कोलकाता

तस्लीमा नसरीन की घर वापसी या सियासी संदेश? 19 साल बाद कोलकाता पहुंचीं निर्वासित लेखिका

करीब 18 साल बाद बांग्लादेश से निर्वासित चर्चित लेखिका तस्लीमा नसरीन ने कोलकाता में कदम रखा है। 2007 में हिंसक विरोध-प्रदर्शनों के बीच शहर छोड़ने को मजबूर हुईं तस्लीमा की वापसी ने एक बार फिर पश्चिम बंगाल की राजनीति और उनके पुराने विवादों को चर्चा में ला दिया है।
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taslima nasreen
तस्लीमा नसरीन

पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के प्रदेश अध्यक्ष सामिक भट्टाचार्य के निमंत्रण पर बांग्लादेश से निर्वासित लेखिका तस्लीमा नसरीन शुक्रवार को कोलकाता पहुंचीं। करीब 19 साल बाद उनकी कोलकाता वापसी हुई है। 2007 में उनकी लेखनी को लेकर हुए हिंसक विरोध-प्रदर्शनों के बाद उन्हें शहर छोड़ना पड़ा था। कोलकाता के नेताजी सुभाष चंद्र बोस अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे (NSCBI Airport) पर पहुंचने के बाद तस्लीमा नसरीन ने पत्रकारों से कहा, "मैं बहुत खुश हूं। आप सभी का धन्यवाद।" वह पश्चिमबोंगर जोन्नो, ह्यूमन राइट्स बियॉन्ड फ्रंटियर्स और सेक्युलर मिशन द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में शामिल होने के लिए कोलकाता पहुंची हैं।

18 साल बाद वापसी पर सियासत गरमाई

तस्लीमा नसरीन की 19 साल बाद कोलकाता वापसी ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में भी हलचल मचा दी है। बीजेपी ने उनकी वापसी का स्वागत किया है, जबकि माकपा (CPI-M) ने इस पर सवाल उठाए हैं। पार्टी का आरोप है कि उन्हें साहित्यिक योगदान के कारण नहीं, बल्कि बीजेपी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रति उनके कथित समर्थन की वजह से बुलाया गया है। BJP के प्रदेश अध्यक्ष सामिक भट्टाचार्य ने कहा कि उन्होंने 2025 में संसद में तस्लीमा नसरीन को पश्चिम बंगाल लौटने की अनुमति देने की मांग उठाई थी। उन्होंने कहा, "मैं पहले भी कह चुका हूं कि तस्लीमा नसरीन को बंगाल आना चाहिए। आयोजकों की पहल से आखिरकार यह संभव हो पाया है। मैं भी इस कार्यक्रम में शामिल होने की योजना बना रहा हूं।" वहीं, 2007 में कोलकाता के मेयर रहे CPI(M) के वरिष्ठ नेता विकास रंजन भट्टाचार्य ने उनकी वापसी पर आपत्ति जताते हुए कहा, "उन्हें उनकी किताबों की वजह से नहीं, बल्कि इसलिए बुलाया जा रहा है क्योंकि वे वर्षों से बीजेपी और RSS के पक्ष में बोलती रही हैं।"

'मुझे यकीन नहीं हो रहा कि मैं फिर कोलकाता में हूं'

दिल्ली में दीर्घकालिक रेजिडेंस परमिट पर रह रहीं तस्लीमा नसरीन ने एक टीवी चैनल से बातचीत में कहा, "मुझे यकीन नहीं हो रहा कि मैं फिर से कोलकाता में हूं। 2007 में मुझे यहां से जाना पड़ा था। शुरुआत में लगा था कि एक दिन लौट आऊंगी, लेकिन समय बीतने के साथ उम्मीद कम होती गई। फिर सेक्युलर मिशन के उस्मान गनी मल्लिक ने मुझे कोलकाता आने का निमंत्रण दिया और पूरी व्यवस्था की।"

क्यों छोड़ना पड़ा था बांग्लादेश और कोलकाता?

तस्लीमा नसरीन को 1994 में बांग्लादेश छोड़ना पड़ा था। उनकी चर्चित पुस्तक 'लज्जा' (Lajja) को लेकर उन्हें जान से मारने की धमकियां मिली थीं। इस उपन्यास में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद बांग्लादेश में एक हिंदू परिवार पर हुए अत्याचारों का उल्लेख किया गया था। 63 वर्षीय तस्लीमा नसरीन बाद में यूरोप चली गईं, जहां उन्हें स्वीडन की नागरिकता मिली। करीब दस वर्ष विदेश में रहने के बाद वह 2004 में भारत आईं और कोलकाता में रहने लगीं। बंगाली भाषा और संस्कृति से गहरे जुड़ाव के कारण वह कोलकाता को अपना दूसरा घर मानती थीं। इस दौरान उन्होंने कई बंगाली अखबारों में नियमित रूप से लेख भी लिखे। हालांकि, 2007 में उनकी आत्मकथा 'द्विखंडितो' को लेकर हुए हिंसक विरोध-प्रदर्शनों के बाद तत्कालीन वाम मोर्चा सरकार ने उन्हें कोलकाता छोड़ने के लिए कहा, जिसके बाद उन्हें शहर से जाना पड़ा।

किताब से शुरू हुआ विवाद

तस्लीमा नसरीन की मुश्किलें उनकी आत्मकथा के प्रकाशन के बाद और बढ़ गईं। वर्ष 1998 में उनकी आत्मकथा का पहला भाग 'मेयेबेला' (My Bengali Girlhood) प्रकाशित हुआ। हालांकि, सबसे बड़ा विवाद 2003 में आत्मकथा के दूसरे भाग 'द्विखंडितो' (Dwikhondito) के प्रकाशन के बाद शुरू हुआ।

पुस्तक के प्रकाशन के बाद 18 नवंबर 2003 को कवि सैयद हसमत जलाल ने कलकत्ता हाईकोर्ट में मानहानि याचिका दायर की। उनका आरोप था कि किताब के कुछ अंश धार्मिक भावनाओं को आहत करते हैं। इस पर हाईकोर्ट ने पुस्तक के प्रकाशन पर अंतरिम रोक लगाने की अनुमति दी। इसके कुछ ही दिनों बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य के नेतृत्व वाली पश्चिम बंगाल सरकार ने यह कहते हुए पुस्तक पर प्रतिबंध लगा दिया कि इससे सांप्रदायिक तनाव फैल सकता है।

हालांकि, पुस्तक के प्रकाशक ने इस फैसले को अदालत में चुनौती दी। सितंबर 2005 में कलकत्ता हाईकोर्ट ने राज्य सरकार का प्रतिबंध रद्द करते हुए कहा कि पुस्तक का उद्देश्य किसी धर्म की भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं है और प्रतिबंध लगाने का फैसला उचित नहीं था। इसके बावजूद 'द्विखंडितो' को लेकर विवाद और विरोध-प्रदर्शन थमे नहीं।

2006 से 2007 तक बढ़ता गया विवाद

जून 2006 में कोलकाता की टीपू सुल्तान मस्जिद के तत्कालीन इमाम सैयद नूर-उर-रहमान बरकती ने तस्लीमा नसरीन का चेहरा काला करने वाले को इनाम देने की घोषणा की। इसके बाद कई संगठनों ने उन्हें भारत से बाहर भेजने की मांग शुरू कर दी। वर्ष 2007 में एक कार्यक्रम के दौरान उनके साथ धक्का-मुक्की भी हुई।

बाद में 'द्विखंडितो' के विवादित माने गए अंश हटा दिए गए, लेकिन इसके बावजूद नवंबर 2007 में कोलकाता में हालात फिर से तनावपूर्ण हो गए। ऑल इंडिया माइनॉरिटी फोरम के नेतृत्व में बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शन हुए। सड़क जाम, हिंसा और आगजनी की घटनाओं के कारण कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ गई और हालात संभालने के लिए सरकार को सेना बुलानी पड़ी।

कोलकाता छोड़ने पर हुईं मजबूर

बढ़ते तनाव और कानून-व्यवस्था की स्थिति को देखते हुए तत्कालीन पश्चिम बंगाल सरकार ने तस्लीमा नसरीन पर कोलकाता छोड़ने का दबाव बनाया। पहले उन्हें शहर से बाहर भेजा गया और बाद में नई दिल्ली स्थानांतरित कर दिया गया। तब से वह लंबे समय से दिल्ली में रह रही हैं।

Updated on:
01 Aug 2026 02:45 pm
Published on:
01 Aug 2026 01:32 pm
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