या, नीरव ले भागे सोता रह गया चौकीदार, कुछ भी पूछो सिर्फ नेहरू जिम्मेदार।

कवि सम्मेलन में विनीत चौहान ने अपनी वीर रस की कविताओं से स्रोताओं में जोश भरा और डॉ. सुमन दुबे ने फूल की आत्मकथा पर मैं सुमन शीर्षक कविता पढ़ कर सरहद पर प्राण गवाने वाले शहीदों की यादें ताजा करने की कोशिश करते हुए कहा- मैं सुमन मंै सुमन, मैं किसी भंवर की दीवानी नहीं, मेरे दिल की कोई राजधानी नहीं, प्यार में मुझे चढ़ाया गया, देव पर चढ़ाया गया, भाग्य उस समय धन्य हुआ जब शहीदों के पथ पर हमें बिछाया गया। कवि डॉ.गिरेन्द्र सिंह भदौरिया और दिनेश बावणा ने समाज की कुरीतियों पर चोट करने वाली अपनी कविताएं सुनाई। दिनेश बवणा ने कहा- सेठ जी आप बीमारी के परहेज से मरते हंै और हम गरीब बेटी के दहेज से मरते हैं। इस मौके पर एसोसिएशन के अध्यक्ष हरिकिशन राठी, उपाध्यक्ष विजय कारीवाल, प्रदीप मुरारका और मंत्री देवेन्द्र बैद के अलावा सुन्दरलाल दुगड़, संजय सराफ, निर्मल जैन और विरमप्रकाश सुल्तानिया अतिथि के रूप में उपस्थित थे।

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