
Non-Halal Movement: पश्चिम बंगाल के धार्मिक और राजनीतिक माहौल में एक नया नैरेटिव जोर पकड़ने लगा है। कोलकाता के अंतर्बोध फ़ाउंडेशन ने 'नॉन-हलाल मूवमेंट' शुरू करने का ऐलान किया है। इस अभियान के तहत न सिर्फ हलाल फ़ूड प्रोडक्ट्स के बहिष्कार करने की बात कही जा रही है, बल्कि हिंदुओं के लिए एक पूरी तरह से अलग आर्थिक और कमर्शियल इकोसिस्टम बनाने की तैयारी है। कार्यक्रम में मौजूद भाजपा विधायक देबाशीष धर ने भी इस मूवमेंट को सांस्कृतिक परंपराओं को बढ़ावा देना वाला बताया है।
विशाखानंद तीर्थ महाराज ने बताया कि यह आंदोलन सिर्फ़ खान-पान की आदतों तक सीमित नहीं है। इसका दायरा बैंकिंग और व्यापार तक फैला है। उन्होंने कहा, "हम कई लोगों के साथ मिलकर और सहयोग से इस पहल को आगे बढ़ा रहे हैं। इसमें सिर्फ झटका प्रोडक्ट्स ही शामिल नहीं हैं। हम बैंकिंग सेक्टर के साथ भी जुड़ रहे हैं। ताकि अगले कुछ महीनों में एक पूरी तरह से काम करने वाला समानांतर सिस्टम बनाया जा सके।"
विशाखानंद तीर्थ महाराज ने आगे कहा, "मैं पूरा भरोसा दिलाता हूं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के आने वाले जन्मदिन तक पश्चिम बंगाल में यह पूरा सिस्टम काम करने लगेगा। यह भरोसा आपको एक हिंदू संत की तरफ से दिया जा रहा है।"
इस हलाल-विरोधी आंदोलन पर टिप्पणी करते हुए बीजेपी विधायक और पूर्व IPS अधिकारी देबाशीष धर ने कहा कि आंदोलन का मुख्य मकसद लंबे समय से खाए जा रहे भोजन खासकर बिरयानी की जो परंपरा लगातार चल रही है, उसके नकारात्मक पहलुओं को उजागर करना है, जिनके बारे में आज यहां विस्तार से बताया गया है।
उन्होंने कहा, "हम अपनी संस्कृति को और समृद्ध और मजबूत बनाना चाहते हैं और 'नॉन-हलाल मूवमेंट' इसी दिशा में उठाया गया एक अहम कदम है। हम इस आंदोलन के तहत उसके खिलाफ हैं जो सनातन संस्कृति के खिलाफ है।"
हलाल और झटका के बीच मुख्य अंतर जानवर को मारने के तरीके और उससे जुड़ी धार्मिक मान्यताओं का है। हलाल में इस्लामिक तरीके में, जानवर की श्वास नली को एक तेज चाकू से धीरे-धीरे काटा जाता है, जिससे शरीर से सारा खून निकल जाता है और जानवर की धीरे-धीरे मौत होती है।
वहीं, हिंदू और सिख धर्म के लोग झटका का इस्तेमाल करते हैं। जिसमें जानवर की गर्दन पर तेज धार वाले हथियार से एक ही वार करके सिर को शरीर से अलग कर दिया जाता है। इससे रीढ़ की हड्डी तुरंत कट जाती है और जानवर की तुरंत मौत हो जाती है, जिससे उसे तड़पने या दर्द सहने का समय नहीं मिलता।