
जुबेर खान @ कोटा.
राजस्थान में 24 हजार से ज्यादा ऐसे लोग हैं, जो चाहकर भी नगर निकाय से लोकसभा तक के चुनाव में मतदान नहीं कर सकते। दरअसल इन लोगों ने ऐसा काण्ड कर दिया जिससे कानून ने इनसे वोट देने का अधिकार छीन लिया। हालांकि इन लोगों के नाम मतदाता सूचियों में शामिल है फिर भी इन्हें मतदान करने का हक नहीं है। इनका गुनाह इतना संगीन है कि कानून इन लोगों को सरकार चुनने का हक नहीं देता। आखिर क्या है वजह, जानिए खास रिपोर्ट में...
जेल में रहते हुए अपराधी या विचाराधीन बंदी चुनाव लड़ सकता है, लेकिन मतदान में भाग नहीं ले सकता। राजस्थान की जेलों में 24,260 कैदी हैं, जिसमें से सजायाफ्ता 20,535 तथा 3,725 विचाराधीन हैं। जबकि, तीन डिटेन (निरुद्ध) कैदी हैं। इनमें से सिर्फ यह 3 कैदी ही मतदान में भाग ले सकेंगे। ये वे कैदी हैं, जिन्हें पुलिस प्रशासन ने शांति व्यवस्था के चलते निरुद्ध कर जेल भेजा है।
क्या होते हैं निरुद्ध बंदी
ऐसे व्यक्ति जिनके कानून-व्यवस्था के लिहाज से समाज के लिए खतरा बनने की आशंका रहती है। किसी घटना की आशंका के चलते पुलिस इन्हें गिरफ्तार कर मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करती है, जहां से इन्हें निरुद्ध कर जेल भेज दिया जाता है। माना जाता है कि यदि इन्हें अवसर विशेष के दौरान समाज में खुला छोड़ दिया जाए तो कोई बड़ी घटना को ये अंजाम दे सकते हैं।
दो जयपुर व एक जोधपुर जेल में बंद
प्रदेश की जेलों में सिर्फ तीन ही निरुद्ध बंदी हैं, जो 7 दिसम्बर को विधानसभा चुनाव में अपने मताधिकार का उपयोग करेंगे। इनमें कैलाश व सुरेंद्र सिंह जोधपुर सेंट्रल जेल में बंद हैं और तीसरा बंदी अजय रिणवा जयपुर सेंट्रल जेल में है।
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ये है कानूनी प्रावधान
जेल मैन्यूअल व लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 62 (5) के तहत जो जेल में बंद है या कस्टडी में है, उन्हें मतदान का अधिकार नहीं होगा। हालांकि उनके नाम मतदाता सूची में दर्ज होंगे।
ऐसे डाल सकते हैं वोट
कैदी के लिए कलक्टर की अनुशंसा पर चुनाव आयोग से पोस्टल बैलेट का इंतजाम किया जाता है। बंदी पोस्टल बैलेट से पसंद के उम्मीदवार को मतदान करता है। मतदान पत्र चुनाव कार्यालय में जमा हो जाएगा। मतगणना के दौरान यह पोस्टल बैलेट खोला जाएगा।
नहीं है मतदान का अधिकार
जेल में बंद एनएसए और डिटेन बंदी को ही मतदान का अधिकार है। सजायाफ्ता व विचाराधीन बंदियों को यह अधिकार नहीं होता। प्रदेश में मात्र तीन ही निरुद्ध बंदी हैं।
विक्रम सिंह, डीआईजी, जेल हैड.
कारण : कानून नहीं देता हक
यदि कोई व्यक्ति किसी भी कारण से पुलिस अभिरक्षा या न्यायिक अभिरक्षा में है, भले ही उसके विरुद्ध प्रकरण विचाराधीन हो या उसे दोषसिद्ध किया जा चुका हो, ऐसे व्यक्ति को मताधिकार के उपयोग का अधिकार कानून में नहीं दिया गया है, मताधिकार कानूनी अधिकार है। इसे फंडामेंटल राइट या संवैधानिक अधिकार नहीं माना गया है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक निर्णय अनुकूल चन्द्र प्रधान बनाम यूनियन आफ इण्डिया (एआईआर 1997 एस सी पेज नम्बर 2814) में भी इस सम्बन्ध में इनकार किया है। लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 62 में मताधिकार का प्रावधान है कि कौन व्यक्ति मताधिकार का प्रयोग कर सकेगा, लेकिन इसकी उप धारा 5 में ही यह प्रावधान है कि कोई भी बंदी भले ही वह दोष सिद्ध किया गया हो या नहीं या किसी भी कानूनी प्रावधान के तहत अभिरक्षा में रखा गया है तो वह मताधिकार का प्रयोग नहीं कर सकेगा।
विवेक नन्दवाना, एडवोकेट