पश्चिम बंगाल के जूट क्षेत्र पर फिर संकट के बादल छाने लगे हैं। जूट व्यापारियों की स्थिति बेहाल हो गई है। ‘गोल्डन फाइबर’ कहे जाने वाले जूट की नई फसल की आवक शुरू हो चुकी है लेकिन, खरीदार बाजार से नदारद हैं। जूट मिल मालिक कई चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। सरकार की ओर से मिलने वाले ऑर्डरों में लगातार कमी आ रही है। अपर्याप्त खरीद अनुबंधों और आपूर्ति आदेशों के कारण मिल मालिकों को पालियों में कटौती करने और परिचालन बंद करने के लिए मजबूर होना पड़ा है
रवीन्द्र राय
पश्चिम बंगाल के जूट क्षेत्र पर फिर संकट के बादल छाने लगे हैं। जूट व्यापारियों की स्थिति बेहाल हो गई है। ‘गोल्डन फाइबर’ कहे जाने वाले जूट की नई फसल की आवक शुरू हो चुकी है लेकिन, खरीदार बाजार से नदारद हैं। जूट मिल मालिक कई चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। सरकार की ओर से मिलने वाले ऑर्डरों में लगातार कमी आ रही है। अपर्याप्त खरीद अनुबंधों और आपूर्ति आदेशों के कारण मिल मालिकों को पालियों में कटौती करने और परिचालन बंद करने के लिए मजबूर होना पड़ा है। गत 7 दिन में 6 जूट मिलें बंद हो चुकी है। जूट उद्योग की मंदी का लाखों श्रमिकों पर असर पड़ रहा है। बड़े पैमाने पर नौकरियां चली गई हैं। इसका असर जूट किसानों पर भी पड़ा है। किसान अपनी उपज को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर बेचने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि जूट के भाव न्यूनतम समर्थन मूल्य के नीचे जा चुके हैं फिर भी बांग्लादेश से कच्चे जूट का आयात निरंतर जारी है। कानूनन आयातित जूट का उपयोग सरकारी बोरों में करना निषेध है। फिर भी सरकार इस गैर-कानूनी गतिविधि को रोक नहीं पा रही है।
उद्योग संगठन भारतीय जूट मिल संघ (आइजेएमए) ने जूट बैग की घटती मांग और श्रमिकों तथा किसानों पर इसके प्रतिकूल प्रभाव सहित अन्य चुनौतियों से निपटने में नीतिगत हस्तक्षेप की मांग की है। उद्योग संगठन ने इस संबंध में उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्री पी. जोशी को पत्र लिखा है। भेजे गए पत्र में आइजेएमए ने भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) और राज्य खरीद एजेंसियों (एसपीए) द्वारा खरीदे गए खाद्यान्नों के लिए पैकेजिंग सामग्री उपलब्ध कराने में जूट उद्योग की महत्वपूर्ण भूमिका का जिक्रकिया है। आइजेएमए के पूर्व अध्यक्ष संजय कजारिया ने कहा कि मांग में भारी गिरावट आई है। वित्त वर्ष 2024-25 में यह मांग 30 लाख गांठ रहने की उम्मीद है, जबकि 2021-22 में सालाना मांग 38-39 लाख गांठ थी।
यूनियन प्रतिनिधियों ने जूट आयुक्त कार्यालय को पूरी जानकारी दी है। उद्योग की मंदी एवं श्रमिकों पर इसके प्रभाव पर गहरी चिंता व्यक्त की। यूनियनों और मिल मालिकों ने मौजूदा चुनौतियों से निपटने के लिए राज्य सरकार से हस्तक्षेप की अपील की है। सरकार की ओर से मिलने वाले ऑर्डरों में कमी पर चर्चा की है। जूट मिलें लगभग 3.5 लाख श्रमिकों को रोजगार देती हैं और लगभग 40 लाख किसान नकदी फसल से जुड़े हुए हैं।
जूट बेलर्स एसोसिएशन के पूर्व उपाध्यक्ष ओम प्रकाश सोनी ने कहा कि कच्चे जूट की कीमत में गिरावट आई है। नए कच्चे जूट मौसम (जून-जुलाई) के लिए कीमत आदर्श रूप से 5,800 रुपए होनी चाहिए थी लेकिन, यह घटकर 5,500 रुपए प्रति क्विंटल रह गई है। 2024-25 सत्र के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) 5,335 रुपए प्रति क्विंटल है। उन्होंने कहा कि उद्योग ऐसी स्थिति से जूझ रहा है, जो उसने दशकों में नहीं देखी है। इसके बावजूद जून में 22 फीसदी कच्चा जूट आयात हुआ है, जबकि यहां के किसानों की फसल बिक नहीं रही है। हमने इस सिलसिले में कपड़ा मंत्री को पत्र लिखा है।
भारतीय जूट मिल संघ (आइजेएमए) के चेयरमैन राघवेंद्र गुप्ता ने कहा कि मांग को बढ़ावा देने के लिए उनकी संस्था ने सुझाव दिए हैं कि सभी आयातित गेहूं, चाहे वो सरकारी सौदों के माध्यम से हो या निजी व्यापार के माध्यम से, जेपीएम अधिनियम, 1987 के अनिवार्य प्रावधानों के अनुसार जूट की बोरियों में पैक किया जाना चाहिए। हमने धान की पैकेजिंग के लिए सेकेंड हैंड बैग के बजाय नए जूट बैग के इस्तेमाल की ओर लौटने का भी सुझाव दिया है।
ज्यादातर मिलों का व्यापारियों को भुगतान में इतना अधिक विलंब हो चुका है कि व्यापारी नया पाट किसानों से खरीदने की स्थिति में नहीं हैं। इसका असर किसानों पर पड़ रहा है। वे अपनी फसल बाजार में बिक्री नहीं कर पा रहे हैं। सरकार को संकट से प्रभावित जूट किसानों और श्रमिकों को वित्तीय सहायता और सहयोग प्रदान करना चाहिए।
मदन गोपाल माहेश्वरी, अध्यक्ष, जूट बेलर्स एसोसिएशन